Sunday, 23 November 2014

युवा नजर में, ‘युवा भारत’

                                                    -K.Kumar 'Abhishek' /23-11-2014
पिछले दिनों सयुक्त राष्ट्रसंघ की एक संस्था( यु. एन.एफ.पी. ऐ ) ने वर्ष २०१४ की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी किया, जिसमे भारत को सर्वाधिक युवाओं वाला देश घोषित किया गया! रिपोर्ट के अनुसार आज भारत की कुल जनसंख्या का २८% हिस्सा (लगभग ३० करोड़ ५० लाख ) १०-२४ आयु वर्ग का है ! इस रिपोर्ट के आने के साथ ही देशवासियों में एक मजबूत, सशक्त और विकसित भारत को लेकर नयी उमीदे जगी है! अपितु इस रिपोर्ट में भी भारत की संभावनाओं को लेकर विश्वास व्यक्त किया गया है! वास्तव में जिस तरह से आज पूरा देश अपनी ‘युवा शक्ति’ को लेकर आशान्वित है, जिस तरह से लोग युवा कंधों पर भारत को एक वैश्विक महाशक्ति बनने की तरफ अग्रसर होते देखने की कामनाएं कर रहे है, ….मुझे लगता है की हमें ‘सपनो की बुनियाद’ को समझने का प्रयास करना होगा! हमें आज के युवा भारत कि वास्तविकता को समझने का प्रयास करना होगा! स्वयं एक युवा होने के बावजूद मैं आशंकित हूँ कि , क्या वास्तव में हम देश को अपने कंधों पर वह गति देने को तैयार है? क्या हम उस दिशा में अग्रसर है कि करोडो देशवासियों कि उमीदों का भारत बना सकें ? अपनी भावनाओ को दरकिनार कर, इन प्रश्नो का जवाब ढूढ़ना ही होगा !
किसी भी राष्ट्र कि ‘युवाशक्ति’ उस देश कि जमापूंजी होती हैं, जो भविष्य की संभावनाओं का प्रतिक होती हैं! मुझे लगता है की अपने देश की जमापूंजी के रूप में हमारी भूमिका बेहद संदेहास्पद है ! वास्तव में हम अपनी राह से भटक गए है, और उस राह पर है जहाँ से ‘सपनों के भारत’ की उमीदें लगाना भी बेमानी है,! आज जिस युवा भारत पर पूरा देश गौरवान्वित नजरों से देख रहा है…उस भारत की कमियों, खामियों, समस्याओं, और वर्तमान परिस्थिति को गंभीरता से समझना होगा! इस प्रयास में आइये देखते है. ‘युवा भारत’ कि वर्तमान दशा और दिशा, मेरी ‘युवा नजर’से-

