Wednesday, 16 April 2014

"कोंग्रेस मुक्त भारत" : अनुमानों के आईने में

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार श्री नरेंद्र मोदी जी ने इस बार के चुनाव प्रचार में अपनी बहुचर्चित उग्र राजनैतिक कार्यशैली के तहत कई नारे दिए है,...वैसे भी उनके चुनावी भाषणों में विरोधयों के खिलाफ जनता को उत्तेजित करने वाले नारों, फब्तियों, जुमलों, के अलावा विशेष कुछ नहीं होता..! नरेंद्र मोदी जी, लिखित जुमलों और नारों को पढ़ कर आसमान में चलें जाते है, फिर भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन जुमलों का मतलब समझाते हैं ! सही को गलत और गलत को सही साबित करने कि कोशिस होती है! नारों कि हम बात करें तो इस चुनाव में पहला 'नारा' जो मोदी जी का काफी प्रचलित हुआ, वह था..."कोंग्रेस मुक्त भारत" !!!!!

वास्तव में यह नारा इस चुनाव में भाजपा (मोदी जी ) कि रणनीति का प्रतिक बन के उभरा है~! लेकिन इस रणनीतिक 'नारे' की लोकतान्त्रिक विवेचना अभी तक अधूरी है....इस नारे का आशय क्या है? इससे क्या सन्देश देने कि कोशिस हो रही है? सबसे बड़ा सवाल कि, लोकतान्त्रिक नजरिये से क्या यह 'नारा' उचित है ? क्या ऐसे नारों के लिए हमारी स्वस्थ राजनैतिक परम्परा में जगह है?
सर्वप्रथम हम बात करें इस 'नारे' के उदेश्य कि तो., जब माननीय नरेंद्र मोदी जी 'कोंग्रेस मुक्त भारत' कि बात करते है तो प्रश्न उठता है, क्या राहुल गांधी, सोनिया गांधी और उनके जैसे कुछ बड़े नेता ही कोंग्रेस है? नहीं, बिलकुल नहीं.....इस देश कि करोडो-करोडो जनता भी कोंग्रेस है.....वे मतदाता भी कोंग्रेस है जो चुनाव में कोंग्रेसी नेताओं को वोट देते हैं....वे लोग भी कोंग्रेसी है जो कोंग्रेस कि नीतियों के समर्थक है.......क्या उन करोड़ों लोगों से इस देश को मुक्त कराने कि बात कर रहे हैं मोदी जी? क्या मोदी जी कोंग्रेस नेताओं और उनके करोड़ों समर्थकों को इस देश से भागने कि रणनीति के साथ अगली सरकार बनाएंगे ?
ऐसी दमनकारी नीतियों के साथ इस देश में सरकार नहीं चलाई जा सकती है,.....जिन्हे हिटलर कि कार्यशैली पसंद हो,, उन्हें भी समझना होगा कि समय बदल गया है......
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में 'पक्ष (सरकार) के बराबर महत्व 'विपक्ष' का है ....विपक्ष के बिना लोकतंत्र कि कल्पना भी नहीं कि जा सकती है, 'विपक्ष' ही वह संवैधानिक संस्था है लोकतंत्र में जो सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाये रखता है...सरकार के ऊपर संसद और संसद के बहार अनुशासनिक दबाव बनता है ! मेरा व्यक्तिगत मानना है कि किसी भी सरकार कि नाकामी, ..उस विपक्ष कि भी नाकामी है, जो सरकार को गलत करने से रोक नहीं सका ! सवाल तो यह भी उठते है कि जो राजनितिक दल या. संगठन विपक्ष कि भूमिका में सफल नहीं हो सका....उसे पक्ष (सरकार) कि जिमेदारी क्यों दी जाये ??? ..... मोदी जी जिस तरह से अपने विपक्षी पार्टियों को (समर्थकों सहित) उखाड़ फेकने कि बात कर रहे है, यह इस देश के हर उस नागरिक के लिए सोचने का विषय है जो इस लोकतंत्र का हिस्सा है

