Sunday, 20 September 2015

जातिवाद बनाम राष्ट्रवाद

                                         -K.Kumar 'Abhishek' (20/09/2015)

हमारे देश में राष्ट्रिय एकता और अखंडता को लेकर बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं,लोकतांत्रिक मूल्यों की कसमें खायी जाती हैं..लेकिन जमीनी हकीकत हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा की हवा निकाल देती हैं! ..राष्ट्रिय एकता की मिशाल देखिये …आज अगर आप १२५ करोड़ भारतीयों के हित में बात करते हैं, सम्पूर्ण भारत को आह्वाहन करते हैं…मुश्किल से कुछ हज़ारों की भीड़ इकठ्ठा हो पाती हैं…लेकिन इसी देश में एक ऐसा युवा जिसके पास अपनी कोई वैचारिकता नहीं हैं, जिसके विचारों को किसी भी दृष्टिकोण से समझदारी पूर्ण नहीं कहा जा सकता है…सिर्फ एक जाति विशेष का सोया स्वार्थ जगा…ऐतिहासिक भीड़ जमा कर लेता हैं! स्पष्ट हैं की इस देश में जाति-धर्म …हमारी राष्ट्रीयता से बड़े ब्रांड बन चुके हैं.! लोगों की जातिगत भावनाएं ….राष्ट्रिय भावनाओं से ज्यादा प्रभावशाली है! निश्चय ही यह बेहद चिंतनीय विषय हैं…विशेषकर तब, जब हम इक्कीसवीं सदी में सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे हैं…राष्ट्र को एकसूत्र में पिरो विश्वगुरु का दर्जा दिलाने की बात कर रहे हैं! हमें सोचना होगा की क्यों जातिगत भावनाएं …राष्ट्रिय महत्व पर भारी पड़ रही हैं? जो लोग देश के लिए कभी बाहर नहीं निकलते हैं…वे कैसे जातिगत स्वार्थ के लिए आधी रात को सड़कों पर आ जाते हैं? कैसे कुछ लोग..जो वैचारिकता से समाज के लिए खतरा हैं…सिर्फ जाति का नाम लेकर मशीहा बन जाते हैं ?
बात सिर्फ गुजरात के पटेल आंदोलन की नहीं हैं…अपितु पिछले दो दशको में देश के कई हिस्सों में होने वाले जाति और धर्म आधारित आंदोलन बड़े प्रभावी रहे हैं ! राजस्थान में गुर्जरों और जाटों का आंदोलन भारतीय अखंडता की परिभाषा की मजाक बनता रहा हैं! ..देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले दलित और आदिवासियों के आंदोलन भी कम प्रभावशाली नहीं हैं..! दशकों से देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित रहा हैं…इनका हिंसक आंदोलन जो सभ्य समाज के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं हैं,..बावजूद इसके सत्य यह भी हैं की हमारे समाज का बड़ा तबका इनका समर्थन करता है ! प्रतिशोध की ज्वाला में भड़कती इनकी बातें भी लोगों को बेहद पसंद आती हैं.! ..इनकी मांगे जायज हैं या नाजायज …यह एक अलग विषय हैं?…लेकिन इतना तय है कि, ये सभी आंदोलन राष्ट्रीयता के बैनर तले नहीं हुए हैं…अपितु इन सभी आंदोलन का आधार जातिगत और वर्गीय दृष्टिकोण ही हैं! इसके विपरीत देश की कई बड़ी राष्ट्रिय महत्व की समस्याएं, लगातार बद से बदतर होती चली जा रही हैं! .गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ते अपराध, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, अन्धविश्वास, भूर्ण हत्या , दहेज़ प्रथा,.. जैसे ऐसे दर्जनों विषय जो १२५ करोड़ भारतीयों को प्रभावित करते हैं ,ऐसे विषयों पर किसी को बात करना भी गंवारा नहीं हैं…और अगर कुछ लोग बात करने की कोशिस भी कर रहे हैं…कोई उनकी सुनने वाला नहीं हैं! हकीकत यही की लोगों को जाति के दायरे में ही अपना स्वार्थ दिखता हैं…उनके लिए राष्ट्रीयता का कोई औचित्य नहीं है!
आज हम भले ही समाज के शिक्षित होने के कितने भी दावे कर लें….शिक्षा के प्रभाव से जातिवाद कि टूटती दिवारों का झूठा दंभ भर लें..हकीकत यही हैं कि, इस देश में कोई भी सिर्फ जाति का नाम लेकर लोगों को भेड़-बकरियों की तरह इकठा कर सकता हैं..और देखते ही देखते उनका स्वघोषित नेता भी बन सकता हैं! अर्थात इस देश में खुद का परिचय स्थापित करने के लिए जाति-धर्म सबसे आसान रास्ते हैं …और कुछ बेहद चालक और महत्वकांक्षी प्रवृति के लोग इसका फायदा भी उठा रहे हैं ! आधी रात को भी आप किसी को जाति और धर्म के नाम पर बाहर निकाल सकते हो…लेकिन देश के नाम पर बाहर निकालना मुश्किल है! यह स्थिति तब और दुर्भाग्यपूर्ण हो जातीं हैं…जब हमारे राजनेता चुनावों में जातियों का नाम ले-लेकर वोट मांगते हैं…और लोग नेताजी की सभी गुणों/अवगुणो को भुला सिर्फ जातिगत पहचान के आधार पर वोट दे देते हैं! लोगो के लिए चिंतन का विषय ही नहीं हैं कि..नेताजी चुनाव जीत कर समाज के लिए क्या कार्य करेंगे? कहीं वे भी अपनी झोली तो भरने नहीं लग जायेंगे.?..उन्हें तो ख़ुशी इस बात में ही मिल जाती हैं कि, अपनी जाति का विधायक/सांसद है! देश बने या बिगड़े…राष्ट्र का विकास हो या न हो….उन्हें फ़िक्र नहीं….अपनी जाति उन्हें ज्यादा गौरवान्वित करती हैं!
वास्तव में यह बेहद ही शर्मनाक स्थिति हैं ! राष्ट्र और राष्ट्रिय महत्व के विषयों को ज्यादा तवज्जों देने कि जरुरत हैं ! जाति-धर्म के नाम पर मांगे जायज हो,…नाजायज हो…इस हद तक हिंसक नहीं होना चाहिए कि राष्ट्र का नुकसान हो ! इस देश से जातिवाद समाप्त करने के लिए…हमें राष्ट्रवाद कि भावना को प्रभावशाली तरीके से जागृत करना ही होगा ! हम सभी भारतीय हैं…भारतीयता हमारे व्यक्तित्व कि सबसे बड़ी पहचान हैं…जाति-धर्म जैसे सामाजिक विखंडन के आधारों को व्यक्तित्व का परिचय बनाना संकीर्ण मानसिकता का परिचायक हैं! वास्तव में यह एक ऐसी समस्या हैं…जिसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं! हर वह भारतीय जिम्मेदार हैं…जिसे अपनी भारतीयता का अहसास नहीं..जो कुछ लोगों कि स्वार्थी चालबाजी में उलझ अपने ही देश में आग लगा रहा हैं! इस समस्या के निवारण के लिए भी हम सब को ही जिमेदारी लेनी !

