Friday, 24 July 2015

लोकतंत्र के मंदिर में अलोकतांत्रिक पुजारी

पिछले तीन दिनों से संसद की कार्यवाही ठप्प की जा रही हैं ! हालात इस हद तक अलोकतांत्रिक हो गए हैं कि, लोकतंत्र का मंदिर गैर-जिम्मेदारों का अड्डा नजर आने लगा हैं! हर बार की तरह सत्ता पक्ष के द्वारा मिडिया और जनता में यह सन्देश देने का प्रयास किया गया की..वे सदन की कार्यवाही को लेकर गंभीर हैं, विपक्ष के साथ मिलकर जनता के हितों पर चर्चा हेतु माहौल बनाने के लिए संकल्पित हैं! लेकिन अब तक यह स्पष्ट हो चूका हैं कि,  सदन की कार्यवाही के प्रति न तो सत्ता पक्ष गंभीर हैं..और न ही विपक्ष ! अजीब तो यह भी हैं, कि दोनों सदनों के माननीय अध्यक्ष का कार्यव्यहार भी किसी कुछ खास उत्साहजनक नहीं दिख रहा हैं! ऐसा लगता हैं, जैसे वे सदन की कार्यवाही टालने को ही बैठे हैं..! वास्तव में यह स्थिति लोकतंत्र में बढ़ती अलोकतांत्रिक प्रवृति  का परिचायक हैं! नेताओं को इस बात का तनिक भी खौफ नहीं हैं, की जनता की अदालत में उन्हें अपने कामों का हिसाब भी देना हैं! हकीकत तो यह भी हैं कि ,हम भारतीयों ने कभी यह जानने कि कोशिस ही नहीं कि ......दुबारा वोट मांगने आये जनप्रतिनिधि ने संसद में कैसा प्रदर्शन किया हैं? कितनी बार वे संसद में मौजूद रहे, कितनी चर्चा में भाग लिए और  कितने सवाल पूछे ?  ....इन बातों से तो हमें लेना-देना ही नहीं होता है...समझना मुश्किल नहीं कि, जब लोकतंत्र में 'लोक' ही अपना कर्तव्य भूल जाएँ, ..फिर 'तंत्र'  कि यही दशा और दिशा हो सकती है! इसी तरह नेताजी हो-हल्ला मचाएंगे...और संसद ठप्प कर मौज फरमाएंगे !  