भारतीय संस्कृति सिर्फ धर्म का प्रतिरूप नहीं

भारतीय संस्कृति सिर्फ धर्म का प्रतिरूप नहीं है, सम्पूर्ण विश्व में कोई ऐसी मानवीय संकृति नहीं है, जो शत-प्रतिशत सही और शुद्ध हो! हमारी भारतीय संस्कृति में कई खामियां अवश्य है, लेकिन यह पाश्चात्य सस्कृति से बेहतर और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण है....हमें अगर अपनी संस्कृति को वास्तव में बचाना चाहते हैं तो, हमें इसकी खामियों को लेकर मंथन करना ही होगा ! कहीं आने वाले भविष्य में अंधविश्वास,जातिवाद ,दहेज़ प्रथा, बाल विवाह, धार्मिक भार्स्ताचार जैसी कुछ गिनती कि खामियों कि वजह से हमारी सस्कृति हमारे ही समाज में हासिये पर न चली जाये , ...हमारे ही बच्चे इन खामियों कि वजह से भारतीय संकृति का मजाक न उड़ायें ....इसके लिए हमें इन खामियों और नकारात्मक वैचारिक मान्यताओं को भारतीय संस्कृति से अलग करना ही होगा...!

समय के साथ किसी भी व्यवस्था में परिवर्तन ना हो, तो वह व्यवस्था समाज के लिए प्रगतिशील नहीं रहती.....और आने वाली पीढ़ी पर बोझ बन जाती है...१९५० में संविधान बनने के बाद हमारे देश का 'महान संविधान' भी कई मुद्दों पर परिवर्तित हो चूका है! अगर व्यस्था प्रगतिशील ना हो, तो इन्शान इस धरती पर किसी वृक्ष कि भांति स्थिर हो जायेगा ! मुझे उमीद है कि आपके पास एक स्वस्थ मस्तिष्क है, और मेरी बातों पर आप तीनों आँखें खोलकर चिंतन करेंगे ....और हम सब मिलकर अपनी सस्कृति कि खामियों को निकाल कर एक विशुद्ध भारतीय संस्कृति अपनी भावी पीढ़ी को देंगे ...जिसमे वास्तविकता, व्यवहारिकता, सामाजिकता, नैतिकता के साथ मानवीय मूल्यों का बेहतर समायोजन होगा!

परिवर्तन : दमदार बातें, हिम्मत नहीं

जब हम भारतीय परिवर्तन कि बात करते हैं जब हम राजनितिक बदलाओं कि बात करते हैं....तब हमें 'परिवर्तन' शब्द कि पारिस्थितिक विवेचना अवश्य करनी चाहिए !, संसार में किसी भी क्षेत्र में जब-जब परिवर्तन होता है, बदलाव कि सुगबुगाहट होती.तब-तब अशांति और अशिथिरता का माहौल पैदा होता है ! जब भी पुरानी जर्जर घरों कि जगह आधुनिक शैली कि इमारते बनाने कि बात होती है..पुराने घरों को तोडना पड़ता है....और तोड़ते हुए खट-पट कि आवाजे भी निकलती है...अशांति भी कुछ देर के लिए फैलती है ! यह हमें तय करना होगा कि हम पुराने घरों (पुरानी व्यवस्था) में रहना चाहते हैं या, नए घरों (नई व्यवस्था ) में रहना चाहते हैं.,,, अगर नए घर चाहिए तो हमें कुछ समय कि अशांति के लिए तैयार रहना चाहिए.......कुछ नीवें हिलेंगी (पुराने राजनितिक दल) , कुछ दिवारे (जाति-धर्म) भी टूटेंगी , कुछ नियम भी टूटेंगे-कुछ कानून भी टूटेंगे ......कुछ आवाजें भी सुनाई देंगी ! अगर हम राजनितिक परिवर्तन कि बड़ी-बड़ी बात करते हैं तो हमें 'परिवर्तन' कि घटना के लिए भी तैयार रहना होगा ....!