Thursday, 17 September 2015

भारतीय कृषि - एक समग्र चिंतन

लगभग २०० वर्षों तक ब्रिटिश हुकूमत का गुलाम रहने के पश्चात ...१५ अगस्त १९४७ को देश आज़ाद हुआ ! लाखों क्रांतिकारियों के बलिदान एवं महापुरुषों के त्याग से मिली आज़ादी हमें हर्षित करने वाली थी लेकिन इस हर्ष के बावजूद आगे की राह आसान नहीं थी ! एक राष्ट्र के रूप में हम भले ही आज़ाद हो गए, लेकिन हमारी स्थिति एक बड़े वृक्ष से अलग हुए टहनी (शाखा) की तरह थी ! देश के सामने अपने वजूद पर खड़ा होने की कठिन चुनौती थी ! ऐसे समय में भारतीय कृषि ने देश को अपने पैरों पर खड़ा होने की ताकत दी ! देशवासियों की प्रथम आवश्यकता 'भोजन' को पूरा कर ..प्रशासकों को निश्चिंतता प्रदान की ! आज भारत को एक उभरती हुयी औद्यौगिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक औद्यौगिक विकास पर निर्भर हो चुकी है, बावजूद इसके हम इस सत्य को भूल नहीं सकते हैं, की देश के औद्यौगिक विकास की बुनियाद भारतीय कृषि ने ही तैयार की थी! भारतीय कृषि ही वह सीढ़ी हैं, जिसके सहारे देश की अर्थव्यवस्था उप्पर चढ़ी है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण हैं की उसी सीढ़ी को हमने तोड़ने का कार्य किया है ! ये सही हैं की समय के साथ भारतीय कृषि में कई सकारात्मक परिवर्तन आये हैं, समय के साथ उर्वरकों, कीटनाशकों और वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोग से उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि ही है, अर्थात सरकारों ने समय-समय पर कृषि सुधारों के लिए काम किया हैं, लेकिन जितना ध्यान देश के औद्यौगिक विकास पर दिया गया, उसकी तुलना में कृषि सुधारों की गति बेहद धीमी रही है! मुख्य रूप से आज भी हमारे किसान ..बेहतर उत्पादन हेतु प्रकृति पर निर्भर हैं, ! कहीं किसान सूखे की समस्या से त्रस्त हैं, तो कहीं बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदा उनका समूल नष्ट कर दे रही है! सिंचाई के लिए लिए बेहतर सुविधा के आभाव में वैकल्पिक साधनों पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे लागत खर्च बढ़ रहा हैं ! एक तरफ देश की बढ़ती जनसख्या के लिए उत्पादन की मांग बाढ़ रहीं है,इसके विपरीत हर वर्ष हज़ारों हेक्टेयर उपजायं कृषि भूखंड भी घटती जा रही है! कम भूखंड में अधिक से अधिक उत्पादन के prayas में किसान आवश्यकता से अधिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं...जिससे आम इंसान के स्वास्थ्य प्रभावित तो हो ही रहा हैं ...कहीं न कहीं अंधाधुंध रशायनिक उर्वारकों के प्रयोग से मिटटी की उर्वरा शक्ति भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है!

हमें भारतीय कृषि की वर्तमान दशा और दिशा को समझना होगा, इसके लिए वर्तमान दौर की प्रमुख समस्यायों पर एक-एक कर गंभीरता से विचार करना होगा...और उन समस्यायों के बेहतर समाधान के लिए प्रयास करने होंगे!-
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                           01/01 के.कुमार अभिषेक :- शिक्षित युवाओं की कृषि से बेरुखी
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भारतीय कृषि की एक बड़ी समस्या..शिक्षित युवाओं की कृषि से बेरुखी है! वास्तव में हमारे समाज में यह माहौल बना दिया गया हैं..की व्यावसायिक दृष्टिकोण से कृषि 'नरक' की तरह है! यही कारण है की एक किसान भी आज अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी तालीम देना चाहता हैं..तो इसलिए की उसका बच्चा इंजीनियर,डॉक्टर, मैनेजर, या बड़ा सरकारी अधिकारी बने...और उसके परिवार को कृषक की बदहाल जिंदगी से छूटी मिले ! ये सही भी है, क्योंकि आज हमारे किसानों की जो दुर्दशा है, जिस तरह की तंग, बदहाल, और लचर जीवनशैली वो गुजरने को विवश है, इसमें कहीं से भी युवाओं के लिए भविषय की संभावनाएं नहीं दिखती है! सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है की जिन किसानों के मेहनत से इस देश के १२५ करोड़ लोगों का पेट भरता हैं, जो किसान सही मायनों में १२५ करोड़ भारतीयों का जीवनदाता है, उसी किसान को हमारे समाज की साफ-सुथरी गलियों में तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता हैं ! अपने आप को सभ्य और शिक्षित कहने वाले कुछ खुदगर्ज अमीरों की नजर में ...किसान की कोई कीमत नहीं है ! ऐसे में हम उमीद भी कैसे कर सकते हैं की हमारी युवा पीढ़ी कृषि जैसे सर्वाधिक घृणित कार्यक्षेत्र में भविषय ढूंढेगी !
लेकिन इस सोच के साथ बड़ा प्रश्न भी खड़ा होता हैं, हम शिक्षित युवाओं की सोच पर ...! हम लाखों खर्च कर इंजीनियर, डॉक्टर, और मैनेजर बनते हैं ! क्या इंजीनियर का तात्पर्य सिर्फ बने बनायें प्रतिष्ठानो में नौकरी करना ही हैं? नहीं , इंजीनियर वह हैं जो नई सोच पैदा करे , नयी संभावनाओं का खोज करें.!..वास्तव में हमारी भारतीय कृषि में भी ऐसे इंजीनियर्स की आवश्यकता हैं, जो इस व्यवस्था की सुस्त पड़ी मशीनरी में नयी जान डाल दें ! उसी तरह एम.बी.ऐ का मतलब सिर्फ बड़ी-बड़ी कंपनियों में मैनेजर होना नहीं हैं, एक प्रबधन के छात्र की कुशलता हर क्षेत्र में बेहतर प्रबंधन से हैं, चाहें वह बैंकिंग प्रबंधन हों, कंपनियों का प्रबंधन हों..या कृषि प्रबंधन! हमें बेहद गहराई से इस बात को समझना होगा की ...जिन व्यावसायिक क्षेत्रों को हम एक सुनहरे भविषय के रूप में देख रहे हैं, इन क्षेत्रों को सुनहरा रंग देने का काम ..शिक्षा ने ही किया है ! शिक्षा ही एक मात्र साधन हैं, जो किसी भी व्यवस्था को बदलते समय की मांग के अनुसार बनाये रखती है, लेकिन दुर्भाग्य है की..आज भी हमारे देश में कृषि अशिक्षितों, गंवारों का व्यवसाय माना जाता हैं ! समझना मुश्किल नहीं की, अगर हमारे देश के शिक्षित लोगों ने प्रारम्भ से ही कृषि में वह रूचि ली होती , जो अन्य क्षेत्रों में ली गयीं...आज भारतीय कृषि देश के सर्वाधिक आकृषक स्व-रोजगार का क्षेत्र साबित हो सकता था !
शहरी क्षेत्रो के युवाओं के लिए कृषि क्षेत्र में हाथ आजमाना थोड़ा कठिन है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित लोग, जो आसानी से अपनी पारिवारिक कृषि-भूखंड पर कृषि कार्य कर सकते हैं और गांव और क्षेत्र के किसानों को नयी-नयी खोजों और वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग से बेहतर उत्पादन/प्रबंधन की सिख दे सकते है! लेकिन दुर्भाग्य हैं की कृषि परिवारों से आने वाले मेरे युवा मित्र भी अपनी संकीर्ण सोच के तहत इसे लोकलज़्ज़ा का विषय बना लेते हैं, उन्हें बड़ी-बड़ी डिग्रीयां हासिल कर खेतों में काम करना शर्म की बात लगती है ! हाँ, कुछ लोग कृषि से जुड़ भी रहे हैं, तो रोजगार की अन्य संभावनाओं से निराश होकर ! वास्तव में यह बेहद ही गंभीर पहलु है हमारी कृषि व्यवस्था के जिस पर हमें चिंतन करना होगा ! मुख्यरूप से ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को आगे आना होगा...और भारतीय कृषि जो १२५ करोड़ लोगों का पेट पलने के बावजूद सर्वाधिक तिरस्कृत, अपमानित, असंगठित, अव्यस्थित व्यावसायिक क्षेत्र बन चूका हैं, हम सभी को मिलकर..अपने ज्ञान-विज्ञानं, के प्रयोग से इस क्षेत्र को सर्वक्षेष्ठ विकल्पं में शामिल करना ही होगा !

