Wednesday, 21 May 2014

नितीश कुमार की चतुराई

                                                                                                K.Kumar 'Abhishek' (21/05/2014)
 (यह आलेख,मुख्य  हिंदी समाचारपत्र "दैनिक जागरण" के सम्पादकीय पृष्ठ (२१/०५/२०१४) पर भी प्रकाशित हो चूका है.... )
 बिहार में नए मुख्यमंत्री होंगे समाज के सबसे दबे-कुचले वर्ग से आने वाले विधायक “जीतन राम मांझी” ! एक तरफ विपक्षी पार्टियां नितीश कुमार के इस कदम से हतप्रभ हैं, और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है की क्या बयान दें?….कहीं बयान दलित विरोधी न साबित हो जाये..इसका डर भी सता रहा है!~ दूसरी तरफ कई विद्वान इसे बहुत बड़े परिवर्तन के तौर पर देख रहे हैं…और इस कदम के लिए नितीश कुमार को चारों तरफ से बधाइयाँ भी मिल रही है!
वास्तविक रूप से देखें तो नितीश कुमार जी एक अनुभवी और चतुर राजनेता हैं ..इसलिए उनका यह कदम राजनीति से प्रेरित नहीं है…कहना गलत होगा…! विशेषकर तब जब उन्हें अहसास हो चूका है की उनका परम्परागंत वोट बैंक बिखर रहा है…बिहार में पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग ही उनका राजनीतिक आधार रहा है…लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में वोटो का बिखराव खुलकर हुआ! हालाँकि कुछ मीडियावाले इस घटना क्रम को इसे नितीश कुमार और शरद यादव के बीच नूरा-कुस्ती के तौर पर पेश कर रहे हैं, मिडिया की खबरों से प्रभावित होकर कुछ ऐसी घटनाये भी हुई…जिससे लगा, नितीश कुमार और शरद यादव आमने सामने हैं! यहाँ यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है की परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हो….लेकिन ‘जद-यु’ में नितीश कुमार को चुनौती देने की स्थिति में शरद यादव नहीं हैं, और न होंगे..!..हकीकत है की बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के बहुत से लोग यह भी नहीं जानते की शरद यादव कौन हैं? !
वास्तव में इस पुरे घटनाक्रम को, एक नए राजनीतिक परिवर्तन की सुगबुगाहट के तौर पर मैं देख रहा हैं! इस चुनाव के बाद जो परिस्थितियां निकल के सामने आ रही हैं….उसमे यह कहना मुश्किल नहीं है की अगली सरकार के सामने कोई विपक्ष नहीं होगा! कांग्रेस का पूरा प्रदर्शन एक क्षेत्रिय दल के समतुल्य नजर आ रहा है…और लगता नहीं की कांग्रेस आगामी सरकार को संसद में कोई चुनौती दे पायेगी ! ऐसे में देश के कई दल भारतीय राजनीति में कांग्रेस की जगह लेकर भविष्य में खुद को एक विपक्ष और भाजपा विरोधी राजनीति का केंद्र बनाने का प्रयास करेंगे और शायद इसी कोसिस में एक मजबूत पहल की तरफ बढ़ना चाहती है “जनता दल-यूनाइटेड ” !

जैसा की हम सभी जानते है की नितीश कुमार, श्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी माने जाते हैं, दोनों की प्रतिद्वंदिता सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, व्यक्तिगत भी रही है, …इसलिए उनके नाम से मोदी विरोधियों को एक-जुट करने का प्रयास हो सकता है ! मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र के बाद, नितीश कुमार निश्चय ही आराम फरमाने नहीं जा रहे हैं! अब नितीश कुमार का पूरा समय पार्टी के लिए होगा…और वे एक राजनीतिक गोलबंदी के लिए मजबूत प्रयास करेंगे…..!
यहाँ एक बात और समझाना होगा की…चुनाव में विरोधियों पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर और जनता को परिवर्तन के नाम पर बड़े-बड़े सपने दिखा कर, श्री नरेंद्र मोदी जी भारी जनमत से चुनाव जीत तो गए …लेकिन यह जनमत …जनता की उमीदों का प्रमाण भी है! जनता मोदी जी को एक जादूगर के तौर पर देख रही है…जिसके चुटकी बजाते ही…गैस और पेट्रोल के दाम आधे हो जायेंगे, खाने-पिने की वस्तुओं के दाम आधे हो जायेंगे, गांवों में बिजली आएगी, सड़के बनेंगी..आदि-आदि ! लेकिन अगर ये वादे पुरे नहीं हुए…तो जनता इसे विश्वासघात के तौर पर लेगी …..उन परिस्थितियों में जो मोदी विरोध के नाम पर राजनीति करता दिखेगा….बहुत संभव है की जनसमर्थन उसके साथ होगा! मोदी जी के लिए चुनाव जितना मुश्किल नहीं था…कांग्रेस के भ्रस्टतंत्र से जनता इस हद तक त्रस्त थी की उन्हें सिर्फ अपने आपको एक विकल्प के रूप में पेश करना था….लेकिन असली चुनौती अब है, क्योकि जनता मोदी जी के बड़े-बड़े भाषणों से उनके कामों की तुलना करेगी…!