मुझे समझ नहीं आता कि अगर हमें परिवर्तन कि घटनाएं इतनी ही बुरी लगती है तो, फिर ''परिवर्त्तन'' कि बात क्यों करते है ? ....यह एक राजनितिक परिवर्तन ही है कि कोई राजनेता सिर्फ एक 'सांसद' बनने के लिए मुख्यमंत्री कि कुर्सी छोड़ देता है, जबकि वर्त्तमान हालात को ही लें तो, एक बड़े राजनेता अपने आप को प्रधानमंत्री मान चुके हैं फिर भी मुख्यमंत्री कि कुर्सी नहीं छोड़ रहे ! मान लें कि, सांसद बनने के लालच में केजरीवाल ने दिल्ली कि गद्दी छोड़ दिया (यह बात हजम तो नहीं हो रहा है ) , क्या यह एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं है कि ऐसे समय में जब हर बड़ा नेता अपने लिए सुरक्षित जगह खोज रहा है, कोई हार के डर से दो-दो जगह से चुनाव लड़ रहा है...केजरीवाल उसी जगह से चुनाव लड़ रहे हैं जहाँ से उनकी हार का सबसे बड़ा खतरा हैं ! केजरीवाल पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं, अगर उन्हें सांसद ही बनना होता तो...उनके लिए दिल्ली कि किसी भी सीट से चुनाव लड़ना जीत पक्का कर सकता था ! ........मैं ये नहीं मानता कि केजरीवाल कोई जादूगर या, ईश्वर है ....उनसे कई गलतियां हुई हैं, और आगे भी होंगी.....परफेक्ट दुनिया में कोई नहीं है (मैं खुद भी नहीं हूँ ) .......मैंने स्वयं जब-जब गलतियां हुई है जम के आलोचना कि है, लेकिन जब हम गलतियों पर आलोचना करते हैं तो 'सही' कार्यों कि प्रसंशा भी करनी चाहिए .......! मेरा मानना है कि, हम सब को राजनीतिक परिवर्तन कि दिशा में ही सोचना चाहिए...और जब भी लगे कि केजरीवाल और उनकी टीम गलत कर रही है ...हमें उनकी सकारात्मक आलोचना करनी चाहिए ...जिससे वे भविष्य में गलतियों को दुहराने से बच सकें .......कोई भी राजनीतिक पार्टी 'सार्वजानिक संस्था' होती है .....यह केजरीवाल कि पारिवारिक संस्था नहीं है....गलत होने पर उन्हें हटा कर सही व्यक्ति को नेतृत्व देने का विकल्प भी मौजूद है! व्यक्तिगत तौर पर मेरी राजनीतिक राय है कि 'परिवर्तन' सिर्फ ....केजरीवाल और उनकी टीम ही ला सकती है .....लोग आयेंगे पुरानी घरों पर अपने पहचान कि रंग पुत जायेंगे, इसे मैं परिवर्तन नहीं मानता ....कोई भगवा पुत जायेगा...कोई हरा पुत जायेगा ! .....हमें 'रंग' नहीं 'ढंग' परिवर्तन कि सोच के साथ भविष्य के बारे में सोचना होगा ! ----K.KUMAR 'ABHISHEK'

नरेंद्र मोदी और यशोदा बेन : कहाँ आ गए?