एक समय था जब कृषि को कठिन शारीरिक परिश्रम का कार्य माना जाता था, लेकिन बदलते समय के साथ कृषि में कई बदलाव आ चुके हैं! नयी-नयी खोजों और वैज्ञानिक अविष्कारों से ऐसे-ऐसे कृषि यन्त्र आ चुके हैं, जिससे कृषि अत्यंत ही कम परिश्रम में बदल चूका है! साथ ही हम नयी सोच के साथ पारम्परिक कृषि से अलग हटकर ..नए-नए फसलों की खेती से लाखों की आमदनी अर्जित कर सकते हैं, साथी अन्य किसानों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका अदा कर ...उनकी जीवनशैली में भी सुधर कर, गांव और क्षेत्र को खुशहाल बना सकते हैं !

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बढ़ती मांग-घटती कृषि भूमि : - ०२/०१-के.कुमार 'अभिषेक'
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जैसा की हम सभी जानते हैं..हमारा देश जनसँख्या के दृष्टिकोण से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश हैं, और जनसँख्या वृद्धि की जो गति हमने पकड़ी हैं, संभव हैं की जल्द ही हम विश्व का सर्वाधिक जनसमूह वाला देश बन जायेंगे ! हमारे देश में अध्ययन के लिहाज से जनसँख्या वृद्धि को एक बड़ी राष्ट्रव्यापी समस्या के रूप में लिया जाता हैं, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है की 'बढ़ती जनसँख्या' सिर्फ एक समस्या नहीं, अपितु विभिन्न राष्ट्रव्यापी समस्याओं की जननी है ! देश की बढ़ती जनसँख्या ने कृषि के क्षेत्र में भी विकट समस्याएं कड़ी की है, और ये समस्याएं अनियंत्रित जनसँख्या के साथ विकराल रूप धारण करें, इसके पूर्व हमें इनका हल ढूँढना होगा !
जैसा की हम सभी जानते हैं, जैसे-जैसे हमारे देश की जनसँख्या बढ़ रही हैं, देश में खाद्य सामग्री की मांग भी उसी तेजी से बढ़ती जा रही हैं ..! हर गुजरते दिन के साथ लोगों के लिए खाद्यान्न पैदा करने का बोझ भारतीय कृषि पर बढ़ता जा रहा हैं, जो अपने आप में एक बड़ी कठिन चुनौती है ! यह कठिनाई और बढ़ जाती हैं, जब इसी जनसँख्या की अन्य जरूरतों को पूरा करने में एक बड़ा भू-खंड व्यय हो रहा हैं! जी हाँ, सच्चाई बेहद दुखद हैं, की हर वर्ष देश की लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि ..बढ़ती जनसँख्या की अन्य जरूरतों जैसे घर, सड़क, अस्पताल, विद्यालय, एवं विभिन्न गैर-कृषि क्षेत्रों में जा रहीं है! अर्थात एक तरफ खाद्य सामग्री की बढ़ती मांग हैं, वहीँ इसके ठीक विपरीत लगातार भारतीय कृषि भू-खंड छोटा पड़ता जा रहा हैं!
हमें इस समस्या की गंभीरता को समझना होगा, इसके कारणों पर गौर करना ही होगा ! अगर हमने ऐसा नहीं किया, भारत जो कभी कृषि प्रधान राष्ट्र हुआ करता था...एक ऐतिहासिक तथ्य में तब्दील हो जायेगा! अगर हमने बढ़ती जनसँख्या को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठायें...बढ़ती जनसँख्या हमारी कृषि को लगभग तबाह कर देगी! लेकिन दुर्भाग्य हैं, की वर्तमान सरकारों की नीतियों, और कार्यशैली में 'जनसँख्या नियंत्रण' हेतु कोई प्रभावी योजना नहीं है ! परिवार नियोजन कार्यक्रमों के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूरी की व्यवस्था हैं !
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सिंचाई की कुव्यवस्था :- 0३/०१-के.कुमार 'अभिषेक'
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भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं की अगली कड़ी में मैं आप सभी का ध्यान एक ऐसी समस्या की तरफ मोड़ना चाहूंगा, जो अपने आप में सर्वाधिक प्रभावशाली समस्या है! अभी तक हमने जिन दो समस्याओं पर चिंतन किया, वो ऐसी समस्याएं थी, जिनको समझने के लिए गंभीर चिंतन की आवश्यकता थी , लेकिन हमारे देश में अपर्याप्त सिंचाई व्यवस्था ....एक ऐसी समस्या है, जिसे इस देश का हर किसान भलीं-भांति समझता है !
आज़ादी प्राप्त किये हुए हमें लगभग ६८ वर्ष हो चुके हैं, इन ६८ वर्षों में देश लगभग पूरी तरह बदल चुका हैं, अपितु कृषि के क्षेत्र में भी कई अहम और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले है, लेकिन इन ६८ वर्षों में अगर कुछ नहीं बदला, तो हमारे देश की कृषि भूमि को सिंचित करने की व्यवस्था ! दुर्भाग्यपूर्ण हैं की आज भी हमारे देश के बड़े हिस्से में प्रयाप्त सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण, हमारे किसान भाइयों को प्रकृति के भरोसे रहना पड़ता है! इस तरह देखें तो उनका कृषि कार्य काफी हद तक 'भाग्य' के भरोसे खेले जाने वाले जुए की तरह हैं ! एक किसान कर्ज लेकर अपने खेतों में लाखों रूपयें लगाता हैं, लेकिन प्रयाप्त सिंचाई व्यवस्था न होने के कारण फसल सुख जाती हैं, और किसान बर्बाद हो जाता है! कड़वी हकीकत तो यह भी हैं कि, एक कृषि प्रधान देश के रूप में ख्याति होने के बावजूद ..आज़ादी के ६८ वर्ष के बाद भी हम देश में मौजूद जल संसाधन के बेहतर उपयोग हेतु कोई कार्ययोजना तैयार नहीं कर सके हैं, अपितु आज भी हमारी सिंचाई व्यवस्था अंग्रेजों की नीतियों पर सम्पादित हो रही है! देश कि वर्तमान सिंचाई व्यवस्था सिर्फ दो विकल्पों पर चलती आ रही है,-
१. नदी-नहरों की सिंचाई:-
हमारे देश में नदी और नदियों से निकलने वाले नहर सिंचाई के ऐसे साधन हैं, जिसपर सिर्फ हमारी सरकार ही भरोसा रखती है ! वर्तमान में मौजूद नहरों की दशा ऐसी हैं, जिनसे कुल कृषि भूमि का ३५-४०% हिस्सा भी सिंचित हो जाना बड़ी बात हैं ! जिन क्षेत्रों में नहरें हैं, उन किसानों की स्थिति भी ज्यादा संतोषजनक नहीं है ! समय से नहरों में पानी नहीं आता, ऐसे में अगर किसान नहरों की आस लगाएं बैठा रहे तो उसकी फसल चौपट होनी तय है ! विभिन्न प्रदेश सरकारों की चुल्हड़बाजी, और राजनैतिक पैंतरों के पश्चात ..अगर देर-सवेर पानी नहरों में आ भी जाएँ ...तो नहर की अंतिम छोर तक पहुँचते-पहुँचते फसल काटने का समय आ चुका होता है!
२.वैकल्पिक साधनों से सिंचाई :-
आज किसान सिंचाई के मामले में आत्मनिर्भरता चाहता हैं, वह कृषि में लाखों रुपयों सिर्फ प्रकृति और सरकारी साधनों के भरोसे नहीं लगा सकता है! ऐसी स्थिति में सिंचाई के वैकल्पिक साधन उसके लिए वरदान साबित हो रहे हैं, लेकिन इसका उपयोग दिन-प्रतिदिन महंगा ही होता जा रहा हैं ! पिछले कुछ वर्षों में डीजल के दामों में बेतहासा वृद्धि देखने को मिली हैं, साथ ही बिजली की दरे भी महँगी हुई है, ...समझा जा सकता है की गर्मी के मौसम में जब हर तीसरे-चौथे दिन फसलों में पानी की आवश्यकता होती है, किसानों के लिए कृषि कार्य बेहद महंगा हो जाता है ! साथ ही हमारे देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहाँ भू-गर्भ में पानी की मात्रा बेहद ही कम है, ऐसे क्षेत्रों में फसलों की सिंचाई की बात भी कौन करें, जबकि इंसानों को पिने का पानी ही बहुत मुश्किल से मिल पाता है!
