Saturday, 29 March 2014

ढलता सूर्य (आडवाणी ) बनाम, उगता सूर्य (मोदी)

अपने देश के वर्त्तमान राजनितिक परिदृश्य में 'भारतीय जनता पार्टी' तेजी से मजबूत हो रही है, दिन-प्रतिदिन नए चेहरे पार्टी में आ रहे हैं, राजग का भी कुनबा तेजी से विस्तारित हो रहा है, लेकिन इन सब के बिच 'भारतीय जनता पार्टी' अपनी अंदरूनी राजनीती से कमजोर भी होती जा रही है, लगातार गृहयुद्ध जैसा माहौल बन गया है! पुराने राजनेता जिन्होंने लगातार पार्टी को एक शिशु कि तरह पालन-पोषण किया, उन्हें उसी तरह बाहर निकल फेंका जा रहा है, जैसे आज परिवार से वृद्धों को निकल फेंका जा रहा है! लाल कृष्ण आडवाणी, जैसे नेता अपने सम्मान के लिए जूझते नजर आ रहे हैं, ...आज भारतीय जनता पार्टी कि अंदरूनी स्वार्थी राजनीती का यह परिणाम है कि "आडवाणी कि प्रशंसा करना, उनकी बात करना भी, भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध बोलने जैसा है" कल शिव सेना ने अपने मुखपत्र में आडवाणी जी कि पैरवी क्या कर दी....मोदी समर्थकों को तितका लग गया !

इस हालत के लिए आडवाणी जी कि हठधर्मिता भी काफी हद तक जिमेदार है,.... आडवाणी जी कि छवि कट्टर हिंदूवादी कि रही है, हिन्दू धर्म और देवताओं में उनका विस्वाश रहा है, उन्हें इतनी समझ अवश्य होनी चाहिए कि 'हमारे देश में भगवानों को इसलिए पूजा जाता है, क्योकि भगवान् बोलते नहीं है!......जिस दिन भगवन बोलने लगे..हमारी खामियां, गलतियां, बताने लगे...हमें सिख देने लगे, उस दिन से इस देश में किसी भी भगवन कि पूजा नहीं होगी " अगर आडवाणी जी पार्टी में पूजित होना चाहते हैं, तो,उन्हें शांत और मूक मूर्ति बनना ही पड़ेगा ! वैसे आडवाणी जो को मेरे जैसे लोग सलाह दें, यह भी उचित नहीं है ! राजनितिक कार्यकुशलता से उन्होंने काफी बड़ा सम्मान कमाया है, और जिस तरह लोग पैसे कमाते है, फिर उसे खर्च भी करते हैं, उसी तरह आडवाणी जी को अपनी कमाई (प्रतिस्ठा) को व्यय करने का भी हक़ है! उन्हें पूरा अधिकार है कि मेहनत से अर्जित सम्मान को मिटटी में मिला दें....जितनी मर्जी उतना अपमानित हो ! सबकी अपनी जिंदगी है, समानित और अपमानित होने कि अभिलाषा है....                                                    के.कुमार.अभिषेक

प्रेम : रिश्तों का ऑक्सीज़न

प्रेम हर रिश्ते का भाव है, जिस मानवीय रिश्ते में प्रेम ना हो, वह रिश्ता किसी सूखे पेड़ के माफिक है, जो कभी भी गिर सकता है! यह बेहद दुर्भागयपूर्ण है कि हमारे समाज के स्व-कथित प्रेमियों ने 'भोग' को प्रेम के रूप में परिभासित करके,इसकी पवित्रता को नष्ट करने का काम किया है! हम माता-पिता से भी प्रेम करते है, भाई-बहनों से प्रेम करते है, अपने पालतू जानवरों से प्रेम करते है, शर्म आणि चाहिए उन्हें जो 'भोग' को प्रेम का नाम देते है!

अन्धविश्वास : खिलौना रूपी मूर्ति या, मूर्ति रूपी खिलौना


हमारे एक पारिवारिक मित्र ने एक गिफ्ट दिया, ....उनकी भावनाओं और अवसर को देखें तो, वह गिफ्ट एक खिलौना था, लेकिन उसकी संरचना और बनावट हिन्दू भगवान गणेश कि थी ! एक दिन उस खिलौने के साथ बच्चों को खेलते देखा तो, अचानक मस्तिष्क ने प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी ! काफी मंथन के पश्चात एक बात मुझे समझ में आयी कि, कपड़ो और रुई से बना गणेश भगवन अगर बच्चों का खिलौना है तो, धार्मिक स्थलों में रखे गए पत्थर से बने भगवन भी कहीं न कंही बड़ों के लिए खिलौना है! फर्क सिर्फ रुई और पत्थर का ही है, दोनों में ..! स्पस्ट है पत्थर बच्चों के लिए उचित खिलौना नहीं होगा, इसलिए उनके लिए रुई के भगवन (जैसे खिलौने) बनाये जाते है!

