Tuesday, 26 August 2014

‘युद्ध या विकास’-असमंजस में सरकार

                                                                                               K.Kumar Abhishek (26/08/2014)
    (नोट-यह आलेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चूका है )

आज हमारी सरकार एक बड़े असमंजस में फंस गयी है, और उस असमंजस की पृष्टभूमि में एक ऐसा प्रश्न है, जिसने हर भारतवासी की नींद उड़ा रखी है
| जैसा की हम सभी जानते हैं, पिछले कुछ दिनों से भारत-पाकिस्तान सीमा पर भीषण गोलीबारी कि खबरे आ रही हैं | पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों के साथ आतंकवादियों के साथ मिलकर एक बार पुनः युद्ध की ज्वाला भड़काने का प्रयास कर रहा हैं ! ख़बरों कि मानें तो, इस अगस्त माह में ही पाकिस्तान ७० से अधिक बार युद्धविराम का उल्लंघन कर चुका है, बदलें में भारतीय सीमा सुरक्षा बलों ने भी कड़ी जवाबी कारवाई कि है | पाकिस्तान के तरफ से कि जा रही गोलीबारी में सैन्य बलों के साथ-साथ, सीमा के आस-पास रहने वाले कई असैन्य जन (आम जन) भी मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं | लगातार गोलीबारी से आस-पास रहने वाले आम इंसान इस हद तक खौफजदा हैं की..एक कश्मीरी महिला का ह्रदय गति रुक जाने से निधन भी हो गया है | आस पास के गांवों के लोगों का जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है, घरों से निकल बंकरों में रात गुजारने को विवश है| स्पष्ट संकेत मिलता है की पाकिस्तान एक बार पुनः युद्ध के लिए आमदा है, उसकी हरकतें लगातार भारत को उकसाने का काम कर रही हैं | अपने इस प्रयास में पाकिस्तान सिर्फ सीमा पर माहौल ही नहीं बिगाड़ रहा है, अपितु कई असैन्य प्रयास भी कर रहा हैं | कश्मीरी अलगाववादियों के साथ पाक राजनयिक का मिलन हो या, ५७ बार भारत की तरफ से युद्धविराम तोड़ने का झूठा आरोप….कहीं न कहीं पाकिस्तान एक नए ‘कारगिल’ के लिए जमीन तैयार करने का ही प्रयास कर रहा है |
दूसरी तरफ आज भारत में एक ऐसी सरकार है जो एक नई ऊर्जा, नई उमीदों, नए सपनों, नई इरादों के साथ एक सशक्त और विकसित भारत का संकल्प लेकर सत्ता में आयी है | लोगों ने पिछले १० वर्षों के अप्रभावशाली शासन से तंग आकर ..एक जनक्रांति की भांति सरकार के विरोध में मतदान किया था | देश की जनता ने भाजपा को सरकार बनाने की जो ताकत दी, वह नई सरकार से उमीदों का प्रभाव दर्शाता है | माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से लोगों की लाखों अपेक्षाएं जुडी हैं, …जनता को उमीद है की श्री नरेंद्र मोदी जी विकास की नई धारा का प्रवाह करेंगे, और उनके प्रभावशाली नेतृत्वा में देश आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक ..हर क्षेत्र में , हर स्तर पर विकास की तरफ अग्रसर होगा | स्पष्ट है कि जनता कि उमीदों का दबाव…सरकार के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रहेगा, विशेषकर प्रधानमंत्री जी ने जो वादें, जो इरादें …चुनावी मंच से दर्शाएं है..उन्हें अपने संकल्प को हमेशा याद रखना ही होगा |
यहाँ हमें समझने कि आवश्यकता है कि ..एक तरफ एक ऐसी सरकार है जो विकास के एजेंडे के साथ सत्ता में आयी है, उसे हर हाल में विकास करना ही होगा , वहीँ हमारा पडोसी लगातार सीमा पर एक नए युद्ध कि पृष्टभूमि तैयार कर रहा है…उसे भी सबक सिखाना ही होगा | जब हम विकास कि बात करते हैं, विकास कि पहली शर्त है ‘शांति’ | इतिहास गवाह है कि जब भी युद्ध लड़ा गया है…संलिप्त देशों में भीषण आर्थिक संकट का दौर देखने को मिला है | युद्ध कि वजह से देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल तैयार होता है, जिससे विदेशों व्यापार और विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी पूंजी निवेश बुरी तरह प्रभावित होता है, परिणामस्वरुप घोर आर्थिक संकट सामने आता है | आर्थिक संकट कि स्थिति में विकास कि सोचना भी बेमानी ही होती है…क्योकि स्थिति को सम्भालना ही बड़ी बात होती है | साथ ही युद्ध कि स्थिति में पर्यटन भी बुरी तरह प्रभावित होता है, जिससे आय का एक बड़ा स्रोत बंद हो जाता है | स्पष्ट है कि परिस्थितियां बिलकुल विपरीत हो रही हैं, …पाकिस्तान जिस तरह से हिमाकत कर रहा है..उसे सबक सिखाना भी आवश्यक लगता है….लेकिन इस प्रयास में देश एक बड़े आर्थिक संकट कि तरफ बढ़ जायेगा | पहले से ही कमजोर अर्थव्यस्था…बुरी तरह से चरमरा जाएगी | ऐसी किसी भी स्थिति से संभलने और विकास के लिए पुनः नयी ऊर्जा पैदा करने में ही २-३ वर्ष लग जायेंगे | इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी नई सरकार बेहद ऊर्जावान है, और किसी भी स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम है…लेकिन ये जादूगर भी नहीं है..जो हालात को फूंक मार के पलट देंगे |
कहीं न कहीं स्थिति बेहद विकट है,..जनता चाहती है कि पाकिस्तान को सही नसीहत मिले, लेकिन वही जनता 5 वर्ष बाद विकास के दावों का हिसाब भी मांगेगी | ‘मोदी सरकार’ को इस चुनौती का सामना करना ही होगा, उन्हें इसका हल ढूढ़ना ही होगा ….अपने आपको प्रभावशाली अंदाज में असमंजस कि स्थिति से बाहर लाना होगा | साथ ही हम सभी भारतीयों को सरकार के हर फैसले पर मजबूती के साथ खड़ा होना होगा….जिससे देश पर आने वाली किसी भी मुसीबत का सामना हमारी ‘सरकार’ मजबूत हौसले के साथ कर सके | 



