Tuesday, 29 July 2014

आधुनिकता का पर्याय बनता 'नशाखोरी'

                                                                               - के.कुमार 'अभिषेक' (२८-०७-2014)


आज हमारे आधुनिक भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या है, नशाखोरी | ये सही है की प्राचीन भारतीय समाज में भी राजा-महाराजा, और बड़े रसूख वाले लोग विभिन्न प्रकार का नशा करते थे,| सामान्य वर्ग के पुरुष विशेष अवसरों पर मदिरा सेवन करते थे | लेकिन आज के भारतीय समाज में नशाखोरी किसी स्तर के साथ परिभाषित नहीं की जा सकती है, सभी स्तर/वर्ग के लोग आनंद प्राप्ति की कोशिस में उस अमृत का सेवन पूरी तत्परता से कर रहे हैं |
वास्तव में हम अपने समाज में फैली नशाखोरी का सरलता से अध्ययन हेतु वर्गीकरण करें, तो हमारे समाज में दो प्रकार के नशा सेवन करता होते है | १. कुछ नशाकर्ता ऐसे होते है, जो ऐसे पदार्थों के सेवन से अपनी सामाजिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, शारीरिक समस्याओं से कुछ देर के लिए बेखबर होना चाहते हैं| वो चाहते है की उनका मस्तिष्क चेतनाशून्य हो जाये और वे सभी कष्टों को कुछ देर के लिए भूल जाएँ ...इस वर्ग में बड़े उद्योगपति, व्यवसायी, अधिकारी, गाड़ियों के चालक, रिक्शावाले, ठेलेवाले, मजदुर आदि आ सकते है | दूसरा वर्ग उन नशाकर्ताओं का है, जिनको कोई कष्ट नहीं होता, कोई पीड़ा नहीं होती...वे मस्ती के लिए नशा करते हैं, अपनी शानो-शौकत दिखाने के लिए नशा करते हैं | इस वर्ग में बड़े उद्योगपतियों, व्यवसायियों के परिवार वाले, आधुनिक युवा, महाविद्यालयों, तकनिकी और प्रबंधन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र विशेष है|
चूँकि हमारी चर्चा भविष्य पर केंद्रित है, इसलिए अगर हम युवाओं की बात करें, तो स्थिति बेहद चिंताजनक है | हम समाज में बढ़ती नशाखोरी की बात करते हैं, लेकिन यह एक बेहद कड़वा सत्य है कि, हमारे देश के बड़े शिक्षण संस्थान नशाखोरी का अड्डा बने हुए हैं | मेरे हमउम्र मित्र अपने माता-पिता कि गाढ़ी कमाई का जमकर उपयोग ...नशीले पदार्थों के सेवन में कर रहे हैं | वास्तव में इस स्थिति के लिए वह सोच जिम्मेदार है, जिसके तहत हमारे समाज में , विशेषकर हम युवाओं में यह बात घर कर गई है कि ' नशाखोरी ही आधुनिकता कि वास्तविक पहचान है | आज हम युवाओं में एक विचार तेजी से विकसित हो रहा है कि, "अगर हमें बड़ा आदमी बनना है, हमें बड़ो कि तरह रहना होगा | उनकी जीवनशैली को अपनाना होगा " | फलस्वरूप हम बड़े (सफल) लोगों की तरह नशा करने लगते हैं, बड़े ब्रांड की व्हिस्की के बोतल में हम आधुनिकता ढूढ़ने लगते है,...और हमें लगता है की 'बड़ा' बनने का आधा काम पूरा हो गया | आज इन शिक्षण संस्थानों में ' नशा न करने वाले छात्रों' को गंवार समझा जाता है, उन्हें हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है | ऐसा लगता है की...नशा न करने वाले छात्र ..विकास और आधुनिकता की दौड़ में पिछड़ गए हैं |
नशे की बोतलों में आधुनिकता और अमीरी ढूढ़ने की यह कोशिश, इस देश के युवाओं को गलत दिशा में ले जा रही है |