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता हैं की, हमारे देश में किसानों की दुदर्शा, और कृषि क्षेत्र के पतन का एक बड़ा कारण ..सिंचाई की कुव्यवस्था और इसके प्रति हमारी सरकारों की ढुल-मूल नीतियां रही हैं ! गौर करने वाली बात हैं की..समय-समय पर हमारे देश के किसान लगातार प्राकृतिक विपदाओं की मार भी झेलते रहे हैं! बिहार जैसा प्रदेश जहाँ के निवासी आज भी जीवनयापन के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं ...हर वर्ष बाढ़ और सूखे की समस्याओं से त्रस्त है ! बिहार का एक कोना बाढ़ की चपेट में डूब कर तबाह हो जाता हैं, उसी वक्त दूसरा कोना सूखे की भेंट चढ़ जाता है ! कहीं न कहीं हमारी सरकारों को जगना होगा ! किसानों के हित की बनावटी बातों से ...इस देश का भला नहीं होने वाला है! समझने की आवश्यकता हैं कि, देश के कई भाग हर वर्ष बाढ़ की समस्या से परेशान हैं, वहीँ कई भाग हर वर्ष सूखे की मार झेल रहे हैं ! ऐसे में आवश्यकता हैं की देश की नदियों को आपस में जोड़ा जाये, और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की नदियों का जल सुखा प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाने की व्यवस्था की जाएँ ...जिससे दोनों क्षेत्रों के निवासियों का जीवन सुरक्षित हो सके है! कितना अजीब लगता है, जबकि पृथ्वी के लगभग 73 % हिस्से में सिर्फ जल ही जल है, बावजूद इसके हमारे देश में लोगों को पिने का पानी नहीं मिल पाता हैं, किसानों को अपना फसल उगाने के लिए आसमान को देखना पड़ता हैं! वाकई यह जल संसाधन के प्रबंधन में हुयी चूक का परिणाम मात्र है..जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ हमारी सरकारें जिम्मेदार है !
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अनाज व्यापारियों की कालाबाज़ारी : ०४/०१-के.कुमार 'अभिषेक' (05/06/015)
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यह एक अजीब विडंबना है की हमारे देश में हर उत्पाद का मूल्य उत्पादक/निर्माणकर्ता तय करते हैं, लेकिन कृषि उत्पादों की कीमत तय करने का अधिकार उत्पादकों (किसान) को नहीं है! हमारे देश में एक किसान अपने खेतों में जी-तोड़ मेहनत करता है, अपने खून-पसीने से सींच कर फसलों को तैयार करता है, उसमे हज़ारों रुपयों उर्वरकों और कीटनाशकों के रूप में व्यय करता हैं, लेकिन जब फसल तैयार होता है...अपनी लागत खर्च और मेहनत के आधार पर कीमत तय करने का अधिकार उसके पास नहीं होता है ! अत्यंत दुर्भायपूर्ण है की कहने को फसल का मालिकाना हक़ किसान के पास होता हैं, लेकिन उसकी कीमत बाज़ारों के बाजीगर (व्यापारी) ही तय करते हैं! 
आज हमारे देश में कृषि को जो स्थिति हैं, हमारे किसान भाई रात-दिन अथक परिश्र्म के बावजूद अगर आर्थिक बदहाली से त्रस्त हैं, वे लाखों का उत्पाद तैयार करने के बावजूद अपना और परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं..इसका सबसे बड़ा कारन अनाज व्यापारियों की ठगी है! आज हमारे देश का हर किसान, चाहें वह कोई भी उत्पाद तैयार करता हो.. अपने क्षेत्र के अनाज व्यापारियों की ठगी का शिकार हो रहा हैं ! वास्तव में हमारे देश में अनाज व्यापारियों की ऐसी कूटनीति होती है, जिसमे मजबूर, लाचार किसान न चाहते हुए भी फंस ही जाता है ! समझने की आवश्यकता हैं कि, ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की फसल जैसे ही तैयार होती है, किसान अपनी फसल बेचने के लिए अपने क्षेत्र के व्यापारियों से संपर्क करता हैं..लेकिन एक गन्दी साजिस के तहत व्यापारी अत्यंत ही कम किमत बताते हैं ! किसान को समझाया जाता हैं कि..''अनाज की मांग न होने के कारण, ज्यादा मूल्य नहीं मिल सकता'' ! उधर किसान जिसने पहले से ही कई सपनो संजोएं हैं परेशान हो जाता है! साहूकार का कर्ज, बिटियाँ कि शादी का खर्च..परिवार कि अन्य जरूरतों को पूरा करने कि मज़बूरी,...जब उसे सताती है ...वह न चाहते हुए भी अनाज व्यापारियों कि कालाबाज़ारी का शिकार हो ही जाता है! मजबूरन खून-पसीने से सींचकर तैयार अपनी फसल को वह कौड़ियों के दाम बेच देता है ! 
समझना आवश्यक है कि, ये वही व्यापारी हैं, जो औने-पौने मूल्यों पर किसानों कि फसल हड़प लेते हैं..और उसे अपने गोदामों में जमा कर उसकी कीमतों को आसमान में पहुंचा देते है! जब एक बार कीमतें उचीं हो जाती हैं...अपना अनाज बेचकर कई गुना अधिक मुनाफा खाते हैं ! अर्थात इनकी गन्दी चालबाजी का शिकार सिर्फ हमारे किसान भाई ही नहीं..हम सभी हो रहे हैं, और हमारी सरकारें, जो सबकुछ जानते-समझते हुए भी ...उनकों मौन समर्थन दे रही है!
मित्रों, हम सभी जानते हैं..हम किसानों के प्रति कितनी भी सहानुभूति रखें, उनका रोना रोएँ.....अनाज व्यापारी नहीं बदलने वाले ! कहीं न कहीं हमारी सरकारों को ऐसे अनाज व्यापारियों के खिलाफ कठोर करवाई करनी होगी ...व्यापार के नाम पर देशवासियोंको ठगने/लूटने का अधिकार किसी को नहीं है ! अजीब तो यह कि हमारी सरकार..यह जानते हुए भी कि..इस देश में किसानों कि दुर्दर्षा और बढ़ती महंगाई का सबसे बड़ा कारण ये जमाखोर/कालाबाजारी ही है....हमारी सरकारें किसी बड़ी करवाई के बजाये, सिर्फ 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' का शिगूफा छोड़ कर...अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती है! सरकारी व्यवस्था के तहत अनाज खरीद के लिए गठित 'सहकारी समितियां' ..जो सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदती है...इनकी स्थिति भी कुछ ज्यादा संतोषजनक नहीं है! इन सहकारी समितियों में व्याप्त भ्रष्टाचार..एक गंभीर मशला है ! किसानों से अनाज के बदलें ..भारी कमीशन कि मांग कि जाती है! थोड़े ज्यादा पैसों के लालच में अगर किसान अपना अनाज दे भी दे तो,...कब तक सरकारी खजाने से पैसा उसके हाथों में पहुंचेगा, उसके लिए बाबुओं के कितने के कितने चक्कर काटने पड़ेंगे....इसका वास्तविक अंदाजा नहीं है!
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रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग
: - 05/01-के.कुमार 'अभिषेक'
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मित्रों, जब हम भारतीय कृषि जैसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते हैं, अत्यंत आवश्यक हैं कि कृषि और कृषकों को प्रभावित करने वाले बाहरी तत्वों के साथ-साथ भारतीय कृषि के आंतरिक पहलुओं पर भी चर्चा कि जाये! मसलन किसानों कि कायशैली, उनकी सोच, फसलों के चयन, उत्पादन के तौर-तरीकों पर भी हमें मंथन करना चाहिए ! आइये इसी कड़ी में भारतीय कृषि कि एक अंदरुनी समस्या ..रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अनियंत्रित प्रयोग पर चर्चा करें!