किसी भी व्यक्ति के निजी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए , यह एक अनैतिक कार्य होगा ! वैसे यह गलत तब भी था जब श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक कोंग्रेसी नेता की प्रेमिका को ५० करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा था, और यह गलत आज भी है जब उन्ही नरेंद्र मोदी की वैवाहिक जीवन पर प्रश्न खड़े किये जा रहे है ! हालाँकि सामाजिक/राजनैतिक जीवन के उच्च शिखर पर खड़े व्यक्ति को समझाना चाहिए की, उसके ऊपर करोडो निगाहें है, ऐसे में उनके कपड़ों में छोटी सी छेद भी लोगों की नजर में होगी !
उन्होंने जिस तरह से अपने आपको अकेला प्रचारित किया..रैलियों में बोले की "उनके आगे-पीछे कोई नहीं है" ..यहाँ तक की पूर्व के चुनावों में, अपने हलफनामे में वे पत्नी की जगह खाली छोड़ते आये है....आज अचानक हलफनामे में पत्नी का नाम जुड़ना,, प्रश्न खड़ा तो होता ही है ! वैसे नरेंद्र मोदी जी की निजी जिंदगी में निःसंदेह 'परिवार' नाम का कोई अंश नहीं रहा है, लेकिन अचानक इस तरह 'यशोदा बेन' को पत्नी का दर्ज देना अचंभित करता हैं?
इस घटना को लोग कई तरह से परिभासित कर रहे है, कुछ लोग इसे एक मौका के तौर पर भुनाने में लगे है ..लेकिन हकीकत यह है की मोदी जी को आज भी 'यशोदा बेन' से कोई वास्ता नहीं हैं, मुझे ऐसा नहीं लगता की आज अचानक मोदी जी के अंदर परिवार के प्रति चाहत जग उठी है ....जग तो सुप्रीम कोर्ट जाता है कभी-कभी ! वास्तव में यह माननीय सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और चुनाव आयोग का आदेश था की हलफनामे का कोई भी पारा खाली नहीं छूटना चाहिए ! बेचारे मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के काफी नजदीक पा रहे हैं, ...हलफनामे को अधूरा छोड़ कर अपनी उम्मीदवारी रद्द कैसे करवाते? हालाँकि मैंने पूरा हलफनामा देखा है, और उसमे उन्होंने 'यशोदा बेन' का कोई भी अन्य ब्यौरा नहीं दिया है...इससे भी उनकी दूरियां स्पष्ट हो जाती है! चुनाव आयोग को इस पर देखना चाहिए की, उस हलफनामे में 'अननोन' शब्द क्यों प्रयोग हुआ है ? अब अगर पत्नी है, तो यह कैसे संभव है की पति को पत्नी की सम्पति के बारे में जानकारी नहीं है? वैसे कुछ काम महिला आयोग का भी यहाँ बनता है, अब तक उस महिला के साथ जो भी अच्छा-बुरा हुआ, अब से वे नरेंद्र मोदी जी की पत्नी हैं और इस आधार पर उन्हें कुछ अधिकार तो मिलना ही चाहिए......माना की नरेंद्र मोदी जी की अपनी अलग विचारधारा रही है, लेकिन इसका खामियाजा वह महिला क्यों भुगते? उसे सामान्य मानवीय अधिकार तो मिलाने ही चाहिए ?
सबसे हास्यपद बात तो यह है की, मामले को तुल पकड़ते देखकर मोदी जी के भाइयों ने यह वक्तव्य दे दिया की "मोदी जी की शादी उस समय हुई थी, जब उनका परिवार भीषण गरीबी और रूढ़िवादी विचारधारा में लिप्त था, उनके शादी को नरेंद्र मोदी की वर्तमान पद और प्रतिष्ठा से जोड़ कर न देखा जाय, यशोदा बेन को हमारे परिवार की पुरानी स्थिति से जोड़ कर ही देखा जाय "