## नशाखोरी :- नशाखोरी हम युवाओं की सबसे गंभीर समस्या है ! आज जिस तरह से हम युवाओं में अपने आपको आधुनिक और फ़िल्मी दिखने के प्रयास में मादक पदार्थों के सेवन का प्रचलन बढ़ रहा है.वास्तव में एक व्यक्ति के रूप में हमारी संभावनाओं पर प्रश्नचिन्ह लग चूका है! दुर्भाग्य तो यह कि, आज हम युवाओं में यह ग़लतफ़हमी पैदा हो चुकी है की बड़ा आदमी बनने के लिए ‘नशायुक्त जीवनशैली अपनाना आवश्यक है और इस प्रयास में हम छात्र जीवन में ही अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई को नशे के ठेकेदारों के यहाँ पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं! आज हम शराब की बोतलों में आधुनिकता ढूढ़ने का प्रयास कर रहे है ! क्या यह स्थिति हमारी दिशाहीनता का परिचायक नहीं है?..हमें सोचना होगा ! जो ‘युवा’ स्वयं नशे में चूर हो, जो मानसिक और वैचारिक रूप से अपंगता का शिकार हो..कभी भी राष्ट्र और समाज को सही दिशा नहीं दिखा सकता है…अपितु उसे खुद दिशा दिखाने कि आवश्यकता है! ऐसे पथभ्रष्ट ‘युवाशक्ति’ किसी राष्ट्र कि जमापूंजी नहीं अपितु….किसी ‘जमा कचरे कि ढेर’ कि तरह हैं!
## प्रमाणपत्रों में सिमटी शिक्षा :- आज न जाने क्यों ऐसा लगता है कि..हम युवाओं में शिक्षा के मायने बदल गए है! आज शिक्षा का उदेश्य ‘ज्ञानोपार्जन’ नहीं सिर्फ ‘धनोपार्जन’ हो गया है! आज हर कोई सिर्फ इसलिए अध्ययन में लगा है कि उसे एक प्रमाणपत्र मिल सके..जिसके आधार पर वह सरकारी, अर्धसरकारी, या गैरसरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिए अहर्ता हासिल कर सके! इस सोच का असर ‘अध्ययन शैली’ पर पड़ रहा है! हम सिर्फ वही पढ़ना चाहते है..जो परीक्षा में संभावित हो…उससे अधिक हमें पढ़ना फिजूल लगता है…और इसी प्रयास में हम उन निजी शिक्षण संस्थानों के चक्कर लगा रहे है…जो पाठ्यक्रम को दरकिनार कर सिर्फ परीक्षाफल के लिए अध्ययन करवाते है ! प्रश्न लाजमी है कि ऐसी बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले अशिक्षित ज्ञानी देश और समाज को क्या दिशा देंगे? ऐसे लोग हमारी ‘व्यवस्था’ को क्या गति देंगे, जो खुद शिक्षा कि दुर्गति का परिणाम हो? हमें इस विषय पर गंभीरता से सोचना होगा.!..निश्चय ही इस स्थिति के लिए कई तत्व जिम्मेदार है..लेकिन समस्याओं में हमें खुद निपटना होगा ! ‘शिक्षा’ का परिचय व्यक्ति कि व्यव्हार, कार्यशैली, और विचारधारा से होता है, प्रमाणपत्रों से नहीं!

##नौकरियों कि होड़ :- ‘युवा भारत’ का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलु यह भी है की हम युवाओं के बीच नौकरियों की अंधी दौड़ सी लगी है ! किसी में भी ‘मालिक’ बनने की चाहत ही नहीं दिख रही, सभी गुलामी में ही जीवन की संभावनाएं ढूंढ रहे हैं ! आज बेरोजगारी हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है,..लेकिन इस समस्या का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलु है ‘शिक्षित बेरोजगार’ ! बुरा लगता है की लाखों रूपये खर्च कर इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसी बड़ी डिग्रियों के मालिक भी मज़बूरी का रोना रोते है, और बेरोजगारों की कतार में खड़े पाये जाते है! क्या देश इनसे यही उमीद करता है? शायद, नहीं! देश उमीद करता है की ऐसे होनहार युवा कुछ ऐसा कार्य करेंगे, जिससे देश के बाकि बेरोजगारों के लिए संभावनाएं बन सकें ! बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्यों की स्थिति इस हद तक चिंताजनक है की यहाँ परिवार वालों को ‘सरकारी नौकरी’ के अलावे कुछ नहीं दिखता है निश्चय ही इसका कारण ‘ऊपरी आमदनी का भ्रष्टाचार’ है! ऐसे बच्चे जिन के मस्तिष्क में सिर्फ एक ही सॉफ्टवेयर होता है ‘सरकारी नौकरी’ …जब जीवन में सरकारी नौकरी नहीं मिल पाती, उन्हें लगता है जीवन समाप्त हो गया! ऐसे युवा कभी पंखों से लटके मिलते है, या रेलवे पटरियों पर ! हमें सोचना होगा, क्या हम स्वरोजगार को प्रथम विकल्प के तौर पर नहीं अपना सकते? हमें आज़ादी के मायने समझने होंगे! एक इंसान के रूप में आत्मनिर्भरता कि अहमियत को समझनी होगी, तभी हम भारत को एक राष्ट्र के रूप में आत्मनिर्भरता के प्रति चिंतनशील हो सकते है! ## 