मित्रों, जैसा कि हम सभी जानते हैं, देश कि जनसँख्या बेहद तीर्व गति से बढ़ती जा रही हैं, इस बढ़ती जनसँख्या के साथ कृषि उत्पादों, मुख्यतः खाद्य पदार्थों कि मांग भी बढ़ती ही जा रही है, वहीँ दूसरी तरफ कृषि कार्य में उपयोग होने वाली लाखों हेक्टेयर कि भूमि प्रति वर्ष बढ़ती जनसँख्या कि अन्य बुनियादी आवश्यकताओं जैसे घर, सड़क, अस्पताल, विद्यालय इत्यादि में चली जा रही हैं ! ऐसी स्थिति में भारतीय किसानों के कन्धों पर कठिन चुनौती हैं, कि बढ़ती जनसँख्या कि खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करें ! यही कारण है कि हमारे किसान अपने खेतों में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन के प्रयास में अत्यधिक मात्र में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे है! साथ ही हमें इस तथ्य को समझना होगा कि...हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से किसान परिवार टूट रहे हैं, परिवार में अलगाव कि वजह से कृषि भूमि भी टुकड़ों में बंट कर छोटी होती जा रही है! कल तक जो बड़े किसान परिवार थे, उन बड़े किसानों कि कृषि भूमि भी सम्पति बटवारे कि वजह से टुकड़ों में खंडित हो रही है...और इस बिखराव में इनकी हैसियत मझले और छोटे स्तर के किसानों जैसी हो जा रही है ! ऐसे में खंडित परिवार के सामने यह चुनौती हैं कि ..अपनी जमीं के छोटे टुकड़ें में अधिक से अधिक उत्पादन करें, जिससे प्रयाप्त आय अर्जित कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया जा सके! स्पष्ट है यह स्थिति भी किसानों को प्रेरित कर रही हैं कि वे अपने खेतों में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करें!
इसमें कोई शक नहीं है कि रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और बाजार में उपलब्ध विभिन्न कृत्रिम पोषक तत्वों का बड़ा असर फसलों के उत्पादन में पड़ता हैं! आज से लगभग ३-४ दशक पूर्व तक, हम कृषि प्रधान राष्ट्र होते हुए भी...पर्याप्त अनाज पैदा नहीं कर पाते थे और हमें लोगों कि भोजन कि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खाद्यान्न अन्य देशों से आयात करना पड़ता था ! लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में ..जैसे-जैसे कृषि में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और अन्य पोषक तत्वों के प्रयोग का प्रचलन बढ़ा हैं, लगातार घटती कृषि भूमि के बावजूद फसलों के उत्पादन में बड़ी वृद्धि देखने को मिली हैं, और आज हम एशिया के बड़े अनाज निर्यातक देशो में शुमार किये जाते हैं! हालाँकि इस बड़े परिवर्तन के लिए....कृषि के क्षेत्र में बड़े वैज्ञानिक अविष्कारों, प्रयोगशाला में तैयार फसलों कि नयी-नयी उन्नत किस्में, नए वैज्ञानिक उपकरण, कृषि कार्य कि आधुनिक विधियां एवं सुविधाएँ और कुछ हद तक हमारी सरकारों कि कृषि नीतियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है ! इन सभी परिस्थितियों के बीच मूल समस्या यह है कि...हमारे किसान भाइयों में यह ग़लतफ़हमी बैठ गयी है कि, ''वे अपने खेतों जितनी अधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करेंगे , उनका उत्पादन भी उतना ही बढ़ता जायेगा'' ! वे इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि, 'फसलों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए संतुलित मात्रा में पोषक तत्व आवश्यक हैं, लेकिन अगर यही पोषक तत्व असंतुलित मात्रा में दिया जाये तो.... फसलों के साथ-साथ खेत कि मिटटी के स्वास्थ्य को भी ख़राब कर सकते है'' ! अमूमन हमारे किसान फसलों में यूरिया का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, जिसमे नाइट्रोजन कि अत्यधिक मात्रा होती है ! यूँ तो यूरिया ..फसलों कि तीर्व वृद्धि और हरा-भरा बनाने के लिए जाना जाता हैं, लेकिन यही यूरिया अगर थोड़ी ज्यादा मात्रा में किसी पौधे कि जड़ में गिर जाएँ..तो उसे सुखा देता है, साथ ही उस जगह कि मिटटी को भी जला देता हैं, जो बिलकुल काली पड़ जाती है! हमारे किसानों को इस अंतर को समझना होगा !
ठीक यही स्थिति बाज़ारों में भरे कीटनाशकों कि भी है, ...फसलों के अच्छे स्वास्थ्य, और विभिन्न कीटों से बचाने का दावा करती हज़ारों देशी-विदेशी कंपनियां हमारे अल्प-शिक्षित/अशिक्षित किसानो का दोहन कर रही है ! ये कीटनाशक एक प्रकार का जहर है, जिनके छिड़काव से कीटाणु मर तो जाते हैं, लेकिन इसका विपरीत असर फसलों के स्वास्थ्य पर पड़ता हैं, इन कीटनाशकों कि वजह से पतियों में मौजूद क्लोरोफिल ( जिससे पौधों कि पत्तियां हरी रहती है) ..क्षीण होने लगता है ! साथ ही ये सभी कीटनाशक अनाज/सब्जियों के रास्ते मानव शरीर में पहुंच रहे है, जिससे नित्य नयी-नयी शारीरिक बीमारियां जन्म ले रही है !
आज हमारे गांवों में देखने को मिलता हैं कि, किसानों के बीच ज्यादा से ज्यादा उर्वरक के उपयोग कि होड़ लगी हुई है ! यह स्थिति भारतीय कृषि के लिए आत्मघाती है, इससे हमारी उपजाऊँ कृषि भूमि कि उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है, मिटटी का ऊपरी परत अत्यधिक यूरिया के उपयोग से जल रहा हैं, उसमे मौजूद पोषक तत्वों में बड़ा असंतुलन पैदा हो रहा हैं ! इससे बचने के लिए, अत्यंत आवश्यक हैं कि उर्वरकों का प्रयोग संतुलित मात्रा में और आवश्यकतानुसार ही किया जाये, जैविक खादों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग किया जाएँ , सम्भव हो तो खेतों में कोई कोई भी फसल लगाने से पूर्व कृषि सलाहकारों से राय ली जाये...और कीटनाशक के रूप में ज्यादा से ज्यादा घरेलु नुस्खों का ही प्रयोग किया जाये ! सबसे बड़ी बात ...ऐसा करने से मिटटी कि उर्वरा शक्ति संतुलित बनी रहेगी, और कीटनाशकों और उर्वरकों के नाम पर जो लूट मची है...हमारे किसान भाई इससे बच सकेंगे, और इसका असर उनके मुनाफे पर भी दिखेगा ! इस दिशा में हमारी सरकारों को भी ध्यान देना होगा...लोगों को फसल चक्र और जैविक खादों के प्रयोग को प्रोत्साहन देना होगा ! सबसे बड़ी बात..विभिन्न कीटनाशकों और पोषक तत्वों के नाम पर किसानों के साथ जो लूट मची है..इसके लिए थोड़ी तत्परता दिखानी होगी!
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परंपरागत फसलों की अंधी दौड़ :- 06/01/-के.कुमार 'अभिषेक'
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मित्रों, जब हम भारतीय कृषि की बदहाली की बात करें...तो अत्यंत आवश्यक हो जाता है की, 'फसलों की चयन प्रक्रिया और इसको लेकर किसानों की मानसिकता'' जैसे अहम मुद्दे पर भी एक गहरी चर्चा की जाएँ ! चर्चा होनी चाहिए की..भारतीय किसान फसलों के चयन हेतु किस प्रक्रिया का पालन करते हैं?