यह वक्तव्य अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है, क्या मोदी जी अपनी पत्नी से इसलिए दूर है क्योकि उनकी पत्नी की सामाजिक स्थिति, उनकी पद-प्रतिष्ठा से मेल नहीं खाती? मोदी जी आज विश्व चर्चित व्यक्ति है, क्या अपनी प्रतिष्ठा धूमिल होने की लज्जा के कारण दूर है अपनी पत्नी से ? इन सवालों का जवाब निश्चय ही "नहीं" होगा, ....परिवार को ऐसे वक्तव्य देने से बचना चाहिए था ! (अच्छी बात ये है की मिडिया अपनी है ...कुछ खास सवाल नहीं उठे ..)
हाँ, परिवार की तरफ से आये वक्तव्य से कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका राजनितिक प्रयोग होना चाहिए .....नरेंद्र मोदी जी और उनके परिवार को गरीबी में हुई शादी से परहेज है, लेकिन अपनी उसी गरीबी और कथित ''चायवाला'' का चुनावी लाभ उठाने से कोई परहेज नहीं, ऐसा क्यों? जिस गरीबी और रूढ़िवादिता का नाम लेकर यशोदा बेन से अपने आपको अलग किया जा रहा है, फिर क्यों उसी परिवार की गरीबी से रिश्ता जोड़ते है नरेंद्र मोदी जी ? इन सवालों का जवाब नरेंद्र मोदी जी को अपनी रैलियों में देना चाहिए ...जहाँ से उन्होंने अपने परिवार की गरीबी का लाभ उठाने के लिए प्रचारित करना शुरू किया था !

श्री नरेंद्र मोदी खुद टिका-टिप्पणी ,आरोप-प्रत्यारोप के मास्टर हैं, दूसरों के निजी जीवन से जुड़े मसलें उनकी चुनाव प्रचार में छाये रहें है,....जवाब देना ही चाहिए उन्हें क्योकि नैतिकता का तकाजा है की दूसरों पर सवाल खड़ा करने वाले आज खुद भी जवाब दें......

धर्म-निरपेक्षता का मतलब

क्या धर्म-निरपेक्षता का मतलब ''हिन्दू विरोध'' होता है ! क्या हमारा संविधान 'धर्म-निरपेक्षता' की यही परिभाषा बतलाता है ?
मेरा व्यक्तिगत मानना है की, ''धर्म-निरपेक्षता'' का मतलब मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सामाजिक चेतना के साथ, सभी धर्मों का बराबर सम्मान है!
मैं किसी धर्म में विश्वाश नहीं करता, मेरे लिए "मानव धर्म" ही सबसे बड़ा धर्म है, यह हमारा जन्मजात धर्म है, यह अपने आप में "धर्म निरपेक्षता" का विशुद्ध रूप है ! इस मुल्क के धार्मिक सदभाव को बिगड़ने का काम उन राजनितिक दलों ने किया है, जिन्होंने संविधान की परिभाषा की बलि देकर धर्म-निरपेक्षता की राजनितिक परिभाषा गढ़ी है ! गद्दी पाने की लालच में शर्महीनों ने कर्महीनता की हद ही कर दी, ...''धर्म-निरपेक्षता'' की ऐसी ऐसी परिभाषाएं रची गई, जिसने मानवता, सामाजिकता, व्यवहारिकता और नैतिकता को सिर्फ और सिर्फ खंडित करने का का काम किया है! अल्प-संख्यक और बहुसंखयक की राजनीती इस देश के लिए शर्मनाक है, लेकिन अब तो शर्म ने भी आना छोड़ दिया है, शर्म भी मानवता की संगिनी है....जिस व्यक्ति या समाज में मानवता ही कुचली जा चुकी है, शर्म कैसे आएगी!

महिला सशक्तिकरण का नारा

जब भी इतिहास को सामने रखकर पुरुषों पर "महिला उत्पीड़न'' का आरोप लगाया जाता है, तो हमें हालत को तत्कालीन परिस्थितियों के साथ समझने का प्रयास करना चाहिए .........मेरा व्यक्तिगत मानना है की प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं की इज्जत आज की तुलना में अधिक थी ! वास्तव में यह माता-पिता का अपनी पुत्री के प्रति प्रेम था (उनका तरीका था प्रेम का) की उन्हें पिता की पगड़ी और परिवार की इज्जत समझा जाता था, ...यह प्रेम का एक रूप ही था की, लोग अपनी बच्चियों को घरों से बाहर नहीं निकलने देते थे ...उन्हें डर था की उनकी फूल सी बच्ची पर किसी की नजर/नियत ना पड़ जाए .....पुत्री पर संभावित अत्याचार का डर, उस प्रेम को दर्शाता हैं...."समझने की जरुरत है की हम उन्ही वस्तुओं को ज्यादा छुपा कर रखते है, जिनसे हम प्रेम करते है, जिन्हे हम खोना नहीं चाहते हैं, जिन्हे क्षति नहीं पहुचना चाहते है " !