                                        

क्रिकेट: धोनी जिम्मेदार, सब गैर-जिम्मेदार

                                                                                           K.Kumar 'Abhishek' (26/08/2014)

भारतीय मिडिया को जब भी मैं समझने का प्रयास करता हूँ ..मस्तिष्क की अच्छी कसरत हो जाती है | कहा जाता है की क्रिकेट भारत में एक धर्म है|..प्रश्न उठता है की हांकी,फूटबाल, कबड्डी, कुश्ती के देश में क्रिकेट को धर्म बनाया किसने? क्रिकेटरों को भगवान बनाया किसने? जवाब है-भारतीय मिडिया| इसमें कोई शक नहीं की गिनती के कुछ देशों में खेले जाने वाले इस खेल में भारत की आर्थिक ताकत और संतोषजनक खेल ने लोगों को आकर्षित किया| हम भारतीयों का सपना है की भारत भी अमेरिका की तरह विश्व की महाशक्ति बने, यही कारण है की क्रिकेट के खेल में ‘भारत’ की बादशाहत और दादागिरी भी हमें काफी भांति है.!
भारतीय मिडिया में क्रिकेट की हर घटना की जमकर खबर ली/दी जाती है! हाल-फ़िलहाल भारतीय क्रिकेट टीम की इंग्लैंड के हाथों लगातार दो टेस्ट में बड़ी हार ..सबसे बड़ी खबर बनी हुई है | अपने ज़माने के साधारण खिलाडी भी न्यूज़ चैनलों की हॉट प्रॉपर्टी बन गए हैं…चारो तरफ से कप्तान को बदलने की मांग उठ रही है | पूर्व खिलाडी तो फिर भी ठीक है…जिन्हे क्रिकेट की गहरी समझ नहीं है..वे भी बड़े एक्सपर्ट बन गए हैं | अजीब तो यह की, यही मिडिया लगभग दो सप्ताह पूर्व लॉर्ड्स में भारत की जीत पर पूरी टीम को ‘महान’ साबित कर चूका है | आज उसी धोनी की कप्तानी पर सवाल उठाये जा रहे हैं…जिसके कहे अनुसार गेंदबाजी करके ही इशांत मैच के हीरो बन गए | वास्तव में वह एक ऐतिहासिक मौका था की भारतीय तेज गेंदबाज ‘विपक्षी’ को खौफ में डालकर विकेट ले रहे थे | भारतीयों स्पिनरों के पराक्रम का लम्बा इतिहास रहा है, लेकिन तेज गेंदबाजों का खौफनाक प्रदर्शन कभी नहीं देखा गया है|
अगर हम पिछले दो टेस्ट की हार को ही लें..तो एक कप्तान के रूप में धोनी ने क्या गलत किया है | अगर गलत किया भी था तो..गलती करते समय सवाल क्यों नहीं उठे? परिणाम देखकर..’एक्सपर्ट राय’ देने के लिए एक छोटा बच्चा ही काफी है | इस पुरे दौरे में भारत का एक टीम के रूप में प्रदर्शन निराशजक रहा है | भारत ने भले ही लॉर्ड्स में इंग्लॅण्ड को पटखनी दी..लेकिन भारत की बल्लेबाजी सिर्फ चमत्कारों के सहारे ही आगे बढ़ रही थी, …भुवनेश्वर कुमार ने दोनों तरफ से मोर्चा संभल कर ‘प्रारम्भ’ को थोड़ा बेहतर बना दिया, अन्यथा शिखर धवन, विराट कोहली, चेतेश्वर पुजारा, रोहित शर्मा, गौतम गंभीर ने कभी रन नहीं किये…रविन्द्र जडेजा और धोनी एक-दो मौके के अलावे फ्लॉप रहे हैं | बेहतरीन शुरुआत के बाद मुरली विजय लय-तान दोनों भूल चुके है…| बल्लेबाजों के इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए कप्तान जिम्मेदार क्यों है.? क्रिकेट के खेल में बल्लेबाजों के प्रदर्शन पर कप्तान की पकड़ ‘न’ के बराबर होती है ..क्योकि हर बल्लेबाज के साथ कप्तान बल्लेबाजी करे और उसे सुझाव दे , यह संभव नहीं है..इसके विपरीत गेंदबाजों के ऊपर कप्तान की पकड़ ज्यादा होती है..क्योकि कप्तान हर गेंद पर उनके साथ होता है| इस नजरिये से देखें तो…इस पूरी श्रृंखला में भारतीय गेंदबाजों का प्रदर्शन बल्लेबाजों की अपेक्षा काफी उच्चस्तर का रहा है..