Sunday, 16 July 2017

एक अनुसंधान : ईश्वर क्या हैं?



जब भी 'ईश्वर' शब्द हमारे जेहन में आता है, मस्तिष्क स्वतः धार्मिक चिंतन में प्रवेश करने को अग्रसर हो जाता है| वास्तव में अगर हम हजारों वर्षों के मानवीय इतिहास पर एक गहरी नजर डाल सकें, एक स्पष्ट प्रमाणिक तथ्य निकलकर कर सामने आता है कि, 'हम मनुष्यों ने जब भी 'ईश्वर' शब्द को परिभाषित या विश्लेषित करने का प्रयास किया है, पृष्ट्भूमि धार्मिक ही रही है'' | यही वजह भी है कि, हम ईश्वर को एक धर्म तत्व के रूप में स्वीकृत करते आये हैं | अब तक कि मान्यताओं के अनुसार ''ईश्वर' एक ऐसी अलौकिक, अद्वितीय, महापराक्रमी इकाई हैं, जो इस सृष्टि का निर्माता और निर्देशक हैं | इस सृष्टि में किसी भी घटना के होने या न होने कि वजह हैं'' |

धर्म और धार्मिक मान्यताओं कि पृष्टभूमि से तैयार 'ईश्वर' कि इस परिभाषा को जब भी हम वास्तविकता कि नजर से देखने और समझने का प्रयत्न करते हैं, कुछ स्पष्ट सा नहीं दिखता है| ईश्वर कि इस धार्मिक परिभाषा को जब हम अपने जीवन में ढूंढने का प्रयत्न करते हैं, वहां भी एक विरोधाभास सा प्रतीत होता है | ऐसे में एक संदेह उतपन्न होता है कि, कहीं ईश्वर के प्रति हम गलत विवेचना तो नहीं कर रहे हैं ? कहीं हमारा ईश्वरीय चिंतन सिर्फ काल्पनिक संकल्पना तो नहीं बन कर रह गया है ? जब मैं यह प्रश्न आपके चिंतन हेतु रख रहा हूँ, इसके पीछे धर्म या धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाना हमारा उदेश्य बिलकुल भी नहीं है| अपितु धर्म और धार्मिक तत्वों कि एक बेहद स्पष्ट, सरल, परिभाषी, तार्किक और हमारी जीवनशैली से सम्बद्ध विवेचना लोगों के समक्ष रखना है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी जो 'धर्म' और 'धर्म-तत्वों' से आपने आपको सम्बन्ध नहीं कर पा रही है, इसे समझ सके |


हमें सोचना होगा कि, अगर धार्मिक पृष्टभूमि आधारित चिंतन से हम 'ईश्वर' कि स्वीकार्य परिभाषा तय नहीं कर पा रहे हैं, क्या हमारे वैचारिक/शैक्षणिक चिंतन कि किसी अन्य धारा में ईश्वर को परिभाषित किया जा सकता है ? क्या हम 'ईश्वर' और 'ईश्वरीय शक्ति' के मानवीय जीवन पर स्पष्ट प्रभावों का खुला विश्लेषण कर सकते हैं ? आइये हम सब मिलकर एक प्रयास करें | 'ईश्वर' को नए सिरे से ढूंढने के लिए बेहद आवश्यक हो जाता है कि, हम अब तक मस्तिष्क में जमा अवधारणाओं के चंगुल से कुछ देर के लिए आज़ाद हो जाए | नव-चिंतन सर्वथा शून्य मे ही उतपन्न  होता है |

क्या हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति का प्रभाव है ?

मित्रों, 'ईश्वर' शब्द को वास्तविकता के साथ परिभाषित करने के लिए बेहद आवश्यक है कि, हम वास्तविक मानव जीवन पर नजर डालें | जब हम एक सामान्य मानवीय जीवनशैली में 'ईश्वरीय तत्व' को ढूंढने का प्रयास करते हैं, एक बात स्पष्टतः निकल कर सामने आती हैं कि, ''हमारे जीवन में 'ईश्वर' अर्थात ईश्वरीय शक्ति प्रभावी है'' | लेकिन जैसे ही हम इस तथ्य पर पहुंचते हैं, कई प्रश्न प्रश्न खड़े हो जाते हैं कि, कैसे ? हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण तो धर्म भी नहीं दे सका है, फिर कैसे हम इस तथ्य को प्रमाणित कर सकते हैं ? साथ ही प्रश्न खड़ा होता है कि, यह कौन सी ऊर्जा हैं ? इसकी प्रबलता और स्रोत क्या है ?