युवाओं में नशाखोरी को बढ़ावा देने के लिए हमारी फिल्मे और टेलीविजन कार्यक्रम भी काम जिम्मेदार नहीं है | इस देशी के करोड़ों युवा लड़के लड़कियां भारतीय सिनेमा के अभिनेता/अभिनेत्रियों को अपना आदर्श मानते है | इनकी दीवानगी का ये आलम होता है की ये पसंदीदा कलाकारों की तरह बालों, और कपड़ों का अंदाज रख लेते है| यहाँ तक बोल-चाल में भी उनकी नक़ल करते है ...ऐसे लोग जब अपने पसंदीदा कलाकार को फिल्मों में नशा करते देखते हैं | दारू की बोतलों के साथ झूमते देखते हैं, तो उनका मन भी उस परमानंद की प्राप्ति के लिए मचल उठता है | इसकी हम बानगी, महाविद्यालयों के कैम्पस, गलियों, मुहल्लों, चौक, चौराहों पर भी दिख सकते हैं, जहाँ रोमियो वेषधारी मेरे हमउम्र मित्र किसी फ़िल्मी हीरो की तरह सिगरेट का धुंआ ...लहराते दिख जायेंगे |

अगर हमें इस देश को वास्तव में एक विकसित राष्ट्र बनाना है, युवाशक्ति को नष्ट होने से बचाना होगा | अगर हम वास्तव में एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना तैयार करना चाहते हैं, युवाओं में बढ़ती नशाखोरी पर चिंतन करना होगा | नशाखोरी सिर्फ फिजूलखर्ची का नाम नहीं है| आज समाज में बढ़ते अपराधों, और उन अपराधों में युवाओं की सक्रीय भूमिका...बढ़ती नशाखोरी और उससे पैदा हुई हीरोगिरी पर चिंतन को विवस करती  है !

Sunday, 13 July 2014

"मानवता को खंड-खंड करता धर्मों का पाखंड"