                                          लोकतंत्र के मंदिर में नेताओं का अलोकतांत्रिक कार्यव्यवहार बेहद निंदनीय हैं,..लेकिन वास्तविक हकीकत तो और भी कड़वा हैं! जैसा की हम सभी जानते हैं, पिछले लगभग दो माह में इस सरकार की साख काफी नीचे गिरा हैं ! बात ...'ललित गेट' की हो या मध्यप्रदेश के खुनी रूप धारण कर चुके व्यापम घोटाले की...लगातार विपक्ष ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया हैं ! विदेश मंत्री और भाजपा कि वरिष्टतम नेत्री सुषमा स्वराज का एक ऐसे राष्ट्रद्रोही अपराधी के उप्पर 'मानवता का मोह आना'. ..जो देश का भगोड़ा हैं,.,.. उस देश में मजाक नहीं हो सकता हैं, जहाँ कानून का राज चलने की बात कही जाती है ! जिस भगोड़े को देश की कई जाँच एजेंसियां करोड़ों के घोटाले और 'मनी लॉन्ड्रिंग' में पकड़ने की फ़िराक में लगी हुई हैं, ...उसी ललित मोदी को राजस्थान कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने लन्दन में छुपने में मदद करने का काम किया हैं...उसकी क़ानूनी गारंटी दी गयीं है! ...संभव हैं...नयी सरकार ने सत्ता सँभालते ही 'मानवता' के पैमाने बदल दिए हों...अब अपराधियों का संरक्षण मानवता बन गया हों...लेकिन मध्यप्रदेश में जो कुछ हो रहा हैं, किसी पैमाने का मोहताज नहीं है! आज़ादी के बाद शायद यह पहली बार ऐसा हो रहा हैं...की बड़ी संख्या में आरोपितों को एक-एक कर संदिग्ध मौत का शिकार होना पड़ रहा हैं , देश में खौफ का माहौल बनता जा रहा हैं, अन्य आरोपियों का परिवार ...सुरक्षा की गुहार लगा रहा हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है ! व्यापम घोटाले में ४८ लोगों की मौत महज एक संयोग कैसे माना जा सकता हैं, इस घटना की कवरेज करने गए के पत्रकार की मौत महज एक संयोग कैसे हो सकता है,...क्या हमारी सरकार ने  मानवता के साथ-साथ 'संयोग' की भी परिभाषा बदल दी? उन्हें जवाब देना चाहिए !
विशेषकर माननीय प्रधानमंत्री जी, जो लगभग हर छोटे-बड़े मुद्दे पर ...लम्बा-चौड़ा बोलते हैं, जनता से अपने मन की हर बात कहते हैं, हमें उमीदें थी की जरूर बोलेंगे !...ईरान में विमान दुर्घटना पर २० मिनट के बाद ही संवेदना ट्वीट करने वाले ...हम सब के चहेते प्रधामंत्री जी...महीनों बाद ही सही अपनी सरकार, अपनी पार्टी और बड़े नेताओं के उप्पर लगे आरोपों पर सफाई अवश्य देंगे...लेकिन आश्चर्य हैं की ऐसा होता नहीं दिखा रहा हैं! ....प्रधानमंत्री जी न तो सदन में सफाई देने के इक्छुक दिख रहे हैं, और न ही आरोपियों पर कोई करवाई करना चाहते हैं! मन के किसी कोने में यह सवाल उठता हैं...क्या ये वही मोदी जी हैं, जिन्हे कुत्ते के बच्चे के गाड़ी के नीचे आने से भी हमदर्दी होती थे? दुनिया के देशों में हमदर्दी बाँटने वाले सख्स की आत्मा... ४८ लोगों की मौत पर शांत क्यों हैं? 

अत्यंत ही दुर्भाग्य है कि, एक तरफ भाजपा सरकार ...आरोपियों पर कोई करवाई नहीं करना चाहती हैं, इसके विपरीत कांग्रेस को चुप करने के लिए घोटाले के बदले घोटाले उजागर करने की नीति पर चल रहीं हैं! पिछले दो दिनों में व्यापम और ललित प्रकरण के ..जवाब के रूप में कोंग्रेसी मुख्यमंत्रियों 'हरीश रावत' और 'वीरभद्र' पर घोटालें के आरोप लगाये रहे हैं! ऐसे में एक पल को यही अहसास होता हैं...की भाजपा कहीं न कहीं कांग्रेस को ब्लैकमेल करना चाहती हैं, यह सबक देना चाहती हैं की...हमारे  घोटाले उजागर करोगे,..बदले में हम भी तुम्हारे काले चिठे खोल देंगे...! कहीं न कहीं भाजपा ने कांग्रेस की नब्ज पकड़ ली हैं..! प्रश्न उठता हैं की...हरीश रावत और वीरभद्र के गलत साबित होने मात्र से ..क्या शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और सुषमा स्वराज...सही साबित हो जायेंगे ? ....भाजपा एक राजनैतिक दल हैं, इस नाते उसे कांग्रेस के विरुद्ध राजनीति करने का अधिकार हैं, ....लेकिन अपने उप्पर उठ रहे सवालों का जवाब देना ही होगा, ! ४८ लोगों की मौत ...सिर्फ कांग्रेस का मुद्दा नहीं हैं, देश का मुद्दा हैं...आप कांग्रेस को ब्लैकमेल कर सकते हैं...लेकिन जनता को न करें...तो बेहतर है ! केंद्र सरकार को कोंग्रेसी मुख्यमंत्रियों का इस्तीफा मांगने से पहले... अपने मुख्यमंत्रियों पर स्वेच्छा से करवाई करनी होगी, ....और सभी मामलों की निस्पक्ष जाँच करनी होगी! जो भी दोषी पाया जाएँ.. उसे सजा मिलनी ही चाहिए ! संसद चलाना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिमेदारी है, लेकिन सत्ता पक्ष को ज्यादा गंभीर होना होगा! साथ ही इस बात को भी समझना होगा की..., ...विपक्ष में रहकर आपने बड़े-सवाल दागे थे, अब आप विपक्ष में नहीं सरकार में हैं..अब आप को जवाब देने की आदत डालनी होगी ! और हाँ...सवाल के बदले सवाल का तातपर्य जनता अच्छी तरह जनता हैं...! जो स्थिति बन रही हैं...जनता में यही सन्देश जा रहा हैं...२०१४ में चेहरे ही बदले थे, समूह ही बदले ....बाकि तो वहीँ है! 
            -K.Kumar 'Abhishek' /24-07-2015