भाग्यवादी नजरिया :- यह सर्वाधिक दुखद समस्या है, एक तरफ हम अपने आपको विज्ञानं का पैरोकार कहते हैं! मंगल गृह पर पहुँचने का दम्भ भरते है ! वहीँ दूसरी तरफ आज भी मेरे करोडो साथी भाग्य,गृह-नक्षत्र और न जाने ऐसी कितनी भ्रामक विचारों में भी कैद है! ‘धर्म’ की आड़ में पैदा हुआ भाग्यवादी नजरिया, हमेशा से एक व्यक्ति, समाज व् राष्ट्र के रूप में हमारे विकास का सबसे बड़ा बाधक रहा है! वास्तव में भाग्य ने सिर्फ लोगों को कर्महीन व् गैर-जिम्मेदार बनाने का कार्य किया है! आज मेरे मित्र परीक्षाओं में असफल होते है, और कहते पाये जाते है- “उनके भाग्य में ही नहीं लिखा था” ! इसमें कोई शक नहीं की वे अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ‘भाग्य’ का रोना रो रहे है! ऐसा गैर-जिम्मेदराना नजरिया किसी भी काबिल इंसान को ना-काबिल बनाने के लिए प्रयाप्त है! इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है की ..कुछ ऐसे भी युवा है जो खुद की मेहनत से ज्यादा ‘भाग्य परिवर्तन’ को लेकर आशावान होते है! ऐसे पढ़े-लिखे लोग अनपढ़ बाबाओं की भक्ति में भी कोई कोताही नहीं करते! हाथों में अंगूठियां, गले में ताबीज ही इनके भविष्य का सहारा है! क्या ऐसे लोग जो खुद का सहारा नहीं बन पा रहे है, वे देश का सहारा बनेंगे? जिन्हे खुद की काबिलियत पर भरोसा नहीं, क्या देश इन पर भरोसा करेगा? 