मित्रों, बेहद स्पष्टता के साथ हमें समझना होगा की...आज भी हमारे देश के सर्वाधिक किसान प्राचीन काल से चली आ रही 'कृषि पद्धति' से ही कृषि कार्य कर रहे हैं, उनके खेतो में आज भी मौसमवार वही फसलें उगाईं जा रही हैं,..जो वर्षों पूर्व से उनके पूर्वज उगाते रहे हैं ! हाँ, नए-नए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग से पैदावार में वृद्धि हुई है...लेकिन फसलों का प्रकार वही हैं जो वर्षों से उनके खेतों में देखा गया है ! अर्थात आज भी हमारे देश के ..मुख्यरूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों के किसान परम्परिक फसलों की खेती में उलझें हुए है ! बड़ा प्रश्न हैं की हमारे किसान भाई लगातार आर्थिक तंगी से गुजरने की बावजूद परम्परिक फसलों में ही क्यों उलझें हुए हैं? कारणों पर गौर करें तो, आज भी हमारे किसानों में पुरानी सोच बनी हुई है की, परिवार के भोजन की व्यवस्था के लिए मुख्य अनाजों की खेती आवश्यक है! वे समझ नहीं पा रहे हैं की ...अगर उनके पास अन्य फसलों से बड़ी आय प्राप्त होती है, उस आय के एक हिस्से से अपने परिवार के लिए मुख्य अनाज ..जैसे चावल, गेंहूँ, दाल आदि खरीद सकते है! साथ ही अल्प शिक्षा की वजह से हमारे किसान कृषि कार्य में ..वर्षों से चल आ रहे फसलों को बदलने और अन्य विकल्पों को आजमाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते ...और यही डर उन्हें आगे बढ़ने से रोके रहता है!
आज समय की यह मांग है, की किसान अपने हालात में बदलाव लाने के लिए ...कृषि से बेरुखी की जगह अपनी कृषि पद्धति को बदलें ! अगर वे परिवार के लिए विकाश की संभावनाएं खोजना चाहते हैं, परिवार के 'दाल-रोटी का जुगाड़' वाली सोच से बाहर निकलना बेहद आवश्यक है! बेहद जरुरी है की, हमारे किसान पारम्परिक फसलों की उलझन से बाहर निकलें और आधुनिक फसलों की खेती में ध्यान लगाएं ! मुख्यरूप से औषधीय पौधों, फल-फूल, सब्जियों आदि की खेती से ...सफलता पूर्वक लाखों की आमदनी जमीन के छोटे से टुकड़ें पर भी की जा सकती है...और अपनी बदहाल आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है ! इस मामले में हमें अन्य देशों के किसानों से भी सबक लेना होगा ..जो ज्यादा से ज्यादा नकदी और अधिक आय देने वाली फसलों की कृषि में ही लगे हैं, और भोजन के लिए मुख्य अनाज वे भारत जैसे देशों से खरीद लेते है !
मित्रों, फसलों के चयन में हमारे किसानों की गलत मानसिकता का एक और उदाहरण है की...वे इसे एक भेड़ चाल बना चुके है! हालाँकि यहाँ चर्चा सिर्फ कृषि पर केंद्रित हैं, अन्यथा भेड़-चाल हम भारतीयों की मुख्य कार्यशैली का हिस्सा है! अक्सर मैंने महसूस किया है की..अमूमन हमारे किसान भाई पारम्परिक फसलों के खेती बदलने को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं कर पाते हैं, लेकिन इनके बीच का ही कोई किसान... कोई अन्य फसल उपजाता हैं, और उससे बड़ा मुनाफा अर्जित करता हैं, देखते ही देखते अन्य किसान भी उसके पीछे चल पड़ते है! जैसे - किसी किसान ने गेंदों के फूलों की खेती प्रारम्भ कर दी, पहले वर्ष में तो लोग उसे पागल-सनकी ..और न जाने-क्या क्या कहेंगे? लेकिन जब फसल तैयार होती है, और वह किसान गेंदे की फूल बेचकर लाखों की कमाई करने लगता है, धीरे-धीरे उसकी जीवनशैली बदलने लगती है ...जो लोग लोग गाली दे रहे होते हैं, वहीँ उसकी नक़ल करने लगते है ...और एक-दो वर्ष में पता चलता है की क्षेत्र के सारे किसान सिर्फ फूलों की खेती में ही लग गए ! हालाँकि अन्य किसान उसकी नक़ल करें, उससे प्रेरणा ले ..और बड़ी आय प्राप्त करें ...यह अच्छी बात हैं! लेकिन जैसा की हम सभी जानते हैं.. ..बाजार में किसी भी वस्तु का मूल्य दो चीजों पर निर्भर करता है (१)-बाजार में वस्तु की उपलब्धता (2) बाजार में वस्तु की मांग ! इस आधार पर देखें तो..जब कुछ किसान गेंदे की फसल उपजाते हैं, उन्हें बेहतर मूल्य मिलता है, लेकिन जब सारे लोग सिर्फ एक ही फसल के पीछे लग जाते हैं..तो उसका बाजार भाव काफी निचे गिर जाता है! और इस स्थिति में जो फसल कल तक मुनाफा दे रही होते है...घाटे का सौदा बन जाते है! आज हमारे देश में धान-और गेंहूँ की फसलें मुख्य रूप से उगाईं जाती है, अब पिछले कुछ वर्षों में ही देखे तो हमारे देश में धान-गेंहूँ का उत्पादन इतना अधिक हुआ की ...हमारी सरकारी के पास उनको सुरक्षित रखने को गोदाम कम पड़ गए , लाखों क्विंटल अनाज यूँ ही सड़ गए! समझना होगा की अगर यह स्थिति पैदा हो रही है...हमारे किसानों को उनके फसल के लिए बड़ी कीमत कैसे मिलेगी? गौर करने वाली बात हैं, की अगर धान-गेंहूँ की अंधी दौड़ से निकल कर कुछ किसानों ने अन्य फसलों की खेती भी की होती..तो उन्हें उनके फसलों से बड़ा मुनाफा तो होता ही,! धान-गेंहूँ उपजने वाले किसानों को भी उपलब्धता कम होने की वजह से अच्छी कीमते मिलतीं..और सबका भला होता!
साथ ही हमें एक और महत्वपूर्ण तथ्य को समझना होगा की..कृषि को कल तक सिर्फ शारीरिक परिश्रम वाला कार्य ही माना जाता था, लेकिन आज जिस तरह धीरे-धीरे ही सही कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ बदल रही है, काफी हद तक यह एक 'माइंडगेम ' भी बन चूका है! अक्सर हमारे किसान भाई हालात को सही नहीं समझ पाते हैं और गलत फैसले ले लेते है! जैसे अगर इस वर्ष अधिकतर किसानों ने प्याज की फसल लगायी है, स्पष्ट है बाजार में प्याज की अधिकता बढ़ेगी..और प्याज के दाम काफी कम हो जायेंगे ! अर्थात किसानों को बड़ा मुनाफा नहीं होगा.....अब ये सारे घबराएं हुए किसान तय करते हैं की अगले वर्ष प्याज नहीं , लहसुन उगाएंगे ....स्पष्ट है अगले वर्ष बाजार में प्याज कम होंगे, उनके मूल्य बेहतर मिलेंगे..और लहसुन ज्यादा होने की वजह से घाटे का फसल बन जायेगा ! वास्तव में यह चूहे-बिल्ली का खेल किसानों और बाजार के बीच चलता रहता हैं...और प्रकृति भी इसमें अपनी भूमिका निभाती रहती है!
निश्चित तौर पर इन सभी चीजों की जड़ में ' अशिक्षा' है, आज हमारे किसानों का इतने बड़े परिप्रेक्ष्य में सोचना मुश्किल हैं, लेकिन ऐसी स्थिति सभी किसानों के लिए हानिकारक साबित हो रही है! बेहद जरुरी है..की हमारे किसान भाई भेड़-चाल से बचें.....इस देश में लाखों फसलों की खेती होती है! अगर किसी ने टमाटर की खेती से लाखों कमाएं हैं..इसका ये तातपर्य नहीं की...लाखों सिर्फ टमाटर से ही कमाए जा सकते हैं! इसके लिए जरुरी हैं..की आप नयी और आधुनिक कृषि पद्धति को समझें ! स्थानीय कृषि केंद्र में अपनी मृदा का जाँच कराएं,..और मौजूद कृषि वैज्ञानिकों/ सलाहकारों से मिटटी की गुणवत्ता के अनुसार फसलों की सलाह लें !