ईश्वरीय शक्ति मानव जीवन में प्रभावी है, लेकिन कैसे ?

 इस के लिए हमें अपने सामान्य दिनचर्या के कुछ प्रसंगों पर नजर डालनी होगी | जैसा कि हम देखते हैं - "हमारे आस-पास कुछ लोग मिलकर किसी भारी वस्तु को उठाने का प्रयत्न करते हैं | वे बार-बार प्रयत्न करते हैं लेकिन थोड़ा सा चूक जाते हैं | तभी सभी मिलकर 'हनुमान/शिव जैसे कथा-कथित ईश्वरीय स्वरूपों का जयकार लगाते हैं, और वस्तु उठ जाती है'' | यह परिणाम ऐसे मामलों में ८०-९०% तक होता हैं | मतलब स्पष्ट हैं कि, हमारे जीवन में ईश्वर काल्पनिक नहीं वास्तविक प्रभाव के साथ मौजूद हैं..क्योंकि शाब्दिक उच्चारण से कार्य सफल हो रहे हैं | ऐसा अक्सर देखा गया है कि, कई बार ईश्वर का नाम लेने से हमारा प्रयास सफल हो जाता हैं |

 'ईश्वर' या 'ईश्वरीय शक्ति' कौन सी ऊर्जा है , उसकी स्रोत और प्रबलता क्या है ?


''सर्वप्रथम तो 'ईश्वर' कोई अलौकिक शक्ति नहीं हैं | 'ईश्वर' को हमारे जीवन में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सर्वक्षेष्ठ ढंग से परिभाषित किया जा सकता है| 'ईश्वरीय शक्ति एक प्रकार कि काल्पनिक ऊर्जा है, जो एक आभाषी चरित्र में विश्वास से जन्म लेती है|  एक व्यक्ति जब मुश्किल में होता है, तब वह अपने धर्म (आस्था) से जुड़े ईश्वर को याद करता है | जैसे ही वह ईश्वर कि कल्पना करता है, उसे लगता हैं कि अब मेरे साथ कोई है,... कोई है जो मुझे इस संकट से निकाल ले जायेगा | ...उसका यह महसूस करना ही उसे आत्म प्रेरित कर देता है,..तत्क्षण में संकट से लड़ने के लिए उसके अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हम ईश्वरीय शक्ति के रूप में वर्णित कर सकते हैं '' |

जहाँ तक प्रश्न इस ऊर्जा के स्रोत का है, '' ईश्वर' स्वयं में कोई ऊर्जा स्रोत नहीं हैं, वस्तुतः संकट कि घडी में ईश्वर शब्द के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में आती है, उसका स्रोत स्वयं हमारा शरीर ही हैं | वास्तव में 'ईश्वर' एक मन्त्र के रूप में कार्य करता हैं, जिसके उच्चारण से निराश और सुस्त पड़ी हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रबल हो जाती हैं और हमारी आंतरिक ऊर्जा संगठित हो जाती हैं | जैसा कि ऊपर उदाहरण में देखा हमने कि, किस प्रकार लोग ईश्वर का नाम लेकर भारी वस्तु को उठा लेते हैं | यहाँ समझने कि आवश्यकता है कि, ईश्वर का नाम लेने से पूर्व जहाँ, आंतरिक ऊर्जा खंडित थी, वही नाम लेते ही सम्पूर्ण शरीर कि ऊर्जा बाजुओं में केंद्रित हो जाती हैं, जिससे कार्य आसानी से संभव हो जाता हैं | इस ऊर्जा कि प्रबलता का कोई तय पैमाना नहीं हैं, ..लेकिन यह इस हद तक प्रबल नहीं होती है, जिसे चमत्कारी कहा जा सके | अगर आप सामान्य अवस्था में २५ कि.ग्रा.  वजन उठा पाने में सक्षम हैं तो, ईश्वर के उच्चारण से और दो-चार कि.ग्रा अधिक उठा सकेंगे | कोई अद्भुत चमत्कार कि सम्भावना शून्य है | ईश्वर कोई अद्वितीय, महापराक्रमी शक्तिस्रोत है, यह सिर्फ एक भ्रम है |