इन्ही हालातों को आज के सन्दर्भ में देखकर हम ..परिवारों पर बड़े-बड़े आरोप लगते है ! वास्तव में आज के सन्दर्भ में ये सारे आरोप सही है.....लेकिन इसे मैं प्राचीन भारतीय परिवारों की नीतिगत समस्या मानता हूँ, जबकि कुछ लोग 'परिवार की भावनाओं" पर प्रश्न खड़ा करते थे.....यह माता-पिता का अपनी पुत्री के प्रति प्रेम भावना थी, जिसने आगे बढ़ने ही नहीं दिया ! वह समय था जब लोग प्रतिष्ठा के लिए जान भी दे देते थे.....और महिलाएं परिवार की प्रतिष्ठा थी !

मनमोहन की नैतिकता

 (यह आलेख,मुख्य  हिंदी समाचारपत्र "दैनिक जागरण" के सम्पादकीय पृष्ठ (१६/०४/2014) पर भी प्रकाशित हो चूका है.... )
श्री मनमोहन सिंह के बारे में जो मेरी राय थी उसे मजबूत करने का काम किया है बारू और पारेख साहब की पुस्तक ने !

आज की भारतीय राजनीती में सफल राजनेता के अंदर कूटनीति, बेईमानी, झूठ, छल -कपट, जलन, अशिष्टता, असभयता,दुर्वयवहार, जैसे गुणों का होना आवश्यक है, अगर अपराधिक कार्यशैली भी हो तो, राजनीती में चार-चाँद लग जायेंगे! ये सभी मानवीय अवगुण, आज सफल राजनेता के गुण हो गए है! ये सारे गुण हमारे नेताओं में कूट कूट के भरे पड़े हैं, यही कारन है की हमारे लोकतंत्र को 'महान' कहा जाता है क्योकि सर्वाधिक गुणी राजनेता हमारे देश में ही हैं! शायद मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य है की उनके अंदर इनमे से कोई गुण मौजूद नहीं है ! मनमोहन सिंह जैसे शांत और स्थिर मस्तिष्क के मानवीय मूल्यों से भरपूर इन्शान के लिए आज की राजनीती में कोई जगह ही नहीं है, आज दूसरों के खिलाफ आरोप-प्रतयरोप लगाने वाले, अपशब्द बोलने वाले राजनेताओं को मजबूत नेता मन जाता है, गद्दी पाने के लिए हर कर्म,-कुकर्म करने वाले नेताओं को जनाधार वाला नेता माना जाता है ! स्पष्ट है की इन काबिल के सामने/साथ वे बेहद ही नाकाम और बेकार राजनेता और प्रधानमंत्री सिद्ध हुए ! मनमोहन सिंह को उनके दोस्तों ने साथ रहकर तो दुश्मनों ने सामने से लगातार हमला बोला , उनके खिलाफ लगात्र साजिस हुई, जिसकी कोई औकात नहीं थी उसने भी मनमोहन सिंह को बुरा भला कहा और मजाक उदय, लेकिन इस इन्शान ने कभी किसी के खिलाफ भूल से भी अपशब्द नहीं कहे....! बड़े बड़े संतों का यह देश एक ऐसे संत के रूप में मनमोहन सिंह को याद रखेगा जिसने नैतिकता की हर परीक्षा पास की , बार-बार उकसाने के बावजूद उसकी तपस्या भांग नहीं हुई !