वास्तव में यह एक राजनीतिक गोलंबंदी की सुगबुगाहट है…जिस तरह से शरद यादव ने जन-विरोध के बावजूद कहा की – “नितीश जी इस्तीफा वापस नहीं लेंगे! इस्तीफा देश हित में है …पार्टी और नितीश कुमार के हित में है” ! आँख खोल के समझने वालों के लिए इस जिद्द के पीछे की राजनीति समझाना मुश्किल नहीं होना चाहिए ! हाँ अभी मोदी जी का समय चल रहा है…ऐसे में कुछ लोग इसे पागलपन कह सकते है, इसे स्वार्थ और लालच का नाम भी दे सकते है! लेकिन भविष्य किसका होगा? कहना मुश्किल है…मोदी जी ने अच्छे काम किये तो उनका हो सकता है…लेकिन कांग्रेस के लिए भविष्य की संभावनाएं धूमिल दिख रही है….ऐसे में अगर कोई राजनीतिक दल कांग्रेस की जगह लेने के सपने देखे तो हर्ज भी क्या है? वैसे भी नितीश कुमार का यह प्रयास, भाजपा के “कांग्रेस मुक्त भारत” बनाने में एक प्रकार का सहयोग ही होगा !
लोकतंत्र की सफलता मजबूत सरकार के साथ-साथ सक्षम विपक्ष में निहित है..अन्यथा सरकार के निरकुंश होने की सम्भावना बढ़ जाती है!--

                                               