Tuesday, 7 July 2015

'विकास' की कसौटी

                                            -K.Kumar Abhishek (07/07/2015)
आज इंसान सोते-जागते, उठते -बैठते विकास की बात कर रहा हैं!चार लोग जुटे नहीं कि गली-मुहल्लों, चौक चौराहों,..चाय से लेकर पान कि दुकानों पर  विकास कि पाठशाला शुरू हो जाती है | विशेषकर जब मौसम चुनाव का हो, ऐसा लगता है जैसे फिजाओं में ही विकास बह रहा हैं, नेताओं के लाउडस्पीकर से विकास कि ब्यार बहने लगती है | कहीं विकास के दावे होते हैं..कहीं विकास के वादे होते हैं | वादों और दावों के भंवर में उलझा मतदाता सिर्फ 'विकास' कि सम्भावनायें बार-बार ढूढ़ने कि कोशिश करता हैं....लेकिन न तो वह सफल होता हैं, और न ही असफल होने का अहसास कर पाता हैं | वास्तव में आज हर आम और खास... चाहें वो नेता हो, अधिकारी-पदाधिकारी, पत्रकार, लेखक-विश्लेषक हो ...या, गांव में रोजी-रोटी को तरसता निर्धन गरीब...सभी इस 'विकास' के लिए दौड़ रहे हैं, सबकी यह चाहत है की एक बार 'विकास' को हासिल कर लिया जाये लोगों की इस जुनूनी दौड़ को देखकर ...एक सवाल मन के एक कोने में उत्पन्न होता है,...जिस विकास की दौड़ में हम जी-जान से लगे हैं, क्या यही वह 'विकास' हैं, जिसमे सर्वांगीण विकास की अवधारणा पूर्ण होती हैं? क्या यही वह विकास है, जिसमे मानवीय मूल्यों के साथ सम्पूर्ण जीवनशैली का औचित्य सिद्ध होता है?