| लॉर्ड्स में भारत की जीत और उसमे कप्तान धोनी की सलाह पर गेंदबाजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी | फिर क्यों है की सवाल सिर्फ कप्तानी पर उठ रहे हैं? एक कप्तान उतना ही बेस्ट होता है…जितनी उसकी टीम होती है| उसके फैसलों को सही और गलत साबित करने का काम पूरी टीम का होता है ..इस प्रयास में कप्तान की भूमिका एक खिलाडी की होती है | ओल्डट्रैफिड में धोनी ने टॉस जीत करके पहले बल्लेबाजी की, ..दो स्पिनरों के साथ यही सही फैसला था | जिस पिच पर दहाई अंक तक पहुचने से पहले सारे बड़े नाम ध्वस्त हो चुके थे |.एक बेहतर कप्तान अपने प्रदर्शन से उदाहरण पेश करता है..और धोनी ने दोनों परियों में कुल १०० से अधिक रन बनाये, और तेज रन बनाने के प्रयास में आउट हुए,…. बल्लेबाजों ने उसका अनुसरण नहीं किया..इसमें धोनी की गलती नहीं है| इस मैच में गेंदबाजों ने बेहतर प्रदर्शन किया ….लेकिन एक बार पुनः फील्डर्स ने उनका साथ नहीं दिया| अगर इस मैच में भारत ने स्लिप में कई आसान कैच नहीं टपकाए होते..इस मैच का परिणाम कुछ और भी हो सकता था |
बल्लेबाजों और क्षेत्ररक्षाकों के शर्मनाक प्रदर्शन के लिए..अगर किसी से सवाल पूछा जाना चाहिए तो…करोड़ों रुपयों का वेतन ले रहे ‘कोच’ और उनके सहयोगियों से पूछा जाना चाहिए | उनकी भूमिका है..खिलाडियों की खामियों की तरफ ध्यान दिलाना ..आखिर ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? अगर इस प्रदर्शन के लिए किसी को सजा मिलनी चाहिए तो..इन खिलाडियों को मिलनी चाहिए | इन्हे टीम से बाहर करना चाहिए, जिससे ये अपने खेल पर आत्ममंथन कर सकें.. | रणजी मैचों में खेलकर पुनः अपनी जगह टीम में प्राप्त करें..ऐसा सन्देश दिया जाना चाहिए |
धोनी के ऊपर सवाल उठाने वालों को समझना चाहिए की..एक क्रिकेट टीम में सबसे मुश्किल और महत्वपूर्ण काम विकेटकीपर का होता है…गेंदबाजी के दौरान हर गेंद पर पैनी नजर रखनी होती है | टेस्ट मैच में कभी-कभी दो दिन तक लगातर विकेटकीपिंग करनी पड़ती है | लेकिन उसकी मेहनत को इज्जत नहीं मिलती…| कितनी बार ऐसा हुआ है की किसी विकेटकीपर को ‘विकेटकीपिंग’ के लिए ‘मैन ऑफ द मैच’ मिला है | इसके अलावे बल्लेबाजी भी आनी चाहिए…और धोनी तो कप्तान भी है| कीपिंग, बल्लेबाजी, और कप्तानी..जितनी जिमेदारी…उतने ही सवाल | धोनी की कप्तानी पर सवाल उठाने वाले …भूल जाते है की उपमहाद्वीप में भी धोनी ही कप्तान होते है| क्या हम यह मान लें की…धोनी की सोच यहाँ बदल जाती है| धोनी का दो रूप है| ऐसी बकवास एक क्रिकेट समझने वाला करे तो, उसकी समझ ‘नासमझ’ से भी ज्यादा सस्ती है| धोनी नहीं बदलता, टीम के खिलाडियों का प्रदर्शन बदल जाता है| जो फैसलें इंग्लैंड में गलत साबित हो जाते है, वही यहाँ मास्टर स्ट्रोक साबित हो जाता है|
धोनी को लेकर हाय-तौबा मचाने वाले लोग जब कप्तान बदलने की बात करते हैं, आज इस स्थिति में जब टीम में भुवनेश्वर कुमार के अलावे किसी का प्रदर्शन बेहतर नहीं हो रहा है…क्या उनके पास कप्तान का कोई विकल्प है? कल तक जिस ‘विराट कोहली’ को ‘कप्तान’ बनाने की बात होती थी, आज एक-एक रन के लिए जूझ रहे हैं| कोहली एक बड़े खिलाडी है, और शायद एक बुरे दौर से गुजर रहे हैं…जरुरत है की उन्हें ब्रेक दिया जाय, जिससे आत्म चिंतन का मौका उन्हें मिल सके | इस वक्त में कोहली को कप्तान बनाना …एक खिलाडी के रूप में उनके लिए घातक हो सकता है…और यह बात समझने का प्रयास समझदारो में नहीं दिख रहा है|