                                                                                              K.Kumar 'Abhishek' (13/07/2014)
               ((नोट-यह आलेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चूका है )
जैसा की हम सभी जानते हैं भारतीय समाज सदियों से धार्मिक परम्पराओं के नाम पर बने रूढ़िवादी विचारों से प्रभावित होता आया है| समाज के कुछ विक्षित सोच वाले लोगों ने अपने आपको धार्मिक मसीहा सिद्ध करके ...लोगों को काल्पनिक, अव्यवहारिक व् असामाजिक तथ्यों में उलझाने का काम किया | अपनी अस्वस्थ सोच के तहत धर्म की आड़ में लोगों को मानसिक गुलाम बनाने का सफल प्रयास किया गया...जिसके लिए ऐसे-ऐसे तर्कों, संवादों, कहानियों का प्रयोग किया गया..जिन्हे स्वस्थ मस्तिष्क के साथ स्वीकार करना संभव नहीं लगता ! भारतीय समाज के तत्कालीन हालत को देखते हुए..जब हम आज की परिस्थितियों कि वास्तविक विवेचना करें तो, कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि, आज के हालत ज्यादा सुखद हैं | आज जिस तरह से लोग धर्म की आड़ में बने पाखंड के साम्राज्य की हकीकत को समझ रहे हैं, जिस तरह लोग अपने ज्ञान की नजर से धर्म की काल्पनिक संरचना को समझने में दिलचस्पी ले रहे हैं, जिस तरह वर्षों पुरानी रूढ़िवादी, व् ढोंगापंथी की परम्पराओं के प्रति जागरूक हो रहे हैं....वास्तव में एक खुशनुमा अहसास से ह्रदय प्रफुल्लित हो उठता हैं! लेकिन जब भी हम राष्ट्र को मद्देनजर रखते हुए बड़े सन्दर्भ में वर्तमान हालत को देखते हैं ..धर्मनिरपेक्ष आधार पर परिवर्तनवादी सोच की कमी अवश्य खलती है| अक्सर यह देखा गया है कि, जब भी इस समाज का शिक्षित वर्ग धार्मिक व् सामाजिक परिवर्तन की बात करता हैं, जब भी अंधविस्वास, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, की बात होती है, असामाजिक, अव्यवहारिक और काल्पनिक कहानियों, तर्कों और रूढ़िवादी विचारों का जिक्र होता है....माना जाता है की बात सिर्फ हिंदुत्वा की हो रही हैं| ऐसा क्यों है? क्या हम यह मानते हैं कि, समाज के बहुसंख्यक वर्ग के सुधरने मात्र से ही देश सुधर जायेगा या, हम यह मानते हैं कि, अन्य धर्म पूर्णतः सही है, उनमे सुधार कि आवश्यकता ही नहीं है | क्या अन्य धर्मों में जातिवाद, पंथवाद, अंधविस्वास नहीं है? क्या अन्य धर्म रूढ़िवादी परम्पराओं, काल्पनिक व् अव्यवहारिक तथ्यों, मानवता और इंसानियत को खंडित करने वाली पाखंडी एवं कट्टरवादी सोच से विमुक्त हैं?
अगर नहीं तो सिर्फ एक धर्म विशेष ही आरोपी क्यों?
जहाँ तक मुझे पता है, अभी तक ऐसा कोई यन्त्र नहीं बना हैं जिसे पाखंड का पैमाना माना जा सके | जो साबित कर सके कि फलां धर्म में पाखंड कि अधिकता है....बाकि सभी विशुद्ध है | वास्तव में इस देश को पाखंड और अन्धविश्वास कि जाल से मुक्त कराने और मानवता को अखंडित होने से बचाने के लिए धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों कि प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष बनाना होगा | जिस तरह से आज हिन्दू धर्म को मानने वाले 'धर्म' कि खामियों के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं, लोग खुलकर और निडर भाव से धर्म संचालकों के असामाजिक कृत्यों के विरुद्ध विचार रख रहे हैं, जिस तरह धार्मिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक सामाजिक माहौल बन रहा हैं.....