Sunday, 8 June 2014

धर्म कि कैद में 'अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता'

                                                                                                    K.Kumar 'Abhishek' (08/06/2014)
                    (यह आलेख सर्वक्षेष्ठ हिंदी दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है )         
'भाषा' अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम हैं! 'भाषा' ही एक मात्र ऐसी व्यवस्था हैं जो हम इंसानों के बीच व्यवहारिक एकता कायम करती  हैं! ऐसे समय में जब हम वैश्विक विकास की बात करते हैं, मानवीय एकता की बात करते हैं, क्या किसी "भाषा" को धर्म की सीमाओं में बांधना उचित है? क्या किसी भाषा को 'एक धर्म विशेष' के साथ जोड़कर परिभाषित करना उचित है? हिन्दुओं के लिए हिंदी, मुस्लिमों के लिए उर्दू, सिखों के लिए पंजाबी, जैसी संकुचित वैचारिकता  के साथ क्या हम मानवीय एकता कायम कर सकते हैं? क्या हम अभिव्यक्ति के साधन को धार्मिक भावनाओं से जोड़कर "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" के अधिकार का हनन नहीं कर रहे ?

यह कड़वा सत्य सिर्फ भारतीय समाज ही नहीं, अपितु  वैश्विक समाज की एक दुर्भाग्यपूर्ण तस्वीर पेश करता हैं कि.....मानवीय अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम साधन, हमारी भाषाओँ को धर्म कि वैचारिक चाहरदिवारी में कैद कर लिया गया है! ऐसा करके हम कहीं न कहीं सामान्य मानवीय अधिकारों का अनैतिक हनन कर रहे हैं, और ऐसा होना सम्पूर्ण मानवता के लिए शर्मनाक हैं! भाषाई आज़ादी कि अधिकार इस धरती पर जन्म लेने वाले हर इन्शान का अधिकार होना चाहिए, धर्म कि आड़ में उसकी भाषा कि स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए! सर्वाधिक दुर्भाग्य है कि इस शर्मनाक स्थिति के साथ ही हम लगातार अपनी जीवनशैली को जी रहे हैं,...हमें इस बात का तनिक भी अहसास नहीं हैं कि हमारे लब्जों में धार्मिक तालाबंदी कि गई है!
आज समय बदल रहा है, इन्शान ज्ञान के हर सागर में डुबकी लगाना चाहता है, जिसके लिए अधिक से अधिक भाषाओँ का ज्ञान आवश्यक है! हमें समझना होगा कि हम इन्शान के ऊपर भाषाई पाबंदियां लगा कर .....उसे ज्ञान-विज्ञानं से दूर करने का कार्य कर रहे हैं! आज पूरी दुनिया खुल रही हैं, सभी सीमाएं ध्वस्त हो रही है...ऐसे में धर्म के आधार पर भाषाई पाबंदियां मानवीय विकास में बाधक ही होंगी!
हिन्दू के लिए 'हिंदी' और मुस्लिमों के लिए उर्दू ....वाली सोच से ग्रसित हमारे मित्रों को इतिहास कि गहराई से समिक्षा करने कि आवश्यकता है! इतिहास को सामने रखकर हम उन परिस्थितियों कि वास्तविक विवेचना करें तो....यह समझाना बिलकुल भी मुश्किल नहीं होगा कि ....हर धर्म के प्रचार-प्रसार में 'धर्म संस्थापकों'' कि व्यक्तिगत भाषा-व्यव्हार का सर्वाधिक योगदान था,  धर्मों का प्रचार-प्रसार भी उन्ही क्षेत्रों तक सिमित था ...जहाँ तक धर्म संस्थापक कि भाषा समझी जा सकती थी !  यही कारण हैं कि धर्म संस्थापकों कि भाषा-व्यव्हार को ही धार्मिक भाषा मान लिया गया! इसके पीछे  कोई बड़ा धार्मिक कारण या, संस्थापकों का आदेश नहीं छिपा था...लेकिन बाद के धर्म-संचालकों ने इसे धर्म कि पहचान से जोड़कर....मानवता को खंडित करने का एक और मजबूत हथियार बना लिया! भाषा भी धार्मिक कट्टरता के आधार बन गए, ! जिस तरह दूसरों के धार्मिक परम्पराओं, रीती-रिवाजों को मानना...अपने ईश्वर का अनादर करना माना गया...उसी तरह दूसरों कि भाषाओँ को पढ़ना भी 'पाप' माना गया! हालाँकि अलग-अलग देशों में धार्मिक वर्चस्व के आधार पर...हालत ऐसे बने ...जहाँ दूसरे धर्म कि भाषाओँ को अध्ययन आवश्यक था....लेकिन मज़बूरी में!
आज अगर हम वास्तव में जाती-धर्म से ऊपर उठकर मानवता कि बात करना चाहते हैं, मानवीय एकता कि बात करना चाहते हैं,...हमें अपनी रूढ़िवादी वैचारिक सीमाओं से बाहर आना होगा! उन पाबंदियों को तोड़कर ही हम एकजुट समाज कि कल्पना साकार बना सकते हैं, जो धार्मिक कट्टरता का कारण बनी हुई है! 'भाषा' को धर्म कि सीमाओं से अलग करना ...मानवीय एकता के लक्ष्य में मजबूत और सर्वाधिक सार्थक कदम होगा! इसके लिए प्रयास  को स्वयं का रूप देना होगा, हमें अपने बच्चों को ऐसी व्यवस्था देने का प्रयाश करना होगा कि वे भाषा के आधार पर किसी धर्म को न परिभासित करें! उनके अंदर यह सोच न पैदा हो कि....हर उर्दू बोलने वाला 'मुस्लिम' है, हर हिंदी बोलने वाला हिन्दू और हर पंजाबी बोलने वाला 'सिख' है  '!


                                                                                                        

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...