 ## फ़िल्मी दुष्प्रभाव :- एक समय था, जब लोग कहते थे, बच्चों के लिए पहली पाठशाला उसका घर है और माता-पिता पहले शिक्षक! आज उसी घर में एक ऐसा सदस्य प्रवेश कर चुका है, जिसका प्रभाव बच्चों पर सर्वाधिक पड़ रहा है-टेलीविजन ! आज जिस तरह से हमारी फिल्मों में अशिष्टता,अश्लीलता, असभ्यता, नशाखोरी, और अपराधिक दृश्यों का प्रदर्शन हो रहा है, जिस तरह से स्त्री शरीर को किसी मसाले की तरफ पेश किया जा रहा है..और ऐसी फिल्मे टेलीविजन के माध्यम से हमारे घरों में पहुँच रही है,..यह देश की युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने का सबसे बड़ा कारण है! फ़िल्मी अश्लीलता को देख-देख कर बड़े हुए बच्चों समय से पहले युवा हो रहे है! ऐसे बच्चे जब युवा अवस्था में आते है तो हम उमीद करते है वे महिलाओं की इज्जत करें.! इस विषय में एक और पहलु जिस पर गौर करने की आवश्यकता है की..आज हम सब युवा इस हद तक गलतफहमी में हैं की हम फ़िल्मी हीरो को असली हीरो मान बैठे है! हर कोई किसी न किसी फिल्म के हीरो की नक़ल करने में लगा है, क्या हम असल जिंदगी के हीरो की नक़ल नहीं कर सकते ? वास्तव में इस विषय पर हमें बेहद संजीदगी सोचने की जरुरत है.! अगर हम वास्तव में देश को एक नयी दिशा देना चाहते है,..अपनी खुद कि दिशा को भ्रामक और काल्पनिक दुनिया में गुम होने से रोकना होगा!
## नारे लगाने वाली भीड़:- जब भी मैं ‘युवा भारत’ को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखता हूँ , लगता है कि हम युवा सिर्फ व् सिर्फ नारे लगाने कि भीड़ बन के रह गए हैं ! जब भी शहर में बड़े नेताजी आते है, झंडा युवाओं के हाथ में होता है! नेताजी चले जाते है..हमें कोई हाल-चाल पूछने वाला भी नहीं होता! आज जिस तरह देश कि राजनीति लगातार बद से बदतर होती चली जा रही है ,.. देश को ऐसे युवाओं कि जरुरत है जो ऐसे भ्रष्ट नेताओं को उखाड़ फेंके…न कि ऐसे देश के लुटेरों के लिए नारेबाजी करे! आज लगभग हर राजनीतिक दल के पास छात्र संगठन है, इन संगठनों के बावजूद क्या देश में शिक्षा व्यवस्था में कोइ बड़ा सुधर हुआ है? क्या छात्रों कि समस्याएं सुनी गयी है? अगर नहीं, फिर छात्र संगठनो का औचित्य क्या है? हम युवाओं को समझने कि आवश्यकता है कि देश के इन भ्रष्ट राजनेताओं को छात्रों के हित कि नहीं, अपितु अपनी राजनीतिक परिपाटी कि चिंता है! अपने दल के राजनीतिक भविष्य कि चिंता है…और इस प्रयास में भविष्य के मतदाताओं को अभी से अपने कब्जे में करने कि होड़ का नाम है ‘छात्र राजनीति’! हमें तय करना होगा कि…हम किसी के वैचारिक गुलाम नहीं बनेंगे…हम जहाँ भी रहेंगे, अपनी सोच के साथ लड़ेंगे,भिड़ंगे, और राष्ट्र व् समाज को परिवर्तन कि राह पर डालेंगे! हम सिर्फ ‘भारत माता’ के लिए नारे लगाएंगे ….न कि अपनी युवा ताकत को किसी कि जी-हजुरी में लगाएंगे!