हमारे सामान्य जीवन में ईश्वर के प्रभावों एवं उनका खुला और स्पष्ट विश्लेषण, आपको कैसा लगा ? हमें इन्तजार रहेगा | यह आलेख 'आपका ...धर्म क्या है ?'' ...कि अगली कड़ी है | अगर आपने अब तक उसे नहीं पढ़ा है, तो एक बार अवश्य पढ़े | एक बार पुनः यह याद दिलाते हुए कि, हम किसी भी धर्म के पक्ष-विपक्ष में चिंतन नहीं कर रहे हैं | 'धर्म' हमारे जीवन में वैचारिक अनुशासन के लिए बेहद आवश्यक हैं, लेकिन इसके लिए बेहद जरुरी है कि 'धर्म' सरल, अकाल्पनिक, व्यावहारिक और हमारे जीवन में प्रामाणिक हो, तभी यह हमें संयमित, नियमित और अनुशासित कर सकता है | अगली कड़ी में ...हम चलेंगे मानव इतिहास के पुराने पन्नों पर ...और ढूढेंगे उस ईश्वर को ...जिसे हमारे पूर्वजों ने  पूजा था | धन्यवाद | जय भारत

Tuesday, 11 July 2017

आपका ‘धर्म’ क्या है?



'धर्म' मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में सर्वाधिक चर्चित विषय रहा हैं | 'धर्म' को लेकर विभिन्न महामानवों ने अपने विचार रखें हैं, और उनके अनुयायी आज भी उस वैचारिक यात्रा में गतिशील हैं | मूलतः 'धर्म' शब्द का अभिप्राय एक जैविक इकाई के रूप में हमारे 'कर्तव्यों' से जुड़ा हैं, लेकिन जब भी वैश्विक समाज में धर्म के रूप में स्थापित हो चुकी कुछ सांगठनिक इकाइयों को अपने चिंतन में सम्मिलित करते हैं, स्पष्ट पता चलता हैं की 'धर्म' विचार और धारणाओं का एक मिश्रित स्वरूप हैं | अगर इस्लाम धर्म हजरत मुहम्मद साहब के वैचारिक चितन का प्रतिफल हैं, तो बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के विचारों और मानव जीवन के प्रति उनकी धारणाओं का प्रतिबिम्ब हैं | इसी प्रकार ईसाई धर्म यीशु मशीह, और सिख धर्म गुरुनानक देव जी के चितन और स्थापित धारणाओं का ही परिणाम हैं| इन सभी महापुरुषों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन किया, और चितन से जो विचार उतपन्न हुए, उसे अपने समर्थकों में बाँटने का काम किया | धीरे-धीरे उनकी वैचारिक यात्रा में अनुयायी बढ़ते गए, आगे चलकर अनुयायियों का यही समूह एक धार्मिक समूह के रूप में परिवर्तित हो गया |

ये तो हुई इस वैश्विक समाज में 'धर्म' के रूप में स्थापित हो चुके मानवीय संगठनों कि उत्पत्ति से जुडी मूल-अवधारणा | लेकिन एक जैविक इकाई के रूप में 'धर्म हमारे लिए क्या हैं ? क्या यह सिर्फ एक आस्था और विश्वास का प्रश्न हैं, या हमारी जीवन यात्रा के साथ इसका कोई सीधा और प्रभावी सम्बन्ध भी हैं ? मुख्यतः हम युवाओं के लिए 'धर्म' एक तर्कहीन और तथ्यविहीन कल्पनाओं का स्वरूप मात्र हैं, लेकिन क्या हम इसे अपने वास्तविक जीवन के पहलुओं से जोड़कर 'धर्म' कि एक सरल, परिभाष्य, तार्किक और कल्पनाविहीन व्याख्या कर सकते हैं ? मुझे लगता हैं कि हमें ऐसा जरूर करना चाहिए | मुझे शक हैं कि, इन सभी प्रश्नों के साथ मैं सही न्याय कर पाउँगा...क्योंकि मेरा प्रयास आपके मस्तिष्क में धर्म कि एक और नई व्याख्या का रोपण नहीं हैं, अपितु आपको इस बात के लिए जगाना हैं कि, आपका/हमारा धर्म क्या हैं ? एक इंसान के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक पुरुष या स्त्री के रूप में हमारा धर्म क्या हैं? एक युवा के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक छात्र के रूप, एक शिक्षक के रूप में, एक अभिभावक के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? इन प्रश्नों के साथ ही मैं यह याद दिलाना चाहूंगा कि, धर्म 'थोपने' का विषय नहीं हैं | 'धर्म' अंधश्रद्धा और वैचारिक पंगुवाद का विषय भी नहीं है | आपका धर्म सिर्फ आपके लिए चिंतन का विषय हैं, क्योंकि हम सभी इस ब्रम्हांड में एक जैविक इकाई के रूप में अपने धर्म के बारे में चितन करने के लिए स्वतंत्र हैं |मैं एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, जो कई कड़ियों में आपके समक्ष रखूँगा ...आप अपनी टिपड़्ड़ीयों से हमें जरूर अवगत कराएं :-

