Sunday, 12 April 2015

''कहाँ हैं गांधी का देश''

सादर सुप्रभात मित्रों, बड़े दिनों बाद अपनी नासमझी को मैंने शब्दों में ढाल कर 'काव्य रूप' देने की सफल नादानी की है! साथ ही मुझे इस बात का पूर्ण अहसास है की आपलोग चाहकर भी अंडे-टमाटर नहीं मार सकते ! तो पेश है ... आप सभी को समर्पित मेरी 'काव्य रचना' ...
''कहाँ हैं गांधी का देश'' !
शमां बदली, सूरत बदला,
बदल गया है परिवेश! 
अतीत के पन्ने चीख रहे हैं 
कहाँ है? गांधी का देश-2
जिस चमन में थी सादगी,
जहाँ हर घर था, सच्चाई का डेरा !
जहाँ 'निष्ठां' की नींव थी,
हर ह्रदय 'प्रतिष्ठा' का बसेरा !
समय की आँधियों में क्या बचा, अवशेष !
अतीत की पन्ने चीख रहे,
कहाँ है? गांधी का देश !-2
सत्यपथ में मिले कांटें,
ईमान की बगिया में था भले अँधेरा !
हर सख्स जहाँ दया की मूरत,
हर यौवन, मासूम सा चेहरा ! 
बदला जीवन, भरा पड़ा क्लेश , 
अतीत के पन्ने चीख रहे,
कहाँ है? गांधी का देश !-2
जहाँ प्रेम की नदिया बहती, 
हर नदी में अमृत गहरा !
जहाँ हर खेत उगलती सोना,
हर मैदान था, हरा-भरा !
विश्व ने पहचाना 'संस्कृति विशेष',
अतीत के पन्नें चीख रहे हैं,
कहाँ है? गांधी का देश !-2
दादी की परियां और नानी की गुड़िया,
हर बचपन था, मस्ती भरा ! 
पेड़ो की डाल पर झूमता यौवन,
पल-पल में रंग बदलती धरा !
कहाँ गयी विरासत, क्या बचा है शेष,
अतीत के पन्नें चीख रहे,
कहाँ है? गांधी का देश !-२
- के.कुमार 'अभिषेक'
(३०/०३/२०१५)

''मैं युवा हूँ''

प्रिय मित्रों, जैसा की आप सभी जानते है, ''काव्य रचना की श्रृंखला'' नामक एक साहित्यिक कार्यक्रम के तहत आदरणीय Jawahar Lal Singh जी के द्वारा मुझे नामित किया गया था! इस प्रयास को आगे बढ़ाते हुए..मैं अपनी दूसरी रचना आप सभी के समक्ष रख रहा हूँ..और आज मैं 'काव्य रचना की श्रृंखला'' का ''बैटन'' गर्व के साथ ....हमारी बड़ी बहन और वरिष्ठ कवियित्री आदरणीय Nisha Kulshreshtha जी को समर्पित करता हूँ! उमीद करता हूँ की आप भी इस कार्यक्रम की परम्परा का सर्वोत्कृष्ट निर्वाह करेंगी..! 
एक बार पुनः कहूँगा..मैं कवि नहीं हूँ! राष्ट्र और समाज के प्रति मेरे हृदय से निकलने वाला उद्गार...न समझ पाने वालों के लिए एक तुकबंदी ...पेश है
''मैं युवा हूँ''
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एक सुबह-सवेरे आईने में,
खुद को संवार रहा था !
अपनी ही तस्वीर से उलझा ,
अंतःकरण को पुकार रहा था !
सहसा आईने से एक आवाज गूंजा,
तुम कौन हो? हो युवा..या कोई और दूजा!
निःशब्द हुआ, मैंने खुद को संभाला,
'मैं युवा हूँ', गर्व से कह डाला !
उसने कानों पर एक और प्रहार किया,
तुनकमिजाजी से जोरदार उपहास किया !
कड़क आवाज में बोला ..कौन युवा?
जो स्कूलों में मासूमों का मार रहा,
जो विश्वशांति पर बन खतरा
जिहाद को ललकार रहा ! 
जो इराक में अपनों को काट रहा,
जाति-धर्म के नाम पर मानवता को बाँट रहा!
जो नशाखोरी के लत में डूबा,
संस्कृति को दुत्कार रहा!
जो भूल गया नारी सम्मान
माँ-बहनों के इज्जत से कर खिलवाड़ रहा!
प्यारे, तुम कौन हों?
जो नेताओं का भीड़ बन,
जनता को फटकार रहा,
जो धर्म के ठेकेदारों का बना पिछलग्गू,
कर अंधभक्ति का प्रचार रहा !
जो हीरोगिरी के चक्कर में, 
असभ्यता को अपना रहा!
जिसकी अपनी न कोई सोच,
बिन लक्ष्य, पथिक बढ़ता जा रहा !
प्यारे तुम कौन हो?
मैंने कहा, 
चुप कर, ज्यादा न बोल ! 
तू मेरी ही तस्वीर हैं !
जो जैसा भी है, ..हैं 'युवा' '
ये उसकी ही तक़दीर है!
शांति रखों, सुनो अब मेरी बात,
बहुत हुआ, अब न उधेङोँ मेरे जज्बात!
मैं वो युवा हूँ,
जो छात्र बन, पेशावर में मारा जाता हूँ ,
पत्रकार बन, इराक में काटा जाता हूँ ,
सीरिया में क़त्ल होता मेरा,
धर्म के नाम पर, कश्मीर में बांटा जाता है!
नेताओं की यारी है मुझसे,
धर्म की ठेकेदारी है मुझसे,
सबके झंडे उठा, आगे बढ़ता जाता हूँ!
हर शाम हासिल करता शून्य,
हर रात शून्य में खो जाता हूँ!
फिक्रमंद न कोई अब मेरा,
वक्त की घडी में न कोई पहचान हमारा!
हर हाथ खिलौना बन जाता हूँ!
प्लीज़ मत कर यार,
मैं 'अभि' जैसा भी हूँ, 'युवा' ही कहलाता हूँ! 
- आप सभी के प्रेम/आशीर्वाद का आकांक्षी 
के.कुमार सिंह 'अभिषेक' 
(12/04/2015)