जब भी हम मानव जीवन में साकारात्मक परिवर्तन के साथ सम्पूर्ण मानवीय विकास की अवधारणा को समझने का प्रयास करेंगे ..हमें ज्ञात होगा की विकास के कई पक्ष है, ..जैसे सामाजिक विकास, सांस्कृतिक विकास, शैक्षणिक विकास, आर्थिक विकास, तकनिकी विकासव्यवहारिक एवं वैचारिक विकास, जीवनयापन हेतु ढांचागत बुनियादी विकास..आदि-आदि | इन सभी खण्डों का सम्मिलित और संतुलित रूप ही सही मायनों में व्यक्ति, समाज, और राष्ट्र के लिए सर्वांगीण विकास की संरचना तैयार कर सकता हैं | इनमे से सिर्फ एक या दो खण्डों पर जोर देकर हम मानव जीवन में असंतुलन ही पैदा करेंगे....और ऐसा होना सम्पूर्ण सृष्टि के लिए विनाशक साबित होगा | लेकिन दुर्भाग्य है, बड़ी तेजी से हमारे समाज में ऐसा हो रहा हैं....और हम सभी विकास के एक खंड 'आर्थिक विकास' के लिए दौड़े जा रहे हैं | आज रुपयों के पीछे भागती इस दुनिया के लिए विकास के अन्य पक्ष विलुप्त से हो गए हैं! लगातार हम एक ऐसे वातावरण में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ पैसों को ही सबकुछ मानने वाली सोच पैदा हो रही हैं और  अगर हम आज अपने समाज की सही विवेचना कर सकें ..समझना मुश्किल नहीं होगा कि, इस नकारात्मक सोच के दुष्परिणाम भी दिखने लगे है | आज दिन-प्रतिदिन इंसान का नैतिक पतन हो रहा हैं | लगातार हम अपनी सभ्यता-संस्कृति की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं | पास-पड़ोस के लोगों से अशिष्ट व्यव्हार बढ़ता ही जा रहा हैं | हर गुजरते दिन के साथ हम व्यवहारिक  अज्ञानता और मानसिक गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं | शिक्षा का तातपर्य ज्ञानोपार्जन नहीं..धनोपार्जन हो गया हैं, और सिर्फ प्रमाणपत्रों की प्राप्ति ही विद्यालय जाने का उदेश्य बन गया है | पैसों की इस अंधी दौड़ ने हमारी सामाजिकता, नैतिकता, व्यवहारिक मान-सम्मान, सभ्यता-संस्कृति के साथ-साथ सम्पूंर्ण मानवीय मूल्यों को दांव पर लगाने का कार्य किया है | विशेषकर इसकी जद में इस देश और समाज का भविष्यहमारी युवा पीढ़ी और बच्चे हैं, जो खेलने-कूदने और शिक्षा ग्रहण करने की उम्र में पैसा कमाने के लिए कुछ भी कर-गुजरने वाली सोच से प्रेरित हो रहे हैं | घर में ज्यादा से ज्यादा पैसा लाने वाले को सर्वाधिक सम्मान मिलता हैं, चाहें वो पैसा चोरी-बेईमानी से ही क्यों न हासिल किया गया हो | ईमानदारी की रोटी खाने वाले लोग लगातार हासिये पर जा रहे हैं,...और उन्हें समाज में 'पागल' माना जाने लगा है परिवार और समाज में तिरस्कृत होते-होते वे अपनी नजरों में भी गिरने लगे हैं....ऐसे में मजबूरन ही सही,अपना अस्तित्व बचाने की खातिर वे भी इस दौड़ का हिस्सा बनने को विवश हो रहे हैं |