Sunday, 11 May 2014

एक कहानी: अतिथि देवता

एक बार गर्मियों की छूटी में एक पुराने पारिवारिक मित्र हमारे घर पधारे ! उनकी बड़ी खातिरदारी हुई, तरह-तरह के देशी व्यंजन बनाये गए. .! उन्होंने आतिथ्य सत्कार का भरपूर आनंद लिया ! वैसे भी गांव वालों के अतिथि सत्कार में मौसम कोई कारण नहीं होता, चुकी हमारे पारिवारिक मित्र शहर से थे, जोश-जोश में व्यंजन उड़ा तो गए, लेकिन कुछ ही देर में उनकी पाचन-शक्ति ने 'रेड-सिग्नल' दिखा दिया...मस्तिष्क ने भी आपातकाल की घोषणा कर दी! आनन-फानन में देशी नुश्खे आजमाए गए....! अब बात देशी नुस्खों से इलाज की हो तो, यहाँ भी गांव वालों का अतिथि प्रेम दिख ही जाता है! गांव में जिसको खबर मिली, फलां के घर रिश्तेदार आये है, और उनकी तबियत खराब हो गयी है,....... काम को मारो गोली..... काम-धाम होते रहेंगे .... बेचारा परदेशी ठीक हो जाये !
मोहल्ले के लोग जुट गए! जितने लोग उतने नुश्खे, पुरुष जड़ी-बूटियों पर लगे हुए थे, तो कई महिलाएं...सारे देवताओं का आह्वाहन कर रही थी, कई महिलाएं तो बकायदा देवताओं को लालच भी दे रही थी, "हे भगवन अगर बाबू जी, ठीक हो गए तो ५१ रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँगी " आदि,आदि! एक प्रकार का भ्रस्टाचार हो रहा था! लेकिन अजीब बात थी की किसी का नुश्खा काम नहीं कर रहा था, ! सारे लोग परेशां, अब क्या किया जाय....
काफी हो-हल्ला मचने के बाद, मेरे पिताजी ने आक्रामक निर्णय लिया! "अब कोई देशी इलाज नहीं होगा, कौनों देवता-देवी के जरुरत नाही है.." आख़िरकार यह तय हुआ की 'अतिथि देवता' को नजदिकी शहर के किसी डॉक्टर से दिखाया जाय,अर्थात अब जिमेदारी मेरे कंधे पर थी!
मैं अपने निजी वहां से उन्हें लेकर शहर के एक बड़े डॉक्टर के यहाँ गया, ! बड़े और प्रसिद्ध डॉक्टर होने के कारण भीड़ भी अच्छी-खासी थी! सभी लोग प्रवेश पंजी पर अपना-अपना नाम व् पता दर्ज करा, अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे ! कुछ ऐसे भी रोगी थे, जिनकी स्थिति काफी चिंताजनक थी, बावजूद इसके वे पूरी तन्मयता से अपनी बारी (क्रम) की प्रतीक्षा कर रहे थे! हमने भी अपना नाम पंजी में अंकित करवाया, और एक कोने में बैठकर अंदर से बुलावे का इंतजार करने लगे! वैसे भी अस्पताल का माहौल गमगीन सा होता है, सबके चेहरे उदासी में लटके होते है, ऊपर से गर्मी की मार ऐसी थी की, समझ नहीं आ रहा था की कौन रोगी है? और कौन रोगी का साथी? सभी बेहाल-बेसुध थे!
अचानक बाहर एक 'ऑटो' के रुकने की आवाज आती है, कुछ ही देर में एक सज्जन से दिखने वाले श्रीमान अपने रोगी संग पधारते है, ! पहली नजर में ऐसा लगा की वे इलाज कराने नहीं किसी बिछड़े को ढूढ़ने आये है ! दो मिनट इधर-उधर देखने के बाद अचानक ही उनके चेहरे पर एक चमक सी आ जाती है! थोड़ी दायें-बाएं होते हुए वे डॉक्टर साहब के दरवाजे पर खड़े 'द्धार-रक्षक' के पास पहुँचते है, उनके बीच एक छोटी सी गुफ्तगू होती है और सबकी नजर बचाकर, वे एक सौ का नोट उसके हाथ में थमा देते है,! उधर 'द्धार रक्षक' भी कोई हरिश्चंद्र के खानदान से तो था नहीं, हल्की मुस्कान के साथ उसने भी तोहफे को कबूल किया ! कुछ ही देर में श्रीमान को उनके रोगी सहित डॉक्टर साहब के केबिन में प्रवेश करा दिया गया....कुछ लोगों ने आपत्ति कि तो, डॉक्टर साहब का खास बताकर चुप करा दिया गया !

पांच मिनट पश्चात श्रीमान अपने रोगी सहित बाहर आते हैं, और सबकी तरफ एक कुटिल मुस्कान के साथ देखते है! उस समय उनके चेहरे का भाव देखकर ऐसा लग रहा था की श्रीमान ने बिना दौड़ प्रतियोगिता में शामिल हुए, दौड़ स्पर्धा का 'स्वर्ण-पदक' जीत लिया हो ! माहौल ऐसा था की गलत कर के भी वे 'खुशहाल' थे...सही हो के भी हम शर्मिंदा थे! खैर हमने अपनी बारी के अनुसार अपने मित्र का इलाज करवाया, डॉक्टर साहब ने कई दवाये दी! हम घर को आ गए ...साहब दवाओं के सेवन से ठीक भी हो गए ! दो दिन रहने के बाद वे चले गए....हमने उन्हें अगली छूटी में आने के वादे साथ...विदा किया !
                                                     ------ के.कुमार "अभिषेक" (११/०५/२०१४)

Friday, 9 May 2014

इंसान ही भगवान है!

त्मेव माता च, पिता त्मेव !
त्मेव बंधू च, सखा त्मेव !!