Saturday, 11 April 2015

गले लगो प्यारों, हो रहा नया सवेरा है!

प्रिय मित्रों, साहित्य के प्रति आज के समाज में नव-चेतना जगाने के उदेश्य से ..''काव्य रचना की श्रृंखला'' नामक एक महत्वपूर्ण प्रयास आरम्भ किया गया है! इस प्रयास के तहत गुरूजी आदरणीय Jawahar Lal Singh जी के द्वारा.मुझे नामित किया गया है! हालाँकि मैं स्वयं को कवि नहीं मानता ..हाँ, ह्रदय की आवाज कभी स्याह रंग बन कागज पर बिखर जाती है, जिसे मेरे मित्र कविता का नाम दे देते हैं! बावजूद इसके, इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए..मैं अपनी प्रथम रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ! साथ ही मैं अपने इस प्रयास को आगे बढ़ाते हुए....बड़े भाई ..कवि श्रेष्ठ, आदरणीय Awanish Tripathiजी को 'बैटन' समर्पित करता हूँ!
(आज एक युवा ह्रदय ..अपने देशवासियों, बंधू/बांधवों से एक प्रार्थना करना चाहता हैं,....
ये सूरज तेरा, न चंदा मेरा हैं,
ये धरा तेरा, न पर्वत मेरा है, 
हर कोई संगी-साथी अपना, 
न कोई दुश्मन हमारा है,
गले लगो प्यारों, 
हो रहा नया सवेरा है!
नफरत की आंधिया है,
पतझड़ का बसेरा हैं,
खून जिसका कल गिरा था,
मजहब में बंटा, भाई हमारा है !
धीरज धरो यारों,
हो रहा नया सवेरा है!
नया दौर हैं, नयी बातें ,
मजहब न रोके अपनी मुलाकातें,
जातियों का न हो बंधन,
रंग-रूप का न हो उलझन,
ऐसा देश ..तेरा-मेरा हो,
.कदम मिलाओ यारों 
हो रहा नया सवेरा हैं!
हर हिन्दू हो अपना,
मुस्लिम न पराया है,
जैन, बौद्ध और सिख.
हर ईसाई ..भाई प्यारा है!
जन्मभूमि भी हर्ष करे,
ऐसा कर्म तेरा-मेरा हो,
आगे बड़ों प्यारों,
हो रहा नया सवेरा हैं!
फले-फुले ये चमन,
न कभी अँधियारा हो ,
२१वीं सदी हैं अपनी,
ये वतन 'हिंदोस्ता' हमारा हैं,
हाथ बढ़ाओं यारों
हो रहा नया सवेरा है!
प्लीज़, 
गले लगो प्यारों ,
हो रहा 'अभि' सवेरा है!
- आप सब के प्यार/दुलार/आशीर्वाद का आकांक्षी
के.कुमार 'अभिषेक'
(12/04/2015))

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...