जब भी हम 'धर्म' को वास्तविकता के धरातल पर परिभाषित करने का प्रयत्न करते हैं, 'धर्म' अत्यंत ही सरल एवं सहज विषय प्रतीत होने लगता हैं | 'धर्म' का सीधा और सरल अर्थ 'कर्तव्य' से हैं | एक इंसान के रूप में अपने कर्तव्यों के क्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला 'कर्म' ही धर्म हैं |  एक पिता के रूप में आपका धर्म हैं कि, अपने बच्चे का सर्वक्षेष्ठ पालन-पोषण करें, उन्हें उच्च कोटि कि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर दें | वहीँ 'पुत्र धर्म' कहता हैं कि, आप अपने पिता के प्रति सम्मान रखें, उनके बुढ़ापे में किसी प्रकार कि दुख या पीड़ा का कारण बने | इसी प्रकार मां के प्रति, अपने भाई के प्रति, दोस्तों-मित्रों और सगे- सबंधियों के प्रति आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, यही जिम्मेदारियां विभिन्न मानवीय रिश्तों के प्रति हमारा 'धर्म' हैं | एक राजा के लिए प्रजा के प्रति कर्तव्य ही  'राज धर्म' हैं | इस तरह 'धर्म' को समझना और उससे खुद को जोड़ना, सिर्फ धर्म को बेहद सहज बनाता हैं, यह हमारी जीवनयात्रा को आदर्श भी बनाता हैं |

अगर 'भगवद गीता' में कहा गया हैं कि, 'कर्म ही पूजा हैं' | हमें इस वाक्य कि विशुद्ध व्याख्या को समझना होगा | 'कर्म' अर्थात  आपके कार्य | अपने उत्तरदायित्वों, अपनी जिम्मेदारियों के सर्वक्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला परिश्रम ही ...'पूजा' हैं | सिर्फ इसी पूजा का फल भी आपको प्राप्त होता हैं | 
अगर आप अपने पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों के सर्वोत्तम निर्वाह के लिए १२ घंटे मेहनत-मजदूरी करते हैं, विश्वास कीजिये ...आप १२ घंटे पूजा (कर्म) कर रहे हैं | मूल सन्देश यह हैं की आप अपनी जिम्मेदारियों का सर्वोत्तम निर्वाह सुनिश्चित करें, आपका धर्म सर्वथा सुरक्षित रहेगा |

इस प्रकार अगर हम अपने जीवन से जोड़कर धर्म और धार्मिक तत्वों की व्याख्या कर सकें ..काफी हद तक धर्म अपनी काल्पनिकता से वास्तविकता की तरफ प्रवेश करेगा | यहाँ एक बात और हमें समझनी होगी कि, धर्म अगर कर्तव्य हैं फिर हम कर्तव्यमूढ़ नहीं हो सकते हैं | सिर्फ इसलिए क्योंकि धर्म कुछ लोगों के लिए धंधा बन चूका हैं, हम धर्म का त्याग नहीं कर सकते हैं | हमें धर्म को नए नजरिये, नई सोच के साथ देखना होगा और उसे अपने जीवन में वास्तविकता के साथ उतारना होगा | हो सकता है सैकड़ों वर्ष पूर्व जो बातें कहीं-लिखी गयी हो, तब के समाज और जैव चिंतन के अनुसार सही भी हो | लेकिन आज भी हम उन्ही वर्षों पुरानी धारणाओं के साथ 'धर्म' को परिभाषित करते गए, विश्वास कीजिये 'धर्म' आने वाली पीढ़ी के लिए अबूझ और अछूत बन के रह जाएगा | अंग्रेजी माध्यम के साथ तैयार हो रही हमारी नई पीढ़ी 'धर्म' को समझ सके, इसके लिए धर्म का परिचय वास्तविकता के साथ कराना बेहद आवश्यक हैं |

Sunday, 9 July 2017

मोदी नहीं तो.... कौन ?