(हे ईश्वर, आप ही मेरे माता हो, और आप ही मेरे पिता हो!
आप ही मेरे भाई हो और आप ही मेरे मित्र भी हो)
जैसा की इस श्लोक में कहा गया है कि, हे ईश्वर आप ही मेरे माता हो ! यहाँ समझने कि आवश्यकता हैं कि "अगर ईश्वर ही मेरी माता है", तो इसका तात्पर्य यह भी बनता है कि "मेरी माता ही ईश्वर है" ! ठीक इसी प्रकार "अगर ईश्वर ही मेरे पिता है", तो इसका तात्पर्य यह है कि "मेरे पिता ही ईश्वर हैं",! "अगर ईश्वर मेरे भाई है", अर्थात "मेरा भाई ही ईश्वर है" ! "यदि ईश्वर मेरे मित्र भी है" तो इसका मतलब यह है कि "मेरा मित्र ही ईश्वर है"!
वास्तव में अगर हम धर्म कि जटिलताओं, काल्पनिक एवं अव्यवहारिक तथ्यों से अलग हटकर धार्मिक सिद्धांतों पर आत्म-मंथन करें तो निश्चय ही हम इस सत्य को प्राप्त करेंगे कि..."एक इन्शान के रूप में हमारे माता-पिता,दोस्त-मित्र, भाई-बंधू, और गुरुजन ही भगवान है, और इन सभी भगवानों का निवास स्थान ही मंदिर है, पूजा स्थल है " !
वास्तव में इस तथ्य को लगभग सभी धर्मों में स्वीकार किया गया है लेकिन हम चिंतन-शून्यता के कारन सत्य से दूर, मंदिर मस्जिद, गिरजाघरों, में ईश्वर को धुंध रहे है ! यीशु का यह कथन कि "हम सब प्रभु कि संतान है" स्पष्ट करता है कि हर इन्शान के अंदर ईश्वर के तत्व है, हम सब उसके वंशज है ! कुरान भी कहता है कि "हम खुदा के बन्दे हैं " अर्थात हम उसके आदमी है !
                                                  -- के.कुमार "अभिषेक" (१०/०५/२०१४)