## असभ्यता-अशिष्टता :- स्वयं एक युवा होने के बावजूद मुझे लगता है कि, आज हम युवाओं के व्यव्हार, विचार, समाज और राष्ट्र को लेकर हमारी सोच पर प्रश्नचिन्ह लगा है! आज जिस तेजी से समाज में बदलाव हो रहा है, मुझे लगता है कि रिश्तों कि मर्यादा को लेकर हमें बेहद संयमित होने कि आवश्यकता है! अपने माता-पिता, अपने अभिभावकों, दोस्तों-मित्रों में के साथ बेहतर संबंधों कि बुनियाद को समझना चाहिए! अपने घर-परिवार और समाज में महिलाओं के प्रति अपनी सोच को स्वस्थ और सार्थक बनाने का प्रयास होना चाहिए ! आज हमारे मित्र पश्चिमी सभ्यता से बेहद प्रभावित हो रहे है…हमें एक बात को भलीं-भांति समझना होगा कि ..भारतीय सभ्यता और संस्कृति में निश्चय ही कुछ खामियां है, लेकिन यह एक मात्र संस्कृति है जो मानवीय मूल्यों के साथ विकास कि अवधारणा का सन्देश देती है! हमें अपने देश, समाज, संस्कृति पर गर्व होना चाहिए!
ऐसी ढेरों कमियां है, लेकिन हम किसी से कम नहीं है…और अगर हैं तो अब नहीं रहेंगे…..ऐसी सोच के साथ हम युवाओं को आगे बढ़ना चाहिए! आज करोड़ों भारतीय हमें उमीद के साथ देख रहे हैं….हमें अपनी खामियों पर विचार करते हुए आगे बढ़ना होगा! इस अवधारणा को झुठलाते हुए आगे बढ़ना होगा कि हम सिर्फ मस्ती, और इश्क ही कर सकते है! इतिहास बीत चुका है, वर्तमान सिर्फ पल भर है…..भविष्य दहलीज पर है ! और विश्वास कीजिये…कल हमारा है! हम अभी से यह तय करें कि…..हम अपनी आने वाली ‘अगली युवा पीढ़ी’ को एक विकसित,शिक्षित, स्वस्थ, स्वच्छ, अखंड और आत्मनिर्भर भारत देंगे !

Wednesday, 19 November 2014

किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला

आदरणीय मित्रों, एक छोटी सी रचना ..जो मैंने पिछले दिनों लिखी थी...प्रस्तुत है!
नफरतों का ऐसा जहाँ बना डाला,
हर दर पर मजहब का निशां बना डाला!
हे इंसान , तू कितना बेदर्द हुआ,
किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला!!

धरा को तोडा, लहरों को बांटा,
इंसानियत कराह उठी, जड़ा है ऐसा चांटा !
तेरी हरकतों ने हिंदोस्ता-पाकिस्तान बना डाला,
हे इंसान , तू कितना बेदर्द हुआ,
किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला!!
ऊंचीं हो रहीं हैं दिवारें,
खींचने लगी हैं तलवारे!
हर हमदर्द को तूने शैतान बना डाला,
हे इंसान , तू कितना बेदर्द हुआ,
किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला!!
तेरी रुश्वाईयों से मैं खफा न था,
तेरी परछाइयों में भी वफ़ा न था!
तूने हर 'हद' गुलामी का पैगाम बना डाला,
हे इंसान , तू कितना बेदर्द हुआ,
किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला!!
तू दर्द देता रहा, हम खामोश रहे,
हर आजमाइश में हम बेहोश रहे!
हर बूँद लहू की , तूने आवांरा बना डाला!
हे इंसान , तू कितना बेदर्द हुआ,
किसी को हिन्दू-किसी को मुसलमां बना डाला!!