ये सही हैं कि हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था ऐसी हैं, जहाँ प्रधानमंत्री पद ही मुख्य आकर्षण का केंद्र होता हैं, बावजूद इसके भारतीय राजनीति पर जो प्रभाव पिछले - वर्षों में श्री नरेंद्र मोदी का देखने को मिला हैं, वह सिर्फ एक लोकतान्त्रिक पद का आकर्षण नहीं हो सकता हैं | आज आप भारतीय राजनीति के धरातल पर सत्ता के पक्ष में हो या विपक्ष में हो ...आपका राजनैतिक चिंतन 'मोदी' से इतर नहीं हो सकता हैं | लोग चाहें इसे दलगत और सांगठनिक आधार पर विचारधारा कि लड़ाई का नाम दें, लेकिन हकीकत यही हैं कि आज इस देश में राजनीति कि ब्यार सिर्फ नरेंद्र मोदी के समर्थन या विरोध में बह रही हैं | इस राजनैतिक संघर्ष में एक तरफ नरेंद्र मोदी के समर्थकों का हुजूम हैं, जो पूरी एकजुटता के साथ नरेंद्र मोदी के साथ खड़ा हैं | दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के विरोध में करोडो नेतृत्वहिन एवं खंडित लोगों का जनसमूह हैं | सच तो यह भी हैं कि, संख्याबल के दृष्टिकोण से विरोध का स्वर कहीं ज्यादा मुखर प्रतीत होता हैं | लोग हर स्तर से वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं, लेकिन इस विभिन्न विरोध-प्रतिरोध कि चर्चाओं के बिच जैसे ही यह सवाल सामने आता हैं कि, मोदी नहीं तो....कौन ? हर बुलंद आवाज गुम सी होती नजर आती हैं | हर आंदोलित चेहरा खोया-खोया सा नजर आने लगता है | ऐसा क्यों हैं ? विपक्ष के अनुसार अगर नरेंद्र मोदी गलत हैं, तो फिर सही कौन हैं ?

 आज विपक्ष जिस प्रकार से मोदी के ऊपर हमलावर होता हैं | उनकी कमियों-खामियों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करता है| समझने कि आवश्यकता हैं कि बात सिर्फ हमले करने और नरेंद्र मोदी कि कमियों को उजागर करने से नहीं बनने वाली हैं | कहीं कहीं विपक्षी दलों को नेतृत्व के नाम पर मुंह चुराने कि आदत से बाज आना होगा | अगर आप किसी को गलत साबित करते हैं, किसी को लेकर जनता के मन में भ्रम पैदा कर रहे हैं...आपकी यह जिम्मेदारी हैं कि, आपके दृष्टिकोण से सही व्यक्ति को भी जनता के बिच रखें | अगर हम लोकसभा चुनाव -२०१४ को ही समझ सकें तो, सत्ता पक्ष कि तरफ से मनमोहन सिंह के विरोध में सिर्फ भाजपा ने जमकर राजनैतिक हमले किये थे, उनकी कारगुजारियों को जनता के बिच बेनकाब करने का काम किया था अपितु नरेंद्र मोदी के रूप में एक मजबूत सरकार का विकल्प भी पेश किया था | परिणाम वर्तमान मुख्य विपक्ष से बेहतर कोई नहीं समझ सकता हैं | इसी प्रकार आज सभी विपक्षी दलों को नरेंद्र मोदी के ऊपर हमले में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को व्यय करने कि जगह, थोड़ी ऊर्जा नरेंद्र मोदी के विरुद्ध एक चेहरा खड़ा करने पर भी व्यय करना होगा | यह सिर्फ विपक्षी दलों कि राजनीति में मददगार होगा, अपितु लोकतंत्र कि मुख्य अवधारणा के संरक्षित करने वाला कार्य होगा | क्योंकि एक मजबूत लोकतंत्र कि मजबूती इस बात में अन्तर्निहित होती हैं कि, 'एक सशक्त सत्ता के सापेक्ष में एक मजबूत विपक्ष हो' |