जातिवाद विरोधी, नरेंद्र मोदी

सुप्रभात मित्रों, मेरा हमेशा से यह मानना रहा है की, जातिगत राजनीती भारतीय लोकतंत्र के नाम पर एक सबसे दुर्भाग्यशाली कलंक है! आज हमारे देश के राजनेताओं का जातिवादी रूप, व्यवहारिक शर्महीनता की परकाष्ठा को दर्शाता है! शर्म आनी चाहिए उन नेताओं को जो अपने स्वार्थ में वशीभूत होकर,सत्ता की लालच में लगातार भारतीय समाज के सौहार्द को दूषित करने का प्रयाश कर रहे है, जो लगातार अपनी गन्दी राजनीतिक कार्यशैली से अखंडित भारतीय समाज को जड़ों को खोखला करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहते है ! ऐसे हालत में नरेंद्र मोदी एक ऐसा सख्स जो बिना जातिगत परिचयों के राजनीति में यह मुकाम हासिल करने की तरफ अग्रसर है, जो बहुतों के लिए सिर्फ एक कल्पना है!
वास्तव में यह बेहद सुखद है की, नरेंद्र मोदी जो अपने आप में भारतीय राजनीति का एक धुर्व बन गए है, जिनके नाम से ही पक्ष और विपक्ष की राजनीति हो रही है, आज हर भारतीय मतदाता या तो "मोदी समर्थक" है, या "मोदी विरोधी"...लेकिन उन्होंने कभी भी जातिगत पहचान को राजनीतिक रूप देने की कोशिस नहीं की ! ये सही है की उनके ऊपर धर्म के नाम राजनीति करने के आरोप लगे है, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद की सोहबत में अपनी राजनीति को सम्पदायिक रंग देने के आरोप लगे है, और जिस तरह की धार्मिक कट्टरता इन संगठनों की रही है, आरोपों की गंभीरता को नज़रंअदाज नहीं किया जा सकता है, बावजूद इसके धार्मिक ढांचे में रहते हुए जातिगत परिचयों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उदेश्यों के लिए ना करना, उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग खड़ा करता है! एक भारतीय मतदाता के रूप में अगर हम नरेंद्र मोदी के नकारात्मक पहलुओं की आलोचना कर सकते है तो, उनके सकारात्मक पहलुओं के लिए प्रसंशा भी बनता है!
अहम बात तो यह की देश को जातिगत पहचानों के आधार पर बाँट कर सत्ता सुख भोगने की जुगत में लगे कई राजनेताओं को बेहद नागवार गुजर रहा है! यही कारण है की पिछले दिनों नरेंद्र मोदी की जाती को मुद्दा बनाया जाने लगा, .. दलितों की स्वकथित मशीहा सुश्री मायावती जी ने तो..":नरेंद्र मोदी को अपनी जाति नहीं बताये जाने को लेकर जमकर कोशा, और उनसे उनकी जाती जाहिर करने की मांग की" ! वास्तव में यह इस देश का दुर्भाग्य है की हमारी राजनीतिक प्रतिबद्धता ..जातिगत परिचयों के आधार पर तय होती है, ऐसे में एक व्यक्ति जो अपनी कार्यशैली और अपने व्यवहारिक व्यक्तित्वा को पहचान बना अपनी राजनीति को संचालित करने का प्रयाश कर रहे है, देश के शर्मविहीन और कर्महीन जातिवादी राजनेता.....उसकी पहचान को लेकर सवाल पूछ रहे है! ऐसे राजनेताओं को अगर अपनी राजनीतिक विरासत को भविष्य में भी सुरक्षित रखना है, तो समाज के बदलते माहौल को समझाना होगा, ...देश की राजनीति को अपनी महत्वकांक्षाओं की आड़ में जातिगत और सांप्रदायिक रंग देने से बचना होगा, ....! इस देश के निवासी होने के नाते भारतीयता हमारी पहचान है, और इसी पहचान को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता का आधार बनाना होगा, अन्यथा वह दिन ज्यादा दूर नहीं नहीं.....जब ऐसी पार्टियां और ऐसे राजनेताओं राजनीतिक और सामाजिक गलियारे में अपना अस्तित्वा ढूढ़ने को मजबूर हो जायेंगे! इसकी एक बड़ी झलक बिहार की स्थानीय राजनीति में देखने को मिल भी रही है, जब लोग जातिगत परिचयों को दरकिनार कर राज्य के विकास के मतदान कर रहे है, और जाति के नाम पर भावनात्मक राजनीति करने वालों को जमीं पर ला पटका है! समझने की बात तो यह है की यह वही बिहार है जो आज़ादी के बाद से देश के राजनेताओं के लिए जातिगत राजनीति KA प्रयोगशाला रहा है!
अभी भी समय है, जाति धर्म के नाम पर राजनीति को छोड़ कर भारतीयता की राजनीति हो, सामाजिक, सांस्कृतिक विकाश की राजनीति हो! समावेशी विकास की बात हो....तभी जा कर लोग अपनी राजनीतिक को समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप बना पाएंगे! ---के.कुमार (०९/०५/२०१४)

कांग्रेस कि दुर्दशा, समय कि मांग

कांग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री उमीदवार और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ,मतदान के दिन अपने चुनाव क्षेत्र अमेठी के बूथों का हाल
देखने गए थे, एक बूथ का भ्रमण कर वे निकल ही रहे थे की, एक स्थानीय निवाशी और कांग्रेस समर्थक उनसे लगातार चिपकने का प्रयाश करने लगा! वह व्यक्ति बार-बार राहुल गांधी से पूछ रहा था, --"राहुल जी आप ने अमेठी की सड़कों का हाल देखा" ! राहुल जी मिडिया के कैमरों की मौजूदगी में उस व्यक्ति को लगातार नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहे थे....लेकिन वह व्यक्ति था की बार-बार अपने सवाल के साथ उनका पीछा कर रहा था! तभी अचानक राहुल जी का धैर्य जवाब दे गया...उन्हें लगा की कुछ ना कुछ जवाब देना ही पड़ेगा तभी यह पीछा छोड़ेगा! लेकिन समस्या यह थी की जवाब क्या दें,....अमेठी की जर्जर और बदहाल सड़कों पर चलते हुए, अमेठी की सड़कों के बारे में डिंग हाँकना मुनासिब नहीं था और कैमरों के सामने बगलवालों से 'जवाब' क्रय भी नहीं कर सकते थे (राहुल और सोनिया जी अपने भाषणों के लिए लेखकों को बड़े वेतन पर रखते है, स्पष्ट है की वे कुछ पैसों के बदले भाषण क्रय करते है).....अचानक माहौल बदलता है राहुल जी का शरीर १२० डिग्री पर घूमता है, बेहद चिंतन के पश्चात उनके मुखारबिंद उस व्यक्ति से मुखातिब होता है " ऐसा है भैया की आप बीजेपी के लिए काम करो" ! वे जवाब उस व्यक्ति के लिए नहीं था, अमेठी की उन सडकों के लिए था को....वे भी अपनी बदहाली को किस्मत स्वीकारें ....अन्यथा गांधी के गढ़ में उनकी खैर नहीं!