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फसलचक्र पद्धति से अनजान किसान : 07/01-के.कुमार 'अभिषेक'
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मित्रों,
'फसलचक्र पद्धति' को लेकर काफी बातें होती हैं, इसकी कृषि में उपयोगिता को लेकर बड़े-बड़े दावे होते है..लेकिन उन दावों का क्या जो हकीकत का रूप न लें सकें! वैसे तो 'फसल चक्र पद्धति' के महत्वा ' का वर्णन लगभग हमारी सभी पाठ्यपुस्तकों में भी मिलता हैं, बावजूद इसके आज भी हमारे ग्रामीण किसान इस बेहद उपयोगी कृषि पद्धति से अनजान हैं ! निश्चित तौर पर इसके लिए उनकी अशिक्षा जिम्मेदार हैं, लेकिन साथ ही जिम्मेदार हमारा सरकारी तंत्र भी हैं..जो दशकों से इस पद्धति के प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रूपयें पानी में बहा रहा हैं!
मित्रों, अध्ययन के लिहाज से 'फसलचक्र पद्धति' से हम सभी परिचित हैं, ये बात और है की इसकी उपयोगिता हमें धरातल पर देखने को नहीं मिली हैं! वास्तव में इस बेहद लाभकारी पद्धति से अनजान होना ..भारतीयों किसानों के पिछड़ेपन के बड़े कारणों में से एक हैं! अगर हमारे किसान बंधू ध्यान दें...इस कृषि पद्धति को अपनाकर भारतीय कृषि की कई समस्याओं से निजात पा सकते हैं, साथ ही अपनी आय में बड़ा मुनाफा जोड़ सकते हैं! सर्वप्रथम हम ये समझें... की 'फसलचक्र पद्धति' क्या हैं? ..वर्तमान दौर में इसकी क्या उपयोगिता बनती है?
मित्रों, जैसा की हम देखते हैं, गर्मीं क्षेत्रों के किसान आज भी पारम्परिक कृषि फसलों की खेती में उलझें हुए हैं, आज भी उनके खेतो में वहीँ फसलें दखने को मिलती हैं..जो वर्षों पूर्व से उनके पूर्वज उगाते आये है! जैसे ..बिहार के किसान प्रत्येक वर्ष मुख्यतः दो फसल (मौसम अनुसार) उगते हैं..धान और गेंहूँ ! इसी तरह देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के किसान गन्ना, कपास, बाजरा, मक्का, और विभिन्न दलहन फसलों आदि की खेती करते हैं ! वास्तव में इनकी कृषि पद्धति कृषि परम्परा के माफिक लगती है,..फसल डूब जाएँ, सुख जाएँ ..बर्बाद हो जाएँ...ये पुनः अगले वर्ष भी उसी परम्परा के निर्वाह में लग जाते हैं ! अब इस प्राचीन समय से चली आ रही कृषि पद्धति की कई खामियां है..जिन्हे समझना आवश्यक है! खामियों की बात करें तो, अमूमन यह देखने को मिलता हैं..जब किसान हर वर्ष एक ही फसल बार-बार उगाते हैं, उन्हें कभी भी उचित किमत नहीं मिल पाता है! फसल के बाजार में अत्यधिक उपलब्ध होने के कारण व्यापारी भी बेहतर भाव नहीं देते हैं..वहीँ सरकार भी न्यूनतम समर्थन मूल्य बाजार भाव के आंकलन के अनुसार ही तय करती है! ये तो हुयी फसल के मूल्य की बात, लेकिन बार-बार एक ही फसल खेतों में लगाने से इसका बुरा प्रभाव खेतों की उर्वरता पर भी पड़ता हैं! यहाँ समझने की आवश्यकता हैं की...हर फसल मिटटी से जल और खनिज लवण अवशोषित करते है, जिससे उनकी पत्तियां प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के तहत भोजन बना सकें ! अध्ययन का एक पहलु यह भी है..की खनिज लवण विभिन्न पोषक तत्वों का मिश्रित रूप होता है और सभी पौधें मिटटी से कुछ विशेष पोषक तत्वों को अत्यधिक मात्रा में अवशोषित करते हैं! यहाँ समझने की आवश्यकता है की..जब हमारे किसान भाई , एक ही फसल बार-बार अपने खेतों में लगाते हैं, ऐसे में उस खेत की मिटटी में उस पोषक तत्व की कमी पड़ जाती है, जो उक्त पौधें द्वारा अधिक अवशोषित किया जाता है! ऐसी स्थिति में समय के साथ मिटटी में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा होने लगता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव फसलों के उत्पादन पर पड़ता हैं, जिससे बचने के लिए किसानों को काफी पैसे रासायनिक उर्वरकों में खर्च करने पड़ते हैं! ऐसे में आवश्यक हो जाता है की, हमारे किसान भाई अपने खेतों में हर वर्ष बदल-बदल कर फसल लगाएं ..जिससे मिटटी में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा न हों! ऐसे में 'फसलचक्र पद्धति' से कृषि एक बेहतर और आधुनिक विकल्प हैं! जिसमे किसान को विभिन्न फसलों का पूल तैयार करना होता हैं..और वैज्ञानिक सलाह पर उन फसलों की चक्रीय पद्धति (एक-एक कर ) के तहत कृषि कार्य को अंजाम दिया जाता है! 
फसलचक्र की पद्धति से एक तरफ जहाँ किसानों को प्राचीन भारतीय कृषि पद्धति की खामियों से छुटकारा मिल पायेगा, वहीँ मिटटीं में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहेगा..जिससे रासायनिक उर्वरकों पर व्यय भी बेहद कम होगा ! इसके तहत कई ऐसी फसलें भी हैं जो मिटटी की उर्वरता में इजाफा करती हैं, जिसका फायदा अन्य फसलों को मिलता हैं! उदहारण के तौर पर ..हमारे देश में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों चना, मटर, अरहर, मूंग आदि की एक बड़ी विशेषता होती है...ये फसलें वायुमंडल से नाइट्रोजन अवशोषित कर उसे मिटटी में डाल देती ही हैं (जड़ों के माध्यम से ) , अब ध्यान दें कि, यह वही नाइट्रोजन है जिसकी मिटटी में उपलब्धता बनाने के लिए किसान भारी मात्रा में यूरिया का उपयोग करते हैं! अर्थात दलहनी फसलों कि एक उपज ..मिटटी में प्रचुर मात्र में यूरिया जमा कर देती है ...और भी ऐसी अनेक फसलें हैं, जो किसानों के लिए बेहद उपयोगी और लाभकारी भी हैं! आवश्यकता है कि ...किसान इस आधुनिक पद्धति के महत्वा को समझें, उसकी कृषि में उपयोगिता को स्वीकार करें !
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किसानों कि गैर-व्यवसायिक सोच और कार्यशैली : - 08/01/-के.कुमार 'अभिषेक'
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यह सिर्फ किसानों की बात नहीं है, अपितु हम सभी इंसानों की सच्चाई है की, हमारा जीवन हमारे विचारो का पुतला है! एक इंसान के रूप में जैसी हमारी सोच, हमारी विचारधा और कार्यशैली होंगी...हमारा जीवन उसी अनुरूप ढल जायेगा ! आज ऐसे समय में जब हमारे ही देश में कई ऐसे किसान हैं..जो छोटे से भू-खंड में भी लाखों कि कमाई प्रतिवर्ष कर रहे हैं..वहीँ हमारे किसानों का बड़ा वर्ग आज भी गरीबी, भुखमरी, और बदहाली के दौर से गुजर रहा हैं, वे अपनी खेतों में इतनी आय भी नहीं कर पा रहे हैं कि..वे स्वयं और परिवार कि सामान्य मानवीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकें! इस अंतर को समझने के लिए हमें एक-एक कर भारतीय किसानो कि सोच और कार्यशैली पर चिंतन करना होगा!