-आपके आशीर्वाद का आकांक्षी
के.कुमार 'अभिषेक' (१४/११/२०१४)

Monday, 17 November 2014

‘अयोध्या’ का दर्द

                                                                                                        -K.Kumar 'Abhishek'/18/11/2014
                       (यह ब्लॉग दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित है )
आज विश्व में अयोध्या कि पहचान ‘हिन्दू-मुस्लिम दंगों’ के लिए होती है ! लाखों बेकसूर भारतीयों के कत्लेआम के लिए होती है ! क्या यही वास्तविक पहचान होनी चाहिए अयोध्या की? वास्तव में अयोध्यावासी इस पहचान से ऊब चुके हैं ! वे आगे निकलना चाहते हैं ! उस दर्द को भुलाना चाहते है…जो वर्षों पहले अपने ही दोस्तों,मित्रों, पड़ोसियों ने दिया था ! दुर्भाग्य है की, हम उनकी तकलीफ को नहीं समझ रहे हैं ! जहाँ कुछ लोग उस चिंगारी को लगातार हवा देकर देश को सांप्रदायिक दंगों में झोंकना चाहते हैं ! वहीँ विभिन्न दलों के कई नेता ‘अयोध्या’ को मुद्दा बना अपनी राजनीतिक परिपाटी को सुरक्षित करने का सफल प्रयास भी कर रहे हैं I ऐसे समय में जब पुरे देश में ‘विकास’ एक बड़ा मुद्दा बन रहा हैं, क्या अयोध्या के लिए ‘राममंदिर-बाबरी मस्जिद’ ही मुद्दा बने रहेंगे? क्या अयोध्यावासियों का सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक विकास मुद्दा नहीं होना चाहिए? हमें चिंतन करना होगा ! तकलीफ होती है, जिस भूमि को हमने पूज्य माना, उसे ही हम नरक का रूप बना चुके हैं ! जिस भूमि से शांति का सन्देश जाना चाहिए, वही भूमि आज धार्मिक उन्मांद का सन्देश बन रहा है, मानवता और इंसानियत पर खतरे के रूप में देखा जा रहा है!
आज अयोध्या दंगों को हुए लगभग 22 वर्ष हो चुके है अर्थात, एक बचपन जवां हो गया अयोध्या में …लेकिन आज भी अयोध्या ‘राम मंदिर-बाबरी मस्जिद’ पर रुका हुआ है ! लोग भूल चुके हैं उस मंजर को, लेकिन चिंगारी अभी भी धधक रही है और जब तक इस मसले का कोई समाधान नहीं निकलता, नियमित शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती है ! मामला न्यायालय में है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है की देश की अखंडता पर खतरा बने इस मामले में न्यायालय भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका है ! समझना मुश्किल नहीं कि, न्यायालय के लिए किसी भी अंजाम तक पहुंचना समाज में अशांति और अस्थिरता का कारण हो सकता है, राष्ट्र की अखंडता खतरे में आ सकती है ! ऐसे में आवश्यकता है कि अयोध्या को मुख्य धारा में वापस लाने के लिए कुछ विशेष प्रयास हो! हमें ऐसे मौके बनाने होंगे, जिससे अयोध्या का आम जन-मानस ‘जाति-धर्म’ कि वैचारिक सीमाओं से उप्पर उठकर, मंदिर-मस्जिद कि लड़ाई से बाहर निकलकर ..एक स्वस्थ,शिक्षित, समृद्ध अयोध्या के लिए एकजुट होकर आगे बढे ! समाज में अविश्वास की स्थिति समाप्त हो और लोगों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास पैदा हो ! मरने-मारने की सोच से आगे निकालकर, पुनः एक-दूसरे के लिए जीने-मरने कि सोच पैदा हो I इसके लिए कहीं न कहीं हमारी सरकारों को विशेष प्रयास करना ही होगा…और शायद तभी हम न्यायपालिका को एक शांतिपूर्ण समाधान का अवसर उपलब्ध करा पाएंगे !
‘शिक्षा’ समाज में शांति, समृद्धि और अखंडता का सर्वक्षेष्ठ माध्यम है ! मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि..इस माध्यम का बेहतर उपयोग अयोध्या में शांति बहाली के प्रयासों के तहत होना चाहिए ! जो अयोध्या आज देश में सांप्रदायिक ‘दंगों का मॉडल’ के रूप में देखा जा रहा है., उसे ‘शिक्षा का मॉडल’ बनाना होगा I हमारी सरकार को अयोध्या में एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय कि स्थापना के बारे में सोचना होगा, जिसका नाम ”अंतर्राष्ट्रीय एकता विश्वविद्यालय” होना चाहिए ! जहाँ सभी धर्मों के लोग आपसी एकता के साथ शिक्षा ग्रहण कर एक स्वस्थ,शिक्षित, सुव्यवस्थित समाज की परिकल्पना को वस्तिकता में बदल सकें ! साथ ही सरकार को नीतिगत रूप से ऐसे प्रयास करने होंगे ..जिससे सभी जाति-धर्म के लोग साथ जुड़ सकें, एक साथ मिल-बैठकर जीवन का सफर तय कर सकें ! मुझे पूरी उमीद है कि ऐसे किसी भी प्रयास से अयोध्या में शांति बहाली कि मजबूत संभावनाएं बनेंगी ! ”राम मंदिर और बाबरी मस्जिद” में उलझा अयोध्या ‘ ज्ञान मंदिर’ कि स्थापना से एक नयी ऊर्जा , नयी पहचान के साथ विकास के पथ पर अग्रसर होगा ! ‘मंदिर-मस्जिद’ कि आड़ में इतिहास में उलझा अयोध्या भविष्य कि संभावनाओं के लिए प्रयास करेगा ! सबसे अहम कि, आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में सांप्रदायिक दंगों कि खबरे आती है..जिसमे ‘अयोध्या मॉडल’ कि झलक दिखती है, ‘ज्ञान मंदिर’ की स्थापना से अयोध्या पुरे देश में एकता की एक नयी मिशाल बन के खड़ा होगा ! अयोध्या की एक नयी पहचान बनेगी…और यह बदली हुई पहचान ही अयोध्या की नयी पीढ़ी को इतिहास को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने को प्रेरित करेगी!
यह अवसर है कि, हम सब मिलकर एक जिम्मेदार भारतीय के रूप में अपने कर्तव्यों के लिए थोड़ी तत्परता दिखाएँ ! वर्ष २०१४ देश की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया है ! देश में एक नयी सरकार बनी, जिसके मुखिया आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी ..एक स्वस्थ, समृद्ध और अखंड भारत की उमीद जगा रहे हैं I करोड़ों भारतीयों की तरह मैं भी काफी आशावान हूँ, और मुझे लगता है की आदरणीय प्रधानमंत्री जी इस दिशा में हमारी उमीदों को परिणाम का रूप देने में एक मजबूत पहल अवश्य करेंगे!