काश की श्री गांधी को कोई समझाता की...उस व्यक्ति ने कांग्रेस से आज़ादी नहीं मांगी थी, इस देश का कोई नागरिक किसी राजनीतिक दल का गुलाम नहीं होता है, वह अपनी राजनीतिक सोच के लिए स्वतंत्र है, उसे किसी से आदेश या निर्देश की आवश्यकता नहीं है ! दूसरी और शायद सबसे अहम बात की, राहुल जी यह सन्देश देने का प्रयाश कर रहे है की, अगर कांग्रेस का समर्थक बनना है तो "मनमोहन सिंह" बनना पड़ेगा....कांग्रेस में रहना है तो चुप रहना होगा ! विकास पर सवाल पूछने वाले कोंग्रेसी नहीं हो सकते, सड़कों की बदहाली पर बात करने वाले......राहुल समर्थक नहीं हो सकते है! ...इस पुरे प्रकरण को देखते हुए मुझे लगता है की इस चुनाव में जो दुर्गति कांग्रेस की होने वाली है, यह समय की मांग है,! 

                                                   ------ K.Kumar (09/05/2014)

राजनीति का साहित्यकरण या, साहित्य का राजनीतिकरण

प्रिय मित्रों, लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे अपने अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ रहा है, कई राजनेताओं का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो रहा है, लेकिन सर्वाधिक दुखद है की इन नेताओं के साथ साथ कई समाजसेवियों,सामाजिक चिंतकों, और साहित्य के पुजारियों का भी नया चेहरा सामने आ रहा है! राजनितिक मजबूरियों और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं के बीच साहित्य अपनी पहचान खोता जा रहा है और जो हालत बन रहे हैं उसमे यह समझाना मुश्किल हो रहा है की राजनीती का साहित्यकरण हो रहा है, या, साहित्य का राजनीतिकरण !
मित्रों कल देश के एक बड़े समाजसेवी, प्रतिष्ठित सामाजिक चिंतक और कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्टीय पुरुष्कारों से अलंकृत, मेरे जैसे लाखों युवाओं के आदर्श व्यक्ति का एक राजनितिक पोस्ट देख कर मेरा मन-मष्तिष्क कुछ उन-सुलझे सवालों में उलझा हुआ है की क्या राज्य-सभा का टिकट इतनी बड़ी मज़बूरी हो सकती है की इन्शान मेहनत से कमाई दुर्लभ प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगा दे! आखिर ऐसी कौन सा स्वार्थ है की अब तक निः-स्वार्थ सेवा करने वाले लोग भी, राजनितिक दलों की चाटुकारिता में लग गए है? ऐसा क्या है की व्यवहारिकता और नैतिकता से परिपूर्ण व्यक्तिगत गरिमा के साथ साहित्य को नयी उचाई देने वाले लोग,राजनितिक दलों की अंधभक्ति में किसी अति सामान्य समर्थक की तरह तथ्यहीन प्रोपोगेंडा खड़ा करने को विवश हो गए है? ऐसी तस्वीरें और सन्देश पोस्ट किये जा रहे है, जो अब तक विचारहीन युवाओं के प्रोफाइल पर ही देखे जाते रहें है?
दुर्भाग्य तो यह की, श्री मन को मैंने उनकी मर्यादा और सामाजिक प्रतिष्ठा की याद दिलाते हुए, इन चीजों से बचने की बिन मांगी सलाह दी,....लेकिन शाम तक उनका जवाब भी आया....जिसमे चाहते हुए भी वे अपनी राजनितिक मजबूरियों को और महत्वाकांक्षाओं को नहीं छिपा सके !

                                           -------K.Kumar 'abhishek' (09/05/2014)

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...