सभी भारतीयों को आगे आना होगा ! वे चाहे किसी भी धर्म के हों, उनकी संख्या न्यूनतम ही क्यों न हों.... उन्हें अपने समाज और राष्ट्र कि स्वच्छता के लिए प्रयास करना ही चाहिए | आज का दौर लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हैं, जहाँ हर व्यक्ति को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने कि आज़ादी है | धार्मिक व्यवस्था कि खामियों के विरुद्ध आवाज उठाना, और स्वस्थ धार्मिक परम्परा के लिए प्रयास करना ''ईशनिंदा'' नहीं हो सकता है | अगर वास्तव में ईश्वर है, वह ऐसे प्रयाशों पर कभी नाराज नहीं हो सकते | ऐसी अफवाहे लोगों को धर्म के प्रति प्रतिक्रियाहिन बनाने के लिए फैलाई गई है, ...धर्म को शासन का माध्यम नहीं बनाया जा सकता, लोगों को इसकी आड़ में वैचारिक गुलाम बनाना अपने आप में सबसे बड़ा अधर्म है |
हमें बेहद गहराई से इस तथ्य को समझना होगा कि किसी भी धर्म कि स्थापना का उदेश्य मानवता को खंडित करना नहीं था | यीशु मसीह, हज़रत मुहमद साहब, गौतम बुद्ध, गुरुनानक देव, और महावीर जैसे महापुरुषों कि सोच ऐसी नहीं हो सकती है | ये सभी सम्पूर्ण मानवता के समर्थक थे, इसलिए ये सभी मानवों के लिए आदर्श हैं,..और रहेंगे | सच तो यह हैं कि इनके बाद के धर्म संचालकों ने अपनी विक्षित सोच से पैदा हुई विचारधारा को इनके (धर्म संस्थापकों) नाम के साथ जोड़कर समाज में नकारात्मकता फ़ैलाने का कार्य किया, लोगों में धर्म के नाम पर गलत सन्देश दे कर समाज को खंडित करने का प्रयास किया गया , लोगों में एक दूसरे के प्रति जहर घोलने का प्रयास किया गया | वहीं कुछ धर्म संचालकों ने धर्म के नाम पर ही अपना बड़ा साम्राजय स्थापित कर लिया , अर्थात धर्म को राजनीति और साम्राज्यवाद का आधार बना मानवीय गुटबंदी कि गई ....और आम लोग स्वार्थ और लालच को धर्म समझते रहे |
अब लोगों को जगना होगा, हमें समझाना होगा को एक स्वस्थ विचारधारा के प्रभाव में आकर हम सभी अलग-अलग धर्मों में खंडित हो गए ...अन्यथा हम सभी इन्शान ही हैं | यह ठीक वैसा ही है...जैसे हम सभी भारतीय होते हुए भी विभिन्न राजनीतिक विचारों में बंटे हुए है,...कोई कोंग्रेसी है, कोई भाजपाई है, कोई कम्युनिस्ट है तो कोई 'आपवाला ' है | यह प्रश्न बेहद लाज़मी है कि इन धर्मों कि स्थापना से पहले हम (हमारे पूर्वज) किस धर्म में थे? स्पष्ट है कि मानवता के धार्मिक विखंडन का आधार सिर्फ व् सिर्फ वैचारिक है अनुवांशिक नहीं | हमें उस भाव को जगाना होगा, मानवतावादी सोच को पुनर्जीवित करना होगा...और तभी हम एक स्वस्थ समाज कि स्थापना कर सकते हैं, एक मजबूत राष्ट्र कि नींव रख सकते हैं | यह देश अल्पसंख्यकों -बहुसंख्यकों का नहीं हैं, पूर्णसंख्यकों का है. यह हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाईयों कि भूमि नहीं....१२५ करोड़ भारतीयों कि भूमि है | इस मिटटी के १२५ करोड़ सपूत हैं, इसने अपने पुत्रों में कभी भेद-भाव नहीं किया...हमें शर्म आनी चाहिए कि हम अपने ही भाइयों के साथ भेद-भाव कर रहे हैं| 