इससे अलग हटकर हम सोचें तो, सभी धर्मों के अध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि इन खिलौना रूपी मूर्तियों या, मूर्ति रूपी खिलौनों के पास जाने से इन्शान को शांति मिलती है! यही बात बच्चों के लिए भी कही जाती है...रोते बच्चे को खिलौना दे देने पर उसे शांति मिल जाती है, वह चुप हो जाता है !
खिलौनों के साथ खेलने के अंदाज कि बात करें तो, यहाँ भी कोई ज्यादा फर्क नहीं है ....बच्चों और बड़ों में ! ...मैंने बहुत सी महिलाओं को देखा है जो, अपने पास कई देवी-देवताओं कि मूर्तियां रखती है...धातु कि बनी मूर्तियों को वे बेहद प्रेम करती है....उसे प्रतिदिन स्नान कराती हैं, उसके कपडे बदलती है, उसके सामने बैठ कर नाचती हैं...गाती हैं उससे अपना दुःख-सुख साझा करती है .... .....एक बार तो मैंने बक्सर के गंगा घाट पर एक वृद्ध महिला को यह कहकर रोते देखा है कि " मेरे राधा कृष्ण को, मेरे दामोदर जो को किसी ने चुरा लिया" ............अगर मस्तिष्क को खोलकर सोंचे तो, यह दृश्य बहुत कुछ बच्चों के "गुडी-गुड़िया" खेल कि याद दिलाता है..... सबने देखा होगा...बच्चों-बच्चियां... गुड़िया (खिलौना) को नहलाते हैं, उसके कपडे बदलते है, ....उसके बाल झाड़ते है...उससे बातें करते हैं, .....उससे अपना दुःख-सुख भी साझा करते हैं ! स्पस्ट है कि सभी मूर्तियां एक प्रकार का खिलौना है, .....कुछ बड़ों के लिए है...और कुछ छोटों के लिए ! क्या बात है ....जरा देखिये उस खिलौनों ........और हाँ ये मेरा है...प्रणाम मत कीजियेगा .....कभी माँ-पिता में भी भगवन को धुंध के देखिये.......आँखों पर से भ्रम का पर्दा उठ जायेगा ! 


--k.kumar 'abhishek'
24/03/2014

!!!!! बक्सरनामा !!!!!