ज्ञान के मंदिर पर धार्मिक मुहर, क्यों ?

                                                                                                         -K.Kumar 'Abhishek'/29-10-2014
(यह ब्लॉग दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित और सर्वक्षेष्ठ ब्लॉग के रूप में अवार्ड प्राप्त है)


‘शिक्षा’ समाज में शांति, समृद्धि और अखंडता का सर्वक्षेष्ठ माध्यम है! यह हर मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता हैं! यही कारण है की शिक्षा को किसी जाति-धर्म की संकुचित दीवारों में कैद नहीं किया जा सकता है! किसी ‘धर्म’ का ‘अध्ययन’ हो सकता है, लेकिन ‘अध्ययन’ का ‘धर्म’ नहीं हो सकता ! ..बावजूद इसके हमारे देश में ‘शिक्षा’ को बार-बार धार्मिक व् जातिसूचक शब्दों के साथ परिभाषित करने का दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास किया गया है! ‘अध्ययन’ को जाति-धर्म के साथ जोड़कर …शिक्षा के औचित्य और उदेश्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया गया है ! वास्तव में भारत की यह दुर्भाग्यपूर्ण तस्वीर …हर सच्चे भारतीय के लिए शर्मनाक है! हम सबके लिए शर्मनाक है कि, जिस ‘शिक्षा’ ने हमारे समाज को अनेकों विभिन्ताओं के बावजूद जोड़ने का काम किया, हमने उसे ही तोड़ने का काम किया! हमने अपनी विक्षिप्त मानसिकता के प्रभाव में शिक्षा को ही जाति और धर्म कि पहचान में रंग दिया! आज देश के कोने-कोने में जाति-धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर खुले शिक्षण संस्थान …एक समाज के रूप में हमारी वैचारिक परिपक्वता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं …! आज हमें सोचना होगा कि शिक्षण संस्थाओं के नामों में हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई, ब्राह्मण, भूमिहार, क्षत्रिय, हरिजन, कुशवाहा, वैश्य, चौधरी जैसे शब्दों के प्रयोग का क्या औचित्य है? क्या इन संस्थानों में अन्य धर्मों और जातियों से सम्बन्ध रखने वाले छात्रों के लिए जगह नहीं है? क्या काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सिर्फ हिन्दू छात्रों को ही ज्ञान अर्जित करने का अधिकार है? क्या ‘अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ में सिर्फ मुस्लिम ही पढ़ सकते है? अगर नहीं, तो फिर ‘ज्ञान के मंदिर’ पर धार्मिक व् जातिगत मुहर लगाने कि आवश्यकता क्यों पड़ी? कहीं इसके पीछे इस बात का डर तो नहीं कि,…’शिक्षित समाज में जाति-धर्म अप्रासंगिक हो जायेंगे’, इसलिए जाति-धर्म को ही शिक्षा का ‘प्रसंग’ बना दिया गया ! अगर संस्थापकों कि पहचान ही इसका कारण है….तो भारत सरकार का अंग ‘शिक्षा मंत्रालय’ क्या कर रहा था? इन शिक्षण संस्थानों को नियंत्रित करने वाली संस्थाएं …देश में किस शैक्षणिक व्यवस्था को संचालित कर रही है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, सामाजिक एकता और अखंडता हमारी पहचान है …बावजूद इसके समाज को खंडित करने वाली विचारधारा से जुड़े शब्द ..हमारी ‘शिक्षण व्यवस्था’ कि पहचान हैं ! संविधान और राष्ट्र कि संप्रुभता कि धज्जियाँ उड़ाते हुए सांप्रदायिक शब्दों को शिक्षा कि पहचान बनाया जाता है…और फिर भी हम चुप हैं! आज हम सबके सामने बड़ा प्रश्न है कि …’जाति और धर्म के नाम पर बने, शिक्षण संस्थानों में अध्ययन करके हमारे बच्चे राष्ट्र व् समाज को कौन सी दिशा देंगे? हम इस सवाल से भाग तो सकते है, लेकिन अपने समाज की वास्तविकता को नहीं बदल सकते ! आज जाने-अनजाने ‘शिक्षा व्यवस्था’ सामाजिक भेदभाव, उच्च-नीच, वर्ग-विभेद का कारण बन रहा है! इसका असर छात्रों की मानसिकता पर भी पड़ रहा है,! कहीं न कहीं हर छात्र का यह प्रयास रहता है की उसका नामांकन उसी संस्थान में हो..जो उसके धार्मिक/जातिगत परिचयों से जुड़ा हो! उसे हमेशा इस बात का डर सताता है की अन्य संस्थानों में वह सुरक्षित नहीं रहेगा! …क्या यह परिस्थिति हमारे देश की शिक्षण व्यवस्था की दुर्भाग्यपूर्ण तस्वीर नहीं पेश करती है! हमें इस तस्वीर को बदलना होगा !.हमें अपनी चुप्पी को तोड़नी होगी ! शिक्षा को हथियार बना समाज को तोड़ने कि जो साजिशे रची गई है ..हमें तय करना होगा कि ऐसी साजिशे भविष्य में कभी सफल न हों! इस देश के हर सच्चे भारतीय को..जिसे मानवता में यकीं है. जगना होगा! हर उस इंसान को जगना होगा, जिसके मन में शिक्षा और शिक्षा के मंदिर में आस्था है! विशेषकर हम युवाओं का जगना होगा , एक मजबूत इरादें के साथ अपनी सशक्त आवाज को बुलंद करना होगा ! यह आवाज हर उस कान में जानी चाहिए …जिनके हाथों में आज देश की बागडोर है, हमारी शिक्षा कि बागडोर है, जिससे संविधान कि धज्जियां उड़ाने वाले शब्दों का प्रयोग ‘शिक्षा’ के साथ भविष्य में न हो !

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...