                          
                                    

! भ्रष्टाचार के दल- दल में शिक्षा जगत !

                                                                                         K.Kumar 'Abhishek' (24/06/2014)
पिछले कुछ दिनों से लगातार दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम को लेकर विवाद की खबरे आ रही हैं! इस पुरे विवाद की वजह से देश के कोने-कोने से दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए आये लाखों छात्रों का भविष्य आधार में लटक गया है ! इस पाठ्यक्रम की मान्यता को लेकर "विश्वविद्यालय अनुदान आयोग" और 'यूनिवर्सिटी प्रशासन' आमने-सामने आ चुके है..! बात बढ़ते-बढ़ते प्रतिष्ठा का विषय बन चुकी है, यही कारण है की सही हो गलत, कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा है....इस पुरे ड्रामेबाजी में लाखों बच्चों के भविष्य की चिंता किसी भी पक्ष में नहीं दिख रही है,!
दरअसल आज भारतीय शिक्षा जगत के अंदरुनी हालत लगातार बद से बदतर होते चले जा रहे हैं! हालत और परिस्थितियों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा की जिस प्रकार की धांधली, फर्जीवाड़ा, और भ्रष्टाचार इन शिक्षण संस्थानों में हो रहा हैं, ऐसी स्थिति देश की किसी व्यवस्था में नहीं है ! आज देश में उच्चा शिक्षा के नाम पर जम कर भ्रष्टाचार हो रहा है, देश में ऐसे हज़ारों विश्वविद्यालय हैं, जहाँ प्रमाणपत्रों की बिक्री हो रही है! इनमे से ज्यादातर निजी विश्वविद्यालय है, जिनकी बागडोर बड़े व्यवसायियों, उद्योगपतियों, और शिक्षा माफिआओं के हाथ में हैं, ....समझाना मुश्किल नहीं की ये वो लोग है...जिन्हे छात्रों के भविष्य की फिक्र नहीं, अपने व्यवसाय की फिक्र है...! ऐसे संस्थानों में ऊपरी चमक-दमक काफी होती है! अच्छी बिल्डिंग, अच्छे और आधुनिक व्यवस्था से पूर्ण कक्षाएं, लैब इत्यादि! वास्तव में छात्रों को आकृषित करने के लिए हर वो व्यवस्था बनाई जाती है, जो एक व्यवसाय में संभव हो, लेकिन हकीकत यही है की ऐसे संस्थानों में शिक्षा नहीं, शिक्षा का व्यवसाय होता है ! अजीब बात तो यह की पैसों के लिए हो रहे इस खेल के प्रभाव में देश के कई केंद्र एवं राज्य संचालित विश्वविद्यालय भी आ रहे हैं...अर्थात अब सरकारी विद्यालयों में भी प्रमाणपत्रों की खरीद-फरोख्त किये जा रहे हैं! वास्तव में नाजायज पैसों के इस व्यवसाय में विश्वविद्यालयों में एक पूरा नेटवर्क कार्य करता है!
बात यही ख़त्म हो जाती तो भी अच्छा होता लेकिन देश में उच्च शिक्षा के प्रचार-प्रसार,एवं नियंत्रण के लिए बने कई समितियां स्वयं गले तक भ्रष्टाचार की दल-दल में फंसी हुई है! आज देश में भर में ऐसे सैकड़ों उच्च शिक्षण संस्थान है, जो विश्वविद्यालय के लिए तय मानकों और मापदंडों के अनुरूप नहीं है, फिर भी उनका संचालित होना ...और शिक्षा के नाम पर व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल होना "विश्वविद्यालय अनुदान आयोग" की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता हैं! समझना मुश्किल नहीं है की ऐसे संस्थानों को खुल्ली छूट देने के पीछे 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' ने कैसी सौदेबाजी की होगी! अब तो दूरस्थ शिक्षा भी 'यु जी.