उपरोक्त हालत हमारे भविष्य की बेहद भयानक तस्वीर पेश करते हैं | एक ऐसे समाज की परिकल्पना होती है..जिसमे पूंजीवाद ही समाजवाद की जगह लेगा | जहाँ आर्थिक विकास की अवधारणा के साथ फल-फूल रहा 'आर्थिक भ्रष्टाचार' अपने चरमोत्कर्ष पर होगा | चोरी, बेईमानी, ठगी, जालसाजी जैसी अनैतिक घटनाएँ खुल्लेआम होंगी | आर्थिक अपराध के नए-नए तरीके इर्जाद होंगे | परिवारवाले पैसा लाने के लिए हर हद तक जाने को प्रेरित करेंगे..और एक ऐसा समय आएगा जब पुत्र पैसे के लिए अपने परिवार वालों का भी क़त्ल करेगा | इंसान पैसे की न मिटने वाली भूख शांत करने के लिए बार-बार अपने पद- प्रतिष्ठा और मूल्यों का सौदा करेगा | इंसानी सबंध भी व्यापारिक सबंध बन जायेंगे | मित्रता की कसौटी पैसा होगी...और प्रेम भी अपना मूल्य मांगेगा | वास्तव में ऐसे समाज की कल्पना मात्र से ही हमारी रूह कांप जाती है ...लेकिन हकीकत तो यही है की हर निकलते दिन के साथ हम इस भयावह हकीकत को आत्मसात करने की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं |
आज हम सभी को इस विषय पर गहराई से चिंतन करना होगा, इसके लिए हमें पश्चिमी देशों की जीवनशैली से भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता है, जो कहने को विकसित राष्ट्र तो हैं, रुपया-पैसा, धन-दौलत बहुत ज्यादा है..लेकिन सभ्यता-संस्कृति कहाँ हैक्या हम उस भारतीय जीवन की कल्पना कर सकते हैं...जहाँ माता-पिता पैसा कमाने की होड़ में अपने परिवार के प्रति कर्तव्यों को भूल जाएँ? पश्चिमी देशों की हकीकत तो यही है ..आज  माताओं को बच्चा पैदा करना भी घाटे का सौदा लगता है, इसलिए किराये की कोख में बच्चे पैदा करने की कोशिश करने लगी है ! समझना मुश्किल नहीं की..जिस माता-पिता के पास बच्चे को जन्म देने का समय नहीं...वह बच्चे बेहतर पालन-पोषण कैसे दे सकते है? १० दिन के बच्चे को 'पालन घरों' में छोड़ कर दौलत कमाने और अय्यासी करने वाले माता-पिता कभी बच्चे के प्रति संजीदा नहीं हो पाते...जिस कारण वह बच्चा भी बड़ा होकर 'माता-पिता' और 'परिवार' का सही मतलब नहीं समझ पाता है | स्पष्ट है की माता-पिता पैसा कमाते हैं..और पैसा ही बच्चों का पालन-पोषण करता हैं..इसलिए बच्चा भी बड़ा होकर पैसा को ही सबकुछ मांनता है | इससे भी सर्वाधिक दयनीय स्थिति पश्चिमी देशों में परिवार के वृद्ध व्यक्तियों की होती है...बेटा-बहु पैसा कमाने की होड़ में माता-पिता की देख-भाल नहीं करते....उससे भी शरणक यह कि, शरीर से अस्वस्थ हो चुके वृद्धों को धक्के मारकर घर से  बाहर निकल दिया जाता है | आज हमारे कई शहरों में खुल चुके 'वृद्ध आश्रम ' पश्चिमी जीवनशैली की ही उपज हैं......हमें सोचना होगा, क्या हम इसके लिए तैयार हैं


ये सही है की आज के भौतिकवादी युग में एक बेहतर जीवन गुजरने के लिए पैसा सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है, लेकिन यह कहना पूर्णतः गलत हैं की पैसा ही सबकुछ है | हमे इस देश को ऐसी सोच से बचाना होगा कि...सिर्फ धन की प्राप्ति ही विकास है | इसके लिए हमें एक ऐसी वैचारिक संरचना तैयार करनी होगी ..जिससे हमारी आने वाली पीढी आर्थिक विकास के साथ-साथ शैक्षणिक, मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, और व्यवहारिक विकास का महत्वा भी समझ पाये...और इसे अपने जीवन में उतार सके | तभी हम सही अर्थों में सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त कर, राष्ट्र और समाज को एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर पाएंगे | कहते हैं जब तक परिवर्तन का प्रयास हर स्तर से न हो, यह सिर्फ एक शब्द बन के रह जायेगा | आज जरुरत है की हम सभी 'विकास' की सही अर्थ समझें...और समझाएं | विशेषकर हमारे समाज के बुद्धिजीवी, लेखक-विचारक,पत्रकार, समाजसेवी..जो अब तक विकास की घिसी-पिटी परिभाषा का समर्थन करते रहे हैं....आगे आएं और समाज को सही दिशा दिखायें | साथ ही हमारे माननीय नेतागण अगर संभव हो तो ...अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के प्रयास में ...अफवाहों की आंच न लगाएं तो समाज पर बड़ी मेहरबानी होगी | हम सभी को मिलकर हर हाल में यह तय करना होगा की.....हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में विकास की ऐसी रफ़्तार पकड़ें, जो सभी मानकों के अनुरूप हों और जब हम अपने मंजिल पर  पहुंचे ..हमारी मर्यादा, हमारे मूल्य, हमारी सभ्यता और संस्कृति जमापूंजी के रूप में हमारे साथ हो | हम सब मिलकर विकास का ऐसा स्वप्न संजोएं...जहाँ लोगों के पास शिष्टता भी होगी, ज्ञान-विज्ञानं भी होगा, स्वास्थ्य भी होगा, सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ ढेर सारा पैसा भी हो |



हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...