                             

राजनीति की धार पर ‘भारत रत्न’

                                                                                               K.Kumar 'Abhishek' (26/08/2014)
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी ‘भारत रत्न’ को लेकर जबरदस्त हंगामा हो रही है | पिछले १ सप्ताह से न्यूज़ चैनलों पर लगातार खबर दिखाई जा रही है की इस बार पांच महानुभावों को भारत रत्न दिया जा सकता है | खबरिया चैनलों की मानें तो महान हांकी खिलाडी ‘मेजर ध्यानचंद’, सुभास चन्द्र बोस, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, मदन मोहन मालवीय, और धार्मिक पुस्तकों के प्रमुख प्रकाशक ‘गीता प्रेस’ के सस्थापक हनुमान पोद्दार का नाम लगभग तय है..| देखना दिलचस्प होगा की मिडिया की अटकलबाजियां और अटकलबाजियों के आधार पर पुरे देश में चल रही बहसबाजी का विराम कैसा होता है?
वास्तव में हम देखें तो ‘भारत रत्न’ का विवादों से पुराना नाता है| कोई स्पष्ट मापदंड न होने की वजह से कई ऐसे नामो को ‘भारत रत्न’ दिया गया है, जो बहस का कारण बने हैं | ये सवाल हमेशा खड़ा होता रहा है की ..किसी क्षेत्र में सर्वक्षेष्ठ होने का पैमाना क्या है? आज सुभास चन्द्र बोस को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की सम्भावना हो रही है…लेकिन उनसे पहले ‘भारत रत्न’ प्राप्त कर चुके नाम …क्या सुभास चन्द्र बोस से ज्यादा योग्य थे? मेजर ध्यानचंद को ‘भारत रत्न’ देने की मांग लगातार उठती रही…पिछली सरकार जो ‘भारत रत्न’ की आवश्यकता ही नहीं समझ पा रही थी, ..पिछले वर्ष ध्यान टुटा और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और वैज्ञानिक सी.ऍन राव को यह सम्मान अलंकृत किया गया था| बाद में ऐसी खबरे भी आयी की,.. भारत रत्न के लिए ‘ध्यानचंद’ का नाम आगे बढ़ाया गया था…लेकिन चुनावी फायदे के लिए अंतिम वक्त में सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान दिया गया | सचिन तेंदुलकर महान क्रिकेट खिलाडी है, उनकी योग्यता पर किसी को संदेह नहीं है..लेकिन प्रश्न यही है की..क्या सचिन.. ध्यानचंद से पहले ‘भारत रत्न’ पाने के हक़दार थे? सिर्फ ध्यानचंद ही क्यों……मेरी कॉम और विश्वनाथन आनंद भी अपने खेल में कई बार वर्ल्ड चैम्पियन रह चुके है | जब इंदिरा गांधी को भारत रत्न दिया गया….क्या इंदिरा जी से योग्य उस समय कोई नहीं था ? आज जब हनुमान पोद्दार को भारत रत्न देने की मांग उठा रही है…क्या मुंशी प्रेमचंद, और रविंद्रनाथ टैगोर की साहित्यिक उपलब्धियां कम पड़ रही है?
वास्तव में भारत रत्न को लेकर गन्दी राजनीति ने इसकी गरिमा को मिटटी में मिला दिया है| यह दुर्भाग्य है की आज ‘भारत रत्न’ के लिए नामों के चयन का आधार सरकार की पसंदगी है. भारत रत्न वही हो सकता है जो सरकार का समर्थक हो..विरोधियो की योग्यता कोई मायने नहीं रखती है | जिसकी सरकार होगी..उसके समर्थकों के लिए सम्भावना बढ़ जाती है| आज जिस तरह राजनीतिक पैमानों और मापदंडों को आधार बना ‘भारत रत्न’ का अवार्ड दिया जा रहा है…आने वाले समय में यह महज एक पुरुस्कार बन के रह जायेगा, और स्वाभिमानी लोग इसे ठुकराते नजर आएंगे | इसकी एक झलक भी आज दिखने लगी है…जिस सुभासचन्द्र बोस को आज भारत रत्न देने की सम्भावना व्यक्त की जारी है…उनके परिवार ने बेहद सहज लहजे में यह कहा है की ‘ “सुबास चन्द्र बोस’ भारत रत्न से ऊपर है” …वास्तव में उनका जवाब हमारे सामने एक सवाल है की…जिस सुबास चन्द्र बोस को आज़ादी के ६८ वर्षों बाद तक ‘भारत रत्न’ के लायक नहीं समझा गया ….आज उनके परिवार को यह लगता है ‘भारत रत्न’ का अलंकरण ‘सुबास चन्द्र बोस’ के लायक नहीं है | क्या यह महज एक प्रतिक्रिया है?
हम अपने देश के नेताओं से निःस्वार्थ भाव से देश चलाने की अपेक्षा रखते है….सवाल खड़े हैं…जो निःस्वार्थ भाव से ‘अवार्ड’ को नहीं चला सके..देश क्या खाक चलाएंगे | आज सुबास चन्द्र बोस के परिवार ने ठुकराने का माद्दा दिखाया है…कल इस देश का हर वह व्यक्ति इस अवार्ड को ठोकर मरेगा जो असली हक़दार होगा |…फिर सभी राजनीतिक दल सरकार के मंत्रालयों की तरह अपने नेताओं, चमच्चों को ‘भारत रत्न देंगे | मैं इस स्थिति को लेकर किसी उमीद में नहीं, मेरा कोई निष्कर्ष नहीं है…क्योकि मुझे उमीद ही नहीं पूर्ण विस्वास है की जब तक ‘भारत रत्न’ का अधिकार सरकार के हाथ में है…हालत में सुधार की सम्भावना भी नहीं है..| हमारी जिमेदारी बस इतनी भर है की क्रिकेट के छक्कों की तरह एक छक्का मान के ताली मार लें या, कपिल शर्मा के ठुल्लु ही मान कर एक- दो ठोक दें.|


                               

बाल क्रांतिकारी ‘खुदीराम बोस’