मित्रों, यह एक अद्भुत विडंबना ही है कि...सम्पूर्ण विश्व में कृषि को एक व्यवसाय के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं, अध्ययन के तहत भी कृषि को एक व्यवसाय ही माना जाता हैं..लेकिन आज भी भारतीय किसान अपने आपको व्यवसायी नहीं मानते हैं! न तो उनकी सोच व्यावसायिक हैं और न ही उनकी कार्यशैली व्यावसायिक है ! प्रश्न यह कि व्यावसायिक सोच हैं क्या? इसे समझने के लिए हमें व्यवसायियों (व्यापारी ) कि सोच और कार्यशैली को समझना होगा ! एक पक्का व्यवसायी ..अपनी व्यवसाय कि कुल व्यय, कुल आय और कुल शुद्ध मुनाफे का बराबर हिसाब रखते हैं, साथ ही वे इस बात का अनुमान भी रखते हैं कि..किन वस्तुओं के व्यवसाय में उन्हें अधिक मुनाफा प्राप्त होगा ! प्रश्न अहम हैं कि क्या हमारे किसानो कि सोच भी ऐसी है? क्या उन्हें अपनी कुल लागत, कुल आय और विशुद्ध का मुनाफे कि जानकारी होती है? क्या उन्हें इस बात का अहसास होता है कि ...किन फसलों कि खेती में अधिक मुनाफा हैं? ...इन सभी प्रश्नों का जवाब लगभग 'ना' ही है! अगर हम बात ..लागत कि ही करें तो..हमारे किसानों के पास कोई आकंड़ा नहीं होता ...! एक बड़ी अहम बात कहना चाहूंगा..कि हमारे देश में बौत से ऐसे किसान है...जो अपने फसलों से कोई मुनाफा अर्जित नहीं कर रहे हैं, बावजूद इसके किसी परम्परा कि तरह प्रतिवर्ष उसी फसल कि खेती में लीन हैं! हर वर्ष साहूकार से कर्ज लेकर अनियंत्रित मात्र में उर्वरक/ कीटनाशक का प्रयोग करते हैं..और उनके फसल कि आय साहूकार का कर्ज और अन्य लागतों में ही वसूल हो जाती है!
यह बात सही है कि आज हमारे देश के व्यापारियों, व्यवसायियों को समाज का एक बेईमान चेहरा माना जाता हैं, अधिक से अधिक मुनाफा कमाने कि उनकी सोच और उसके लिए अपनायी जाने वाली कायशैली किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं मानी जा सकती हैं, इसके विपरीत मुझे गर्व हैं कि हमारे किसान भाई इस देश का सर्वाधिक ईमानदार चेहरा हैं ! उनके घरों में पैसे कम हो सकते हैं.. लेकिन ह्रदय में छल, कपट, चोरी-बेईमानी, और पैसे के लिए हर हद जाने कि सोच नहीं होती है! लेकिन हमारे किसान भाइयों को समझना होगा कि...अपने आदर्शों के साथ भी कृषि व्यवसाय से प्रयाप्त आय प्राप्त किया जा सकता हैं, इसके लिए एक कर्तव्यनिष्ठ व्यवसायी कि सोच पैदा करनी होगी! एक पक्के व्यसायी कि तरह अपनी आय-व्यव और मुनाफे का हिसाब रखने कि आदत डालनी होगी!
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Friday, 11 September 2015

"ईश्वरीय शक्ति क्या हैं?

सभी आदरणीय,सादर नमन!
मैंने एक प्रश्न के माध्यम से आप सभी मित्रों का ध्यान धर्म के एक बेहद महत्पूर्ण पहलु की तरफ आकृष्ट करने का प्रयास किया था, जिसे लेकर नाना प्रकार की भ्रांतियां हमारे वातावरण में वर्षो से फैलाई जाती रही हैं! वह प्रश्न था -
"ईश्वरीय शक्ति क्या हैं? यह होती हैं या नहीं?...अगर होती हैं, इसका हमारे वास्तविक जीवन पर कितना प्रभाव पड़ता हैं?"
चर्चा में कई विद्वान मित्रों ने अपनी बात रखी, कुछ शायद प्रश्न का आशय समझ नयी पाये या, कुछ ज्यादा ही गहराई में इस प्रश्न का जवाब ढूढ़ने लगे...इसलिए जवाब में स्पष्टता बेहद कम थी ! हालाँकि एक प्रिय मित्र जी ने बड़े ही सटीक और प्रभावशाली उदाहरण के साथ इस पहलु को छूने का प्रयास किया !
वस्तुतः सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि ...इस प्रश्न में मैंने ईश्वरीय तत्व और उसकी ऊर्जा के व्यवहारिक पक्ष पर चिंतन के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन कुछ मेरे विद्वान मित्र इसे धार्मिक ग्रंथों से सम्बंधित समझने लगे ! आइये हम सब पुनः इस चिंतन को थोड़ी और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ाते हैं...
इस सन्दर्भ में मैंने स्वयं स्वतंत्र (किसी शास्त्र, व्यक्ति, संस्था से प्रभावित हुए बिना ) चिंतन किया हैं, और बिन्दुवार ढंग से अपना पक्ष रख रहा हूँ...आप सभी से निवेदन हैं की हम सब मिलकर इसे उचित निष्कर्ष पर पहुचाएं !
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1. मित्रों, जहाँ तक प्रश्न ईश्वरीय शक्ति के होने या न होने से हैं ,...मैंने पाया कि ''ईश्वरीय शक्ति है''
2. अहम प्रश्न हैं 'ईश्वरीय/दैवीय शक्ति क्या है?'' ...अर्थात इसे सामान्य व्यव्हार में कौन सी ऊर्जा के रूप में पहचाना जा सकता है! यहाँ हमें बेहद स्पष्टता के साथ समझना होगा कि...चूँकि धर्म तत्व के रूप में प्रचारित किया गया हैं इसलिए इसे ईश्वरीय या दैवीय शक्ति के रूप में जाना जाता है ! वास्तव में ''यह एक प्रकार की काल्पनिक ऊर्जा हैं, जो एक आभाषी चरित्र पर विश्वास से पैदा होती है'' ! एक व्यक्ति जब मुश्किल में होता है, तब वह अपने धर्म (आस्था) से जुड़े ईश्वर को याद करता हैं, जैसे ही वह ईश्वर कि कल्पना करता हैं...उसे लगता हैं कि अब मेरे साथ कोई हैं,... कोई हैं जो मुझे इस संकट से निकाल ले जायेगा ...उसका यह महसूस करना ही उसे आत्म प्रेरित कर देता हैं,..तत्क्षण में उसके अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती हैं, जिसे हम ईश्वरीय शक्ति के रूप में वर्णित करते रहे हैं''
3. यहाँ एक और बात हमें गौर करनी होगी कि ...ईश्वर का नाम लेने से कोई बाह्य ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश नहीं करती हैं, यह सिर्फ हमारा वहम हैं...अपितु यह हमारी आंतरिक ऊर्जा ही हैं! चूँकि लोगों कि यह आस्था है उस तत्व में ..(भले वह तत्व काल्पनिक ही क्यों न हो)...कि मेरे भगवान/अल्लाह/गॉड मेरे साथ हैं, मेरे पीछे खड़े हैं, वे मेरा बुरा नहीं होंगे देंगे ....यह विश्वास ही उसकी निराश और सुस्त पड़ी ज्ञाननेद्रियों को नवजागृत कर देता हैं...और सभी ज्ञाननेद्रियां मिलकर नया जोश और सकारात्मक ऊर्जा पैदा करती हैं!
4. जहाँ तक इस ऊर्जा के हमारे जीवन में प्रभावकारी होने का प्रश्न हैं,..यह सिर्फ आस्था पर निर्भर करता है! कुछ लोग मिलकर जब कोई बड़ी भारी वस्तु उठाते हैं...वे ईश्वर कि जय लगाते हैं...जिससे उनकी ऊर्जा केंद्रित हो जाती हैं... कार्य निश्चय ही आसान हो जाता हैं ! हम सबने एक फिल्म देखी थी....'थ्री इडियट' जिसमे अभिनेता आमिर खान अपने गांव का किस्सा सुनाते हैं...कि गांव का चौकीदार सबको 'आल इज वेल' बोलकर आराम से सुला देता था...और लोग उसपर पूर्ण विश्वास कर आराम कि नींद सो भी जाते थे...बाद में पता चला वह तो अँधा था ! ... हकीकत यही हैं कि ...हम किसी भी मुसीबत में हों, मौत के दरवाजे पर ही क्यों न खड़े हो...यह भ्रम ही हैं कि कोई धनुष-बाण लेकर हमारी रक्षा करने आएंगे ! जो भी संभावनाएं हैं..खुद की ऊर्जा से हैं! इंसान कोई चार्जेबल रोबोट नहीं ...जिसे बाहरी ऊर्जा से चार्ज कर जीवन का गुजर किया जा सके !
-के.कुमार 'अभिषेक'

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...