'बक्सर' लोकसभा क्षेत्र से उमीदवार तय करने में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेताओं के पसीने छूट गए ! सबसे पहले भोजपुरी सिनेस्टार और गायक मनोज तिवारी को लेकर बाज़ार गर्म रहा, ......यहाँ तक कि एक स्थानीय चैंनल ने इस खबर कि पुष्टि भी कर दी थी..,,खबर क्या निकली जिला बीजेपी में आग लग गया! टिकट कि उमीद लगाये एक नेता जी तो भूख-हड़ताल पर बैठ गए ! खबर ऊपर तक पहुची...बड़े नेताओं ने दिलाशा दिया....तब जाकर उनका अनशन समाप्त हुआ ! उधर बक्सर से ४ बार सांसद रहे पुराने भाजपाई लालमुनि चौबे भी ...आडवाणी जी कि राह पर थे....टिकट पाने कि जोर आजमाइश कर रहे थे ! वैसे पिछली बार वे लगभग मात्र २५०० वोटो से पांचवी बार संसद में नहीं पहुच सके थे...इस तरह उनकी दावेदारी किसी से कम नहीं थी .........लेकिन शायद मोदी जी ने सोच रखी है कि सभी पुराने नेताओं को बाहर निकल फेंकना है! ......कयासों का माहौल गर्म था.......कि अंदर ही अंदर हालत कब करवट ले गए...किसी को पता ही नहीं चला ! बिहार बीजेपी के बड़े नेता ..और पूर्व मंत्री अश्वनी कुमार चौबे .....पहले से ही सजी महफ़िल में हीरो बन गए ! .....यूँ तो, अश्वनी चौबे जी, बिहार के भागलपुर से टिकट कि पैरवी कर रहे थे....हालाँकि इसकी उमीद बेहद कम ही थी, क्योकि बीजेपी के रास्ट्रीय नेता सैयद शाहनवाज हुसैन कि सीट है, भागलपुर .........और हुआ भी यही ! अब अश्वनी जी आग-बबूला हो गए.....आग कि लपटे आसमान को छूती...इससे पहले ही बीजेपी हाइकमान ने उन्हें भागलपुर के अलावा किसी अन्य जगह से चुनाव लड़ने कि पेशकस कर दी.......अश्वनी जी ने भी सोचा ...भागलपुर नहीं तो, कोई और सही......बस क्या था ....बक्सर के लिए उन्होंने लॉबिंग शुरू कर दी .......चुनाव समिति ने भी इस बार उन्हें नाराज करने का खतरा नहीं उठाया ........उन्हें बक्सर से टिकट दे दिया गया था ! .......रही बात पहले से ही बक्सर से चुनाव लड़ने कि उमीद लगाये अन्य उमीदवारों कि तो......मनोज तिवारी को दिल्ली से 'आम आदमी पार्टी' कि आंधी में झोंक दिया गया है.......लालमुनि चौबे जी को पार्टी ने बता दिया कि ''जब हम आडवाणी को कुछ नहीं समझते तो, आप क्या चीज है" .....समाचार पत्रों में आया...चौबे जी अस्वस्थ है, इसलिए टिकट नहीं दिया गया ......लेकिन कहानी में एक नया मोड़ आया..जब अगले ही दिन पूर्व सांसद लालमुनि चौबे ने, मिडिया के सामने आकर बीजेपी कि धज्जिया उदा दी.....लगे हाथ उन्होंने जसवंत सिंह के मामले में जमकर भड़ास निकल दी.....यही नहीं रुके ...उन्होंने बीजेपी से त्यागपत्र देने और बक्सर लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने कि घोषणा भी कर दी ! ........आग लगी नहीं कि फायरब्रिगेड कि तरह कई बड़े नेता उन्हें मानाने में जुट गए ......रास्ट्रीय अध्यछ ने भी फोन किया .....घोसित उमीदवार अश्वनी जी भी ने गुरु कि संज्ञा देकर मामले को ठंढ करने कि कोशिस कि........चौबे जी भी बे-मौसम प्रेम कि गर्मी से पिघलते नजर आये .......लेकिन समस्या यह है कि शेर शिकार न करे, तो करे क्या ? ..........

तनतंत्र बनाम, लोकतंत्र

इस देश का लोकतंत्र १२५ करोड़ तनतंत्रों से मिलकर बनता है, इस देश का हर निवासी भारतीय लोकतंत्र का अंग है, सभी कि लोकतान्त्रिक जिमेदारियां है, ये अलग बात है कि, जब भी लोकतान्त्रिक जिमेदारियों कि बात आती है हमें सिर्फ राजनेताओं और राजनितिक दलों कि याद आती है! ऐसा क्यों है? क्या इस देश कि लोकतान्त्रिक व्यस्था में हम मतदाताओं कि कोई जिमेदारी नहीं है? या, क्या नेताओं और राजनितिक दलों को कोसने भर से हमारी जिमेदारियां पूर्ण हो जाती है?

यह स्थिति बेहद शर्मनाक, परन्तु सत्य है कि, जब देश के भ्रष्ट नेताओं और राजनितिक दलों को कोशने कि बारी आती है तो, इस देश का हर व्यस्क नागरिक इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझाता है, लेकिन जब लोकतंत्र में अपनी जिमेदारी निभाने कि बात आती है तो, हममे से अधिकतर मतदाता अपनी जिमेदारियों को भूल जाते है! नेताओं कि जिमेदारियों पर बात करने वाले हमारे भाई-बंधू, मतदान दिवस पर या, तो घरों में न्यूज़ चैंनल पर चुनाव का हाल देखते है, या किसी चाय/पान दुकान पर लोगों को राजनीतिक समीकरण समझते नजर आते है! किसी भी लोकतंत्र कि सफलता जन भागीदारी पर निर्भर करती है, और हमें समझाना होगा कि मतदान ना कर के हम लोकतंत्र कि गरिमा को ठेष पहुंचा रहे हैं, और ऐसा कर के हम किसी नेता या, राजनितिक दल को नहीं इस देश कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रहे है!

साथ ही हमें समझाना होगा कि, अगर हम चुनाव प्रक्रिया में मतदान नहीं करते है तो, इसका तात्पर्य है कि हमने अपना नेता नहीं चुना है , ऐसे में चुनें हुए नेताओं को गाली देने, कोसने और उनसे कुछ उमीद रखने को कोई अधिकार नहीं बनता ! हमें कोई हक़ नहीं कि हम नेताओं को उनकी जिमेदारियों पर भाषण सुनाएँ ! नेताओं को कोसने और उनसे अपने मतों का हिसाब मांगने का अधिकार सिर्फ उन लोगों को है जो, मतदान प्रक्रिया में भाग लेते है!