वस्तुतः २०१४ में सत्ता के परिवर्तन के बाद से अब तक विपक्षी दलों कि स्थिति को समझने का प्रयत्न करें तो, नेतृत्व को लेकर बंगले झाँकने कि प्रवृति का सहज ही अंदाजा हो जाता हैं | ये सही हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता पक्ष लगातार मजबूत होता चला जा रहा हैं, और आज उस स्थिति में हैं जहाँ उसे राष्ट्रपति के चुनाव में अपने मनचाहें उम्मीदवार को विजयश्री दिलाने के लिए ज्यादा मेहनत करने कि आवश्यकता ही नहीं पड़ रही हैं | बावजूद इसके मोदी विरोधी दलों के पास कोई बड़ा नेता नहीं हैं, कोई चेहरा नहीं हैं ...यह कहना भी अनुचित होगा | इस दौरान विभिन्न राजनैतिक व्यक्तित्वों को लेकर चर्चाएं चली और बिना किसी परिणाम के समाप्त भी हो गयी | अगर हम बात करें देश कि राजसत्ता पर सर्वाधिक समय तक विराजमान रहने वाली कांग्रेस कि तो, कांग्रेस राहुल गाँधी से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं, और राहुल गाँधी 'नए-नवेले युवानेता' से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं | स्थिति कब तक सेटल होगी कहना मुश्किल हैं | हालाँकि भाजपा कि मनोकामना होगी कि, आगामी लोकसभा चुनाव 'मोदी बनाम राहुल/कांग्रेस' ही हो |

दूसरा नाम बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का हैं, जिसे लेकर मिडिया में काफी चर्चाएं चलती रहती हैं | अगर नितीश कुमार कि राजनैतिक कार्यशैली, अनुभव, व्यव्हार, कार्यकुशलता और बिहार में मोदी के खिलाफ सफलता को मद्देनजर रखें तो...निःसंदेह एक मजबूत चेहरा बनता प्रतीत होता हैं | लेकिन इससे पहले कि कोई प्रयाश होता, नितीश कुमार ने खुद ही अपने आपको इस दौड़ से बाहर कर लिया | नितीश कुमार कि तरह ही 'मोदी एन्ड कंपनी' को पश्चिम बंगाल में परास्त करने वाली आक्रामक और अनुभवी राजनेत्री ममता बनर्जी का नाम भी कुछ समय पहले तक चर्चा में था, लेकिन उन्होंने भी बंगाल से बाहर निकलने कि बात को सिरे से ख़ारिज कर दिया | इसके अलावे उड़ीसा के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नविन पटनायक भी खुद को इस दौड़ से बाहर कर चुके हैं और उनकी राजनीति को समझने वाले ...इस बात पर यकीन भी रखते हैं | देश के सबसे बड़े प्रदेश से सपा, बसपा आज सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाने कि जुगत में हैं, इससे आगे सोचना जायज भी नहीं हैं | महाराष्ट्र में शरद पवार, दिल्ली में केजरीवाल, तमिलनाडु में करूणानिधि जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप तो इस दौड़ में हैं ही नहीं |

कुल-मिलाकर विपक्ष के लिए मोदी के सामानांतर में एक सशक्त चेहरा ढूँढना काफी मुश्किल भरा हैं | चेहरे तो हैं, लेकिन अपनी-अपनी समझदारी से खेल रहे हैं, शायद इसके लिए जरुरी एकजुटता का आभाव भी प्रकट होता हैं | जो भी हो, जैसे भी हो ..इस देश कि राजनीति को एक स्पष्ट दिशा देने के लिए, विपक्षी दलों को एक नाम-एक चेहरा सामने लाना ही होगा | जनता को स्पष्ट बताना होगा कि...मोदी नहीं तो.... कौन ? अगर विपक्ष ऐसा नहीं कर पता हैं, तो मोदी विरोधी खबरे अच्छा व्यूज, लाइक्स और कॉमेंट्स जुटा सकती हैं ....वोट नहीं |


हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...