अगर हम अपनी राजनितिक मजबूरियों को कुछ समय के लिए दरकिनार कर मनमोहन सिंह के बारे में सोचे तो, यहाँ किसी की दो-राय नहीं होगी की ...अगर कांग्रेस नेतृत्वा ने प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें राजनतिक रूप से गुलाम नहीं बनाया होता, तो वे भारत के अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते, ! भारत को उदारवादी अर्थव्यवस्था की तरफ मोड़ कर विकाश की नै दिशा देना वाला सख्स में इतनी क्षमता अवश्य थी जिससे आने वाले भविष्य में भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा कर सकते थे!

ये सही है की आज हर किसी ने इस शांत व्यक्ति को तिरस्कृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है, विशेषकर कांग्रेस के लोगों ने जो किया है वह बेहद गन्दी राजनीती को दर्शाता है! लेकिन ये मेरा वादा है की आने वाले समय में इस सख्स को पूरी दुनिया स्वस्थ राजनीती के अंतिम अध्याय के रूप में याद रखेगा, ...आज उनके ऊपर अपशब्द बोलने वाले लोग, उनके आदर्श व्यक्तित्व को याद करेंगे और शायद उनकी कमी पूरी राजनितिक जगत महसूस करेगा ! हम भी कभी तस्वीरों में देखकर बच्चों से कहेंगे की, हमारे देश में भी शांत और मृदुभाषी राजनेता प्रधानमंत्री होते थे, ...हमारे देश में मनमोहन सिंह जैसे लोग भी प्रधानमंत्री हुए है जिनके शब्दकोष में अपशब्दोंके लिए जगह ही नहीं बच्चा था, जिनके ऊपर चुनाव आयोग को नजर रखने की जरुरत नहीं पड़ी.!

व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है की मनमोहन सिंह को उस दौर में होना चाहिए था, जब गांधी हुआ करते थे...उस दौर ,में होना चाहिए था, जब भारत अपने कदमों पर चलने का प्रयाश कर रहा था! आज की राजनीती में होना उनका व्यक्तिगत दुर्भाग्य है, ..उन्हें शायद किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर होना चाहिए था, शायद उनके लिए ज्यादा प्रतिष्ठित जगह होती ! कुछ भी हो मेरा मानना है की मनमोहन सिंह एक बेहतरीन राजनीतिकं व्यक्तित्वं के साथ, भारतीय राजनीती का अंतिम स्वस्थ अध्याय समाप्त हो रहा है! 


                                    .--------के. कुमार 'अभिषेक' (१४/०४/२०१४)

Sunday, 6 April 2014

!साजिस-ए-घोषणा पत्र !