                                                                                                                   K.Kumar 'Abhishek' (26/08/2014)
(This blog has been published in leading Hindi daily 'Dainik Jagran' ..on the eve of 15 august 2014)
 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लाखों क्रन्तिकारी देशभक्तों ने अपनी जान की बाजी लगा दी | अंग्रेज सरकार ने समय-समय पर क्रांति की आग को दबाने के प्रयास में दमनकारी और हिंसात्मक प्रयासों का सहारा लिया, लेकिन वे क्रांति की दहकती लौ को बुझा नहीं सके | ऐसी ही एक न बुझने वाली ‘लौ’ का नाम था, ”खुदीराम बोस” | खुदीराम बोस वास्तव में एक लौ थे..’क्रांति की लौ’ ….क्योकि आज भी इतिहास के उन पन्नों में धमक का अहसास होता है, एक चिंगारी उठती है क्रांति की जिन पन्नो पर खुदीराम बोस अंकित मिलता है| खुदीराम बोस एक ऐसी लौ थे, जो लाखों युवाओं के सीने में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत की ज्वाला बन गई|
बंगाल के मिदनापुर के एक छोटे से गांव में जन्मे खुदीराम बोस, बचपन में ही अंग्रेज सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ उग्र होने लगे थे | देश को आज़ाद कराने की ऐसी लगन लगी की नौवीं कक्षा के बाद ही पढाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े | शायद यही समय था, जब १८५७ की क्रांति के बाद एक और क्रांति की नींव पड़ने लगी थी| १९०५ में बंगाल का विभाजन हुआ..पुरे देश में इसके खिलाफ आंदोलन, प्रदर्शन किये गए | ..खुदीराम बोस तब मात्र १६ वर्ष के थे..लेकिन इतनी छोटी उम्र में भी वे बंग-भंग आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे| सच तो यह है कि, १६ वर्ष का क्रन्तिकारी बालक खुदीराम बोस लोगों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रहे थे | उनकी प्रेरणा से ही हज़ारों युवा आंदोलनरत हो गए | यहाँ तक की बड़ी उम्र वालों ने भी ने सोचा ..अगर एक छोटा बच्चा देश के लिए लड़ रहा है, हम क्यों नहीं?
खुदीराम बोस कई क्रन्तिकारी संगठनो से भी जुड़े, इस दौरान ही उनकी मुलाकात क्रांतिकारी लेखक सत्येन्द्रनाथ से हुई | दोनों ने मिलकर कई क्रांतिकारी पत्रिकाओं का संपादन/वितरण आरम्भ किया ..इसके लिए उनके ऊपर देशद्रोह के आरोप भी लगे, लेकिन सबूत के अभाव में बच निकले | बंगाल विभाजन के विरुद्ध आंदोलन में कलकत्ता के “जिला मजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ” की अहिंसात्मक और बर्बरतापूर्ण करवाई से खुदीराम बोस और उनके साथियों में भारी रोष था | अंग्रेजी सरकार ने बाद में किंग्जफोर्ड को मुजफ्फरपुर भेज दिया …तब तक खुदीराम बोस और उनके साथी किंग्जफोर्ड को मारने की योजना बना चुके थे,
मुजफ्फरपुर जइबो, किंग्जफोर्ड मरिबो…..
यह गीत खुदीराम बोस हर गली-मोहल्ले में गाते फिरते थे, वास्तव में १६-१७ वर्ष का यह जूनून लोगों को ‘पागलपन’ नजर आता था | तय योजना के तहत खुदीराम बोस और उनके प्रमुख साथी. प्रफुल्ल चाकी ..मुजफ्फरपुर गए और घटना को अंजाम भी दिया..लेकिन वे निशाना चूक गए | क्रांतिकारियों ने किंग्स्फोर्ड के सामान दिखने वाली गाड़ी पर बम फेंक दिया था….किंग्स्फोर्ड बच निकला| इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार की नींद हराम हो गई |…खुदीराम और उनके साथियों के पीछे अंग्रेज सिपाही किसी यमदूत की तरह लग गए..| आख़िरकार वैनी रेलवे स्टेशन पर खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी घेर लिए गए….प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली ..खुदीराम बोस पकडे गए | उनके ऊपर अनेकों मुक़दमे चले .. अंग्रेजों मजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई…| कहते हैं की, उस मजिस्ट्रेट के भी १८ वर्ष के बालक की निर्भीकता देखकर हाथ कांपने लगे थे | किंग्जफोर्ड ने अपनी मौत के डर से नौकरी छोड़ दी, और इंग्लॅण्ड वापस चला गया…उसे शक था का खुदीराम के साथी उसे नहीं छोड़ेंगे |
११ अगस्त १९०८ को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम बोस को फांसी दी गई | उस समय उनकी उम्र मात्र १९ वर्ष थी.| एक छोटे से बालक को गीता हाथ में लिए निर्भीकता के साथ मौत को गले लगाते देखकर …पत्थरदिल अंग्रेजों का कलेजा भी दहल उठा था|