सी' के अधीन है, जो अपने आप में शिक्षा का मजाक है! लगभग यही स्थिति 'तकनिकी' शिक्षा की भी है! आज धड़ल्ले से देश भर में तकनिकी संस्थान खुल रहे हैं, जो सिर्फ और सिर्फ शिक्षा माफिआओं के लिए धन-उगाही केंद्र बने हुए हैं....! भारत में ऐसे हज़ारों तकनिकी संस्थान संचालित है, जो तकनिकी पाठ्यक्रमों के लिए आवश्यक मापदंडों को पूरा नहीं करते हैं, ! परदे के पीछे लाखों के खेल से इन संस्थानों को 'अखिल भारतीय तकनिकी शिक्षा परिषद' द्वारा अनुमोदित किया जाता है! अनुमोदन के लिए जाँच प्रक्रिया तो सिर्फ एक कागजी खानापूरी भर होती है!
वास्तव में इस देश की शिक्षा व्यवस्था को गर्त में ले जाने के लिए , सरकार द्वारा गठित समितियों की भूमिका काबिलेगौर है! देश में शिक्षा के नाम पर जिस तरह का बाजार खड़ा किया गया है, इसके पीछे इनकी शह को नकारा नहीं जा सकता है! अगर हम ताज़ा घटनाक्रम को ही लें तो, "अगर "दिल्ली यूनिवर्सिटी" का पाठ्यक्रम गलत हैं, तो जब ऐसे पाठ्यक्रम आरम्भ किये गए थे, उस समय यु.जी.सी क्या कर रहा था? क्यों नहीं, ऐसे पाठ्यक्रम को आरम्भ में ही रोका गया? क्या विश्वविद्यालय प्रशासन से इस पाठ्यक्रम पर सफाई मांगी गई थी? अगर जवाब 'ना' हैं, ऐसे में यु.जी.सी स्वयं सवालों के घेरे में आ जाती हैं! देश में उच्च शिक्षा के प्रचार-प्रसार, एवं नियंत्रण के लिए गठित इन सरकारी समितियों की विश्वसनीयता इस हद तक गिर चुकी है की , कोई नियंत्रण विश्वविद्यालयों के ऊपर नहीं रह गया है! नेताओं के लिए पैसा उगाही का केंद्र बने, यु.जी.सी की अंदरुनी हकीकत किसी विश्वविद्यालय से छिपी नहीं है, ऐसे में ऐसी सर्वोच्च संस्था से उन्हें भी कोई डर नहीं होता ! आज देश के विभिन्न न्यायालयों में लंबित सैकड़ों मामले 'विश्वविद्यालयों एवं यु.जी.सी' के बीच के संबंधों की हकीकत बयां करने के लिए प्रयाप्त हैं!
बुरी खबर यह है की दिल्ली यूनिवर्सिटी एवं यु,जी.सी के बीच चल रही नूरा-कुश्ती में दखल देने से केंद्र सरकार ने भी मना कर दिया है! जिस सरकार ने युवाओं को सामने रखकर देश के विकास का प्रण लिया हो, उससे इतनी संवेदनहीनता की उमीद कतई नहीं थी! मुझे लगता है शिक्षा मंत्रालय को इस मामले की गंभीरता को समझना चाहिए और तत्काल हस्तछेप करना चाहिए, जिससे छात्रों का भविष्य अंधकार में न डूबे ! साथ ही शिक्षा मंत्रालय को देश में शिक्षा व्यवस्था के सञ्चालन एवं नियंत्रण के लिए बनी ऐसी समितियों की कार्यशैली को सुधारने के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए! अच्छा होगा की इन सभी समितियों को सरकार तत्काल प्रभाव से भंग करे...और कड़े प्रावधानों के साथ नयी समितियां गठित हो,...जिससे देश भर में फैले शिक्षा के बाज़ारीकरण पर रोक लगे, और शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार नियंत्रित हो सके, ! साथ ही विश्वविद्यालयों की दशा और दिशा सुधरने के लिए सरकार को स्वयं मजबूत पहल करना होगा, तभी इस देश की युवाशक्ति बेहतर ज्ञान-विज्ञानं की सम्पन्नता के साथ...एक मजबूत, सशक्त एवं विकसित भारत की स्थापना में अपना अग्रणी योगदान दे सकती हैं!


                           

!साहित्यकारों के संकीर्ण विचारों में सिमटता हिंदी साहित्य!