भारतीय जनता पार्टी का 'चुनावी घोषणा पत्र' ७ अप्रैल को आना सम्भावित है.....वास्तव में यह इस देश कि जनता के साथ एक बड़ा धोखा होगा, विषेशकर उन मतदाताओं के लिए जो पहले और दूसरे चरण में मतदान करेंगे! यह एक बड़ी साजिस है भारतीय जनता पार्टी !
समझने कि बात यह है कि, नियमानुसार मतदान के दौरान 'चुनावी घोषणा पत्र' नहीं लाया जा सकता है, ....७ अप्रैल को अगर घोषणा पत्र जारी हो भी जाता है तो, यह १२ अप्रैल से पहले
प्रचारित नहीं किया जा सकता है, .....प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को इस नियम कि जानकारी नहीं थी? ...अगर हम 'हाँ' मानते है, तो खुद को बेवकूफ बना रहे हैं....भारतीय जनता पार्टी के सभी नेताओं को इस बात कि जानकारी थी, अपितु इस नियम को भुनाने के प्रयास में यह साजिस रची गई है! हो न हो, कुछ तो है उस घोषणा पत्र में जिससे जनता को दूर रखने का प्रयास हो रहा है ! मोदी जी हमेशा से मुद्दों पर बात करने से कतराते हैं, ...दूसरों को गलत साबित करने में उनकी महारत है, लेकिन खुद को सही नहीं साबित कर पाते है ! बात पत्रकारों से बात करने कि हो, उनके प्रश्नो का जवाब देने कि हो, या गुजरात विकास पर उठ रहे प्रश्नों को काउंटर करने कि हो....मोदी जी गायब ही रहते है ! आसमान से आते है, आसमान में ही विलुप्त हो जाते है, मिडिया और आम जनता अपने सवालों के जवाब के लिए आसमान को देखती रह जाती है! यह "मोदीतंत्र" है या लोकतंत्र ? अभी तक देश में "भारत सरकार" (भारत कि जनता कि सरकार) अब "मोदी सरकार" होगी.....क्या यह तानाशाही प्रवृति कि झलक नहीं दिखता है ! ....मैंने पहले भी कहा है, ...और आज भी कहूंगा कि मोदी जी कि कार्यशैली ''भाजपा'' के विघटन का कारन बनेगी...और वह दिन भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दिन होगा ........! भारत कि मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए...मजबूत और सशक्त 'भाजपा' कि जरुरत हमेशा रहेगी? यह भाजपा अटल-आडवाणी के भाजपा कि परछाई भी नहीं है....यह स्वार्थ में अंधे कुछ मतवालों कि पार्टी नजर आ रही है, जिसे देश और समाज कि सेवा से कोई सरोकार नहीं है !

 
                                                  K.KUMAR 'ABHISHEK' /05-04-2104

MY POEM: MAI BHI KABHI.....

नमस्कार मित्रों, पिछली कई बार कि तरह एक बार पुनः, आप सबों के समक्ष एक ' नई रचना' रखने का दुःसाहस कर रहा हूँ ! शायद पहली बार मेरी रचना, मेरे परम्परागत विषयों से हटकर है,...उमीद है कि आप को पसंद आएगी........
सभी वरिष्ठ कवि गुरुओं, के आशीर्वाद से तैयार मेरी रचना '" हम भी कभी.... ...........

हम भी कभी, ..............
जश्ने महफिली कि आवाज हुआ करते थे,
गुल कि बगिया में गुले बहार हुआ करते थे !
नफर
त का कांटा न था हममे,
खिलते फूलों कि साज हुआ करते थे !!


न दर्द था, न दवा थी,
फिजाओं में मस्ती कि हवा थी !
पन्नो में सिमट जाती थी अपनी आशिकी,
नाम होते हुए भी,बदनाम हुआ करते थे !!

रूह भी थी, रूहानी,
दुनियावालों के लिए अपनी भी थी एक प्रेम कहानी !
महकता नशा था यौवन का,
'पर' बिन परिंदों कि तरह आज़ाद हुआ करते थे !!

दोस्त मिलते थे सपनों कि तरह,
दुश्मन भी मिलते अपनों कि तरह !
मरने का न डर था, ना जीने का इरादा,
धोनी के छक्कों पर बर्बाद हुआ करते थे !!

बचपन कि बातें,
शरारत भरी अनदेखी रातें !
पलक बिछाती चांदनी कुछ इस तरह,
ख्वाबों में ही सही, नवाब हुआ करते थे !!

मन के मंदिर में सचाई का डेरा,
माँ के आँचल में स्वर्ग का बसेरा !
पलकों के निचे सजते सपने इस तरह,
पिता के 'कलाम', दोस्तों के सलमान हुआ करते थे !!

हम भी कभी, ...........
जश्ने महफिली कि आवाज हुआ करते थे,
गुल कि बगिया में गुले बहार हुआ करते थे !
नफरत का कांटा न था हममे,
खिलते फूलों कि साज हुआ करते थे!!


-आपके आशीर्वाद का आकांक्षी --
के.कुमार अभिषेक (०१/०४/2014)

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...