खुदीराम बोस की फांसी से अंग्रेजों को लगा की क्रांति की लौ बुझ चुकी है…लेकिन क्रांति की लौ ने बुझने से पहले ज्वालामुखी पैदा कर दिया था…बाद के क्रांतिकारियों, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, असफाक उल्ला खान…सभी उसी लौ की ‘ज्वाला’ थे …जिसे अंग्रेज समझ नहीं पाये थे|

                                            

व्यवहारिकता के तराजू पर ‘धर्म’

                                                                                                K.Kumar 'Abhishek'(04/08/2014)
             (नोट-यह आलेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चूका है )
हमारा भारतीय समाज धर्म के आधार पर दो खण्डों में विभाजित है – आस्तिक और .नास्तिक | जिन्हे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास है, वो आस्तिक कहे जाते हैं..वहीँ जिन्हे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही है उन्हें ‘नास्तिक’ अर्थात धर्म विरोधी माना जाता है | धर्म के प्रति दोनों (पक्ष और विपक्ष) की विचारधाराएँ हर जाति (सामाजिक विखंडन का आधार) हर संप्रदाय में पायी जाती है| वास्तव में देखा जाये तो ..इसमें कोई शक नहीं की ईश्वर में विश्वास करने वाले लोगो की सोच काफी भ्रमित विचारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है..लेकिन हमारे समाज का वह वर्ग जो अपने आपको धर्म विरोधी साबित करने के लिए हर धार्मिक मर्यादा को तोड़ने का प्रयास करता है…ऐसे लोग भी कम भ्रमित नहीं है | वास्तव में हमारा समाज धर्म के नाम पर लगातार विभाजित हो रहा है, दोनों पक्ष अपनी बात को मनवाने और सिद्धांतों कि जीत को जीवन का उदेश्य बना बैठे है, ऐसी स्थिति में किसी स्वस्थ समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है| ऐसा समाज जो पूर्णतः भर्मित हो चुका है, कभी भी विकास की राह पर अग्रसर नहीं हो सकता है | हमें इस विषय पर बेहद गंभीरता से चिंतन करना होगा, अन्यथा यह वैचारिक लड़ाई इस समाज के पतन का कारन बन के तेजी से उभर रही है|
हमें पूरी गंभीरता से इस बात को समझना होगा कि, एक ‘स्वस्थ, व्यवहारिक, अकाल्पनिक धर्म’ कि आवश्यकता हर सभ्य समाज को है| धर्म हमें नैतिक और व्यवहारिक तौर पर अनुशासित और नियंत्रित रखता है | इसमें कोई दो राय नहीं हो सकता कि..कई विसंगतियों के बावजूद प्राचीन भारतीय समाज ज्यादा स्वस्थ और अनुशासित था | लोगों में आपसी प्रेम-भाईचारा, ईमानदारी थी | उनके अंदर हमेशा पाप-पुण्य, और स्वर्ग-नरक का डर रहता था, और यही डर उन्हें गलत करने से रोकता था | इसे हम आधुनिक परिभाषा में मानसिक गुलामी का नाम दे सकते है, लेकिन उस समाज कि स्वस्थ जीवनशैली को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है| ईश्वर हो या, नहीं..लेकिन ईश्वर के डर से जो अनुशासन का माहौल बना..उसने समाज को स्वस्थ बनाने का कार्य किया | लेकिन आज हालात बदल रहे हैं, आज लोग शिक्षित हो रहे हैं, और हर शिक्षित इंसान ..हर तथ्य को स्वयं कि नजर से देखने और समझने का प्रयास करता है| ऐसे लोगों को भ्रामक, काल्पनिक और अव्यवहारिक तथ्यों के आधार पर अनुशासित नहीं किया जा सकता है | यहाँ आवश्यकता है कि, जो लोग आज ‘धर्म’ के स्वघोषित पैरवीकार बने हुए है…अपनी आँखें खोलें…और आज के समाज, विशेषकर युवाओं कि मनोदशा को समझने का प्रयास करें|
आज मेरे हमउम्र युवाओं में ‘धर्म’ के प्रति जबरदस्त विरोधाभास है, जिसके लिए स्वयं वो लोग जिम्मेदार हैं..जो आज ‘धर्म संचालक’ बने हुए है| आज कमोबेश सभी ‘धर्म’ अधार्मिक और अमानवीय गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं | लोगों कि आस्था का मजाक बनाया जा रहा है, धार्मिक भ्रष्टाचार चरम पर हैं| धर्म कि आड़ में कई लोगों ने अपना सुरक्षित ‘काला साम्राज्य’ खड़ा कर लिए है..अजीब तो यह कि कई कुख्यात अपराधियों को अपना चेहरा छिपाने का सबसे उपयुक्त माध्यम बन चुका है धर्म और इससे जुड़े कार्य | वास्तव में पूर्व से ही अव्यवहारिक, काल्पनिक, और भ्रामक तथ्यों, और कहानियों से भरे-पड़े ‘धर्म’ में आज जिस तरह धार्मिक भ्रष्टाचार, नैतिकताविहीन आचरण, द्धेष-जलन, अपराध, स्वार्थ,लालच, और लोगों कि आस्था का भरपूर शोषण हो रहा है…ऐसा जब तक होता रहेगा, किसी स्वस्थ और शिक्षित मस्तिष्क का इन्शान ‘धर्म’ कि तरफ नहीं लौट सकता है| आँखें मूंद लेने से सच नहीं बदलता है, आज इस देश का युवा भारतीय संस्कृति कि अपेक्षा ‘पश्चिमी संस्कृति’ कि तरफ आकर्षित हो रहा है, आने वाले कल में इस देश में, इस समाज में अपनी ही संस्कृति को मानने वाले अल्पसंख्यक होंगे ..और ऐसी किसी भी स्थिति के लिए वो सभी ‘धर्म संचालक’ जिम्मेदार होंगे…जिन्होंने धर्म को ‘बाजार’ बना दिया है|