                                                                                             K.Kumar 'Abhishek' (13/07/2014) 
                 (नोट-यह आलेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चूका है )
एक तरफ जहाँ हमारी सरकार हिंदी के उत्थान के लिए बड़े और सार्थक प्रयास कर रही हैं, वहीँ हिंदी के आधुनिक साहित्यकारों की सोच और विचारधारा लगातार हिंदी के विकास में बाधक बन रही हैं! मुख्य रूप से जब हम हिंदी साहित्य की बात करें, तो यह जानना बेहद दुखद है की आधुनिक हिंदी साहित्य के बड़े साहित्यकारों ने अपनी सोच को ही साहित्य का पैमाना मान लिया है! अपनी रचनात्मक सीमाओं को ही वे "साहित्य की सीमा " मान बैठे हैं! उन्हें लगता है की साहित्य उनके व्यक्तित्व में ही पूर्ण हो गया है, ! फलस्वरूप हिंदी साहित्य कुछ संकुचित दिवारों में कैद हो चुका हैं! जिस साहित्य ने भारतीय समाज को रूढ़िवादी विचारों की कैद से मुक्त करने का काम किया, जिस साहित्य ने लोगों को आज़ादी का मतलब सिखाया, आज उसी साहित्य का कुछ लोगों की संकीर्ण एवं रूढ़िवादी विचारों में कैद होना...इस भाषा का दुर्भाग्य हैं!
आज स्थिति बेहद दुखद है कि कुछ बड़े रचनाकार साहित्य को मनोरंजन का साधन मान बैठे हैं तो, कुछ लोगों के लिए दूसरों कि रचनाओं को परिवर्तन के साथ पेश करना ही साहित्य है! सर्वाधिक अजीब बात तो यह कि, कुछ रचनाकार हिंदी के जटिल एवं आम बोल-चाल कि भाषा में प्रयुक्त नहीं होने वाले शब्दों के प्रयोग को ही साहित्य मानते हैं! ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी रचनाये आम-जन मानस तक पहुंच पाएंगी? जटिल शब्दों से परिपूर्ण रचनाएँ, जो सामान्य इन्शान को समझ नहीं आ सकती...क्या समाज में सार्थक संदेश दे पाएंगी? संभव ही नहीं! स्पष्ट है कि आज साहित्य का उदेश्य बदल गया है, विद्वानो के मुख से चार अच्छे शब्द प्राप्त कर लेना और मंच पर तालियां पा लेना ही साहित्य कि सार्थकता बन गया है! रचनाएँ देश कि जनता के लिए नहीं, बड़े विद्वानो के लिए रची जा रही है....ऐसे में अगर आम जनता, आज कि युवा पीढ़ी साहित्य से दूर जा रही है तो, कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए! वास्तव में हालात और परिस्थितियों कि तार्किक विवेचना हम करें तो, यह कहना गलत नहीं होगा की आम जनता साहित्य से दूर नहीं हो रही हैं, अपितु साहित्य ही आम जनता से दूर हो रहा हैं! साहित्य एक ऐसे संकुचित राह में प्रवेश कर चुका है, जहाँ आज के स्वछंद एवं खुल्ले विचारों के लिए कोई जगह नहीं है!
आज जिस तरह से युवा वर्ग हिंदी साहित्य के प्रति बेरुखी दिखा रहा हैं, जिस तरह हमारी आनेवाली पीढ़ी साहित्य से दूर हो रही है...ऐसे महानुभावों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है! अगर हम वास्तव में हिंदी एवं हिंदी साहित्य के उत्थान के प्रति गंभीर हैं, तो हमें साहित्य को नए ढंग से परिभाषित करना होगा! विद्वानों की पसंदगी साहित्य का पैमाना नहीं हो सकता ! इतिहास गवाह है कि, जब-जब देश में परिवर्तन की बयार बही है, उस बयार को तूफान में बदलने का काम किया है 'साहित्य' ने ! साहित्य अगर आम जनता कि भावनाओं को छू सके, ....समाज में वैचारिक परिवर्तन कि नीव डाल सके.....सही मायनो में साहित्य कि सार्थकता पूर्ण हो जाती है! समाज एवं राष्ट्र का वैचारिक नेतृत्व साहित्य कि सार्थकता और रचनात्मकता का पैमाना होना चाहिए!
स्वस्थ वैचारिक आज़ादी का नाम ही साहित्य है, "परिवर्तन क्रांति" का नाम साहित्य है! साहित्य की सीमाएं अनन्त है, इसकी सीमाओं को अपनी सोच में कैद करना, साहित्य का अपमान है! जो लोग अपनी सोच को ही साहित्य का पैमाना मान बैठे हैं, उन्हें समझाना होगा की, कहीं उनकी नीति हिंदी साहित्य के पतन का कारन ना बन जाये ! रचनाएँ लोगों तक पहुंचे, उन्हें समझ में आएं....इसके लिए प्रयास होना चाहिए! अनादि काल से साहित्य ने समाज का नैतिक एवं वैचारिक मार्गदर्शन किया है, स्वस्थ समाज को बनाये रखने में साहित्य ने बड़ी भूमिका निभाई है! आज ऐसे समय में जब समाज में मानवीय, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की कमी सामने आ रही है, भ्रस्टाचार, अपराध, कुकर्म, बलात्कार जैसी घटनाएँ बढ़ रहीं है...निश्चय ही हमें साहित्य की भूमिका को प्रखरता के साथ 'जनहित' की तरफ मोड़ना होगा ! ऐसे में हिंदी के साहित्यकारों को अपनी भूमिका पर नए सिरे से आत्म मंथन करना होगा! यह प्रयास करना होगा की , रचनाएँ सिर्फ बड़े विद्वानो से प्रसंशा के लिए न लिखी जाएँ...कुछ तालियों में न सिमट के रह जाएँ...अपितु वे आम जनता की भावनाओं को कुरेंदे, लोग रचनाओं को पढ़े और समझे ...जिससे समाज के अंदर गिरते नैतिक मूल्यों में कमी आये, देश और समाज में बिगड़ते हालात के विरुद्ध माहौल बने और , हमारा समाज पुनः एक बार साहित्य के वैचारिक मार्गदर्शन में मजबूती के साथ आगे बढ़ सके !
साथ ही हमें साहित्य को जड़वत होने से बचाने के लिए नयी सोच एवं नयी ऊर्जा को जगह देनी होगी! और इसके लिए पुराने बने-बनाये पैमानों को आवश्यकतानुसार तोडना होगा! हम रचनात्मकता की कोई सीमा नहीं तय कर सकते हैं...ऐसा होना साहित्य को सीमित करने का प्रयास हो सकता है!