आज अगर हम वास्तव में अपने धर्म और धार्मिक संस्कृति को लेकर चिंतित है, अगर हम वास्तव में अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं, हमें हालात को व्यहारिकता कि दृष्टि से समझना होगा | धर्म के व्याप्त खामियों, और विसंगतियों को तत्काल दूर करने का प्रयास करना होगा, इसके लिए प्रतिबद्ध लोगों ..धर्म के अंदर ही ‘सफाई’ का प्रयास करना होगा…पाखंड और ढोंगीपंथी कि दुकानो को बंद करना होगा | साथ ही धर्म को नए ढंग से परिभाषित करने कि आवश्यकता हैं, व्यवहारिकता और वास्तविकता के तराजू पर तौलना होगा | काल्पनिक और भ्रामक तथ्यों के साथ आज के युवाओं को ‘धर्म’ के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है| एक इंसान के रूप में हमारे व्यक्तिगत कर्तव्यों को धर्म का आधार बनाना होगा, कर्तव्यों को पूरा करने के लिए किये जाने वाले प्रयास (कर्म) को ही ‘पूजा’ मानना होगा.(कर्म ही पूजा है). ईश्वर को निजी जीवन से भी जोड़कर देखने कि आवश्यकता है. माता-पिता और बड़ों को सम्मानित मानते हुए ही एक स्वस्थ परिवार और समाज कि सोच संभव है |वेदों में प्राकृतिक स्रोतों को ईश्वर का दर्जा दिया गया है, पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए उस सोच को वास्तविकता के साथ परिभाषित करना होगा | प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण ही उनकी पूजा होगी, अगरबती जला के जिम्मेदारियों से छुटकारा पाने कि ‘कर्महीन’ सोच से बाहर निकलना होगा | ‘रामायण’ के नायक ‘राम’ के चरित्र का अनुशरण करने कि आवश्यकता है, लेकिन हमने उन्हें पत्थरों में बैठा दिया..चार अगरबत्तियां घुमाने से ज्यादा आवश्यकता ही नहीं पड़ी उनकी |
समय के साथ लोग बदलते हैं, परिस्थितियों बदलती है…नए लोगों कि भावनाओं से जुड़ने के लिए हर व्यवस्था में परिवर्तन कि आवश्यकता होती है | व्यवस्था परिवर्तनशील न हो, वह आधुनिक सोच के ऊपर बोझ बन जातीं है,…ऐसे में लोग बोझ से निजात पाना ही बेहतर विकल्प समझते है| जरुरत है कि आज हमारी धार्मिक व्यवस्था परिवर्तित हो, ज्यादा स्वस्थ, व्यवहारिक, और वास्तिक्त जीवन से जुडी हुई परिभाषा के साथ सामने आये..तो लोग इसे अवश्य ही हाथों-हाथ लेंगे और पुनः हम एक स्वस्थ भारतीय समाज कि नींव डाल पाएंगे | हमें आस्तिक और नास्तिक को परिभाषा से बाहर निकल के ‘वास्तिक’ (वास्तविक) बनना होगा |

                                                 

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...