                                           

बिहार : जातिगत राजनीति की प्रयोगशाला

                                                                                                  K.Kumar 'Abhishek' (06/05/2014)
लगभग २ माह की आपाधापी और राजनीतिक नूरा-कुश्ती के पश्चात १६ वि लोकसभा का गठन हो चूका है! नयी सरकार ने अपने काम-काज भी प्रारम्भ कर दिए हैं! इस तरह गुजरते समय के साथ हमारी नज़रों ने राजनीति की एक और परिक्रमा पूरी कर ली है, इस परिक्रमा में कुछ सवालों के जवाब मिले तो, कई नए सवाल भी पैदा हुए है! मुख्य रूप से बिहार की राजनीति में जिस तरह का परिवर्तन देखने को मिला है, वह कई अनचाहे सवालों को जन्म दे रहा है,! देखना दिलचस्प होगा की, विकास और परिवर्तन के नाम पर वोट देकर नयी शुरुआत करने वाली बिहार की जनता के हिस्से में क्या आता हैं? जातिवाद की राजनीति से बार-बार ठगी गई जनता, क्या अपने मत की सही किमत पायेगी? क्या केंद्र की उपेक्षा से निजात इस पिछड़े राज्य को मिल पायेगा? क्या नयी सरकार के कार्यकाल में बिहार विकास की मुख्यधारा में प्रवेश कर पायेगा? ये प्रश्न निश्चय ही वर्तमान बिहार की राजनीति से जुड़े हो, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है!
आज आज़ादी के लगभग ६७ वर्ष बाद भी यह प्रमाणित तथ्य है कि बिहार की जनता हमेशा से केंद्र की अपेक्षा का शिकार रही है,! देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मभूमि, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कर्मभूमि, और शांति एवम अहिंषा के दूत महात्मा बुद्ध की तपोभूमि, आज़ादी पूर्व अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का शिकार हुई तो, आज़ादी के बाद अपने ही राजनेताओं की कर्महीनता का शिकार होती रही है ! लेकिन जब भी राष्ट्रीय राजनीतिक परिपेक्ष्य में बिहार की भूमिका की बात होती है, यह बेहद कड़वा परन्तु वास्तविक सत्य है की "बिहारभूमि सर्वथा से जातिगत राजनीति कि प्रयोगशाला रही है"! हमारे राजनेताओं ने अंग्रेजों की नीति "बांटों और राज करों" का भारतीयकरण बिहार की भूमि से ही शुरू किया ! यह बिहार की जनता का दुर्भाग्य है की इस राज्य से निकालकर सत्ता के शिखर पर विराजमान होने के बावजूद किसी ने भी राज्य की विकास की बात नहीं की! पूर्व से ही सामाजिक, आर्थिक ,शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जनता को, जाति-धर्म, और अगड़ा- पिछड़ा की गन्दी राजनीतिक चालबाजी में फंसाकर मानसिक रूप से राजनीतिक गुलाम बनाने का प्रयास किया गया! समाज को जातिगत आधार पर तोड़ने के लिए रूढ़िवादी विचारों,धार्मिक परम्पराओं के साथ-साथ इतिहास का भी जमकर सहारा लिया गया,और कई-कई बार राजनीतिक स्वार्थ में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर भी समाज को खंडित करने का काम किया गया! लोगों को रूढ़िवादी परम्पराओं के नाम पर एक दूसरे का विरोधी बनाया गया, और अपने आपको किसी जाति/वर्ग का स्वघोषित नेता सिद्ध करने के लिए जाति-धर्म के आधार पर सामाजिक गुटबंदी की गई! अहम बात तो यह की कुछ राजनेताओं ने अपने आपको किसी समूह का हितैषी सिद्ध करने के लिए, अनावश्यक रूप से अन्य जातियों का राजनीतिक एवं व्यवहारिक अपमान भी किया ! सत्ता के लालच में और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अंजाम देने के प्रयाश में, बिहार की जनता को बार-बार ठगा गया ! सर्वाधिक ध्यान देने और समझने की बात तो यह है की, ठगी का शिकार वे मतदाता भी हुए जिनका कोई सामूहिक रूप से राजनीतिक नेतृत्व नहीं बन पाया और वे मतदाता भी हुए जिनको नेता तो मिला लेकिन नेतृत्व नहीं! चुनाव पूर्व जनता से बड़े बड़े वादे हुए,विकास की बातें भी हुई, लेकिन समाज में ऐसी अराजकता पैदा की गई, जिससे जनता को सिर्फ अपनी जाति/वर्ग कि राजनीति करने वाले दल /व्यक्ति की सरकार में ही ख़ुशी मिल जाये! जातिवाद का जहर समाज में इस तरह घोला गया कि लोग, अपनी जाति/वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले नेता को उच्च पद पर बैठ जाने को ही बड़ी उपलब्धि और जातिगत विकास का पैमाना समझने लगे! लोगों को बिजली,पानी, सड़क, शिक्षा, रोजगार, जैसी जन-मानस कि बुनिवादी समस्याओं कि चिंता नहीं थी, ...उन्हें अपने जाति के नेता को उच्च पद पर बैठाने कि चिंता ही ज्यादा होती थी! लोग इस हद तक नकारात्मकता विचारधारा में बहक गए थे, कि अपनी गन्दी राजनीतिक चालबाजी से सत्ता में पहुचने वाले नेताओं का विकास ही अपना और अपनी जाति का विकास लगता था! जबकि व्यवहारिक तौर पर ऐसा संभव नहीं हो सकता है !
स्पष्ट है कि बिहार कि जनता को अपनी अवसरवादी जातिगत राजनीति कि बदौलत प्रदेश के नेताओं ने अपना राजनीतिक गुलाम बंनाने का कार्य किया था! संभव हैं कि 'राजनीतिक गुलाम' एक अलोकतांत्रिक शब्द माना जाये, लेकिन बिहारियों कि राजनीतिक विचारधारा को यही शब्द ज्यादा उचित लगता है! अब ऐसे में जब लोगों कि सोच बदली है, बिहार के मतदाता व्यवहारिक तौर पर ज्यादा चिंतनशील हुए है! उनकी राजनीतिक विचारधारा जाति/धर्म कि सीमाओं से आगे निकल कर विकास और परिवर्तनवादी हो रही है, हम उमीद करते हैं कि केंद्र में आई नयी सरकार और मुख्यतः सरकार के मुखिया श्री नरेंद्र मोदी ......बिहार कि जनता कि इस नयी सोच का स्वागत करेंगे, राज्य के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, एवं आद्योगिक विकास के लिए बेहतर नीति और नियत से आगे आएंगे .......जिससे जनता को नयी सोच के साथ किये गए मतदान कि सहीं किमत मिले....और जनता पुरानी जातिवादी राजनीतिक विचारधारा कि तरफ लौटने से बच सके !

                                     

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...