किसी भी चुनाव कि सफलता 'मतप्रतिशत' से लगाई जाती है, यह बेहद दुर्भागयपूर्ण है कि नेताओं को कोसने और उनकी खामियां निकालने कि बात हो तो,, इस देश के १००% मतदाता नजर आते है , लेकिन जब मौका योग्य नेता के चुनाव का हो तो मात्र ५०-६०% लोग ही नजर आते है! अर्थात लगभग आधे लोग अपनी जिमेदारी नहीं निभाते है! यह वास्तव में किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक स्थिति है ! इस मतप्रतिशत कि गहराई से विश्लेषण करें तो, कई तथ्य देश कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि एक घिनौनी तस्वीर पेश करते हैं! यहाँ हमें समझने कि आवश्यता है कि जो लोग आज चुनाव में सक्रिय रूप से मतदान कर रहे हैं उसमे से ८०-९० % लोग किसी न किसी राजनितिक दल या, उमीदवार के कट्टर समर्थक होते है, इन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका उमीदवार कैसा है? ये अपने उमीदवार को जिताना अपना कर्तव्य समझते है .......सीधे शब्दों में कहें तो, जो मतदाता तठस्थ होता है, जो सही व्यक्ति का चुनाव कर सकता है ....दुर्भागयवश वही मतदाता 'मतदान' नहीं करता है ! वास्तव में यह स्थिति देश के राजनितिक दलों को काफी रास भी आ रही है, क्योकि चुनाव क्षेत्र में समर्थकों कि संख्या से ही चुनाव परिणाम तय होने लगा है!


अब यह प्रश्न हम मतदाताओं के ऊपर है कि क्या हम इसी तरह देश के राजनितिक हालातों से रुष्ट होकर देश को और बर्बाद होने के लिए छोड़ देंगे या, अपनी जिमेदारियों का निर्वाह कर देश में एक स्वस्थ राजनीतिक व्यस्था कायम करने में अपनी जिमेदारी निभाएंगे? क्या हम अपनी मजबूत लोकतंत्रिक व्यवस्था को, खोखला करने कि छूट इन नेताओं को देंगे या, अपनी लोकतान्त्रिक जिमेदारियों को निभा कर योग्य नेता का चुनाव करेंगे, जिससे देश कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था मजबूत हो सके? इन सवालों का जवाब इस देश कि राजनीतिक दशा और दिशा बदल सकता है ......वोट किसी को करे, लेकिन वोट जरुर करें,....आपका नेता हारे या, जीते ......आपका लोकतंत्र जरुर जीतेगा !!!!!!
---के.कुमार 'अभिषेक' (२४/३/२०१४)

Saturday, 22 March 2014

EMERGENCE OF NRENDRA MODI as A DRAMETIC LEADER

'नरेंद्र मोदी' एक ऐसा नाम जिसके आस-पास भारतीय राजनीति सिमटता प्रतीत हो रहा है. एक ऐसा नाम जो अपने आप में भारतीय राजनीति का एक पक्ष बन चूका है, और देश में उसके नाम से पक्ष और विपक्ष कि राजनीति हो रही है! जिस तरह के हालत दिख रहे हैं मुझे ऐसा लगता है कि चुनाव बाद सिर्फ और सिर्फ एक ही दल सरकार बनाने कि स्थिति में होगा, 'भारतीय जनता पार्टी ' ! हालाँकि अकेले दम पर बीजेपी के २७२ सीटें लाना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा, लेकिन जिस तरह कोंग्रेस विरोध कि लहर चल रही है , (जिसे बीजेपी वाले मोदी कि लहर कहते हैं), मुझे लगता है कि बीजेपी संचालित राजग के लिए सरकार बनाना मुश्किल नहीं होगा, अब तो राजग गठबंधन भी बड़ा होते जा रहा है, विषेशकर दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए गठबंधन का महत्व काफी अधिक है!

आज एक ऐसे विषय पर मुझे मंथन करने का मन कर रहा है, जिस पर देश काफी आगे बढ़ चूका है, लेकिन जब भी हम नरेंद्र मोदी 'एक राष्ट्रिय नेता' कि बात करेंगे ये प्रश्न काफी अहम् हो जायेगें!, भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी रही है, जिसमे कभी भी बड़े नेताओं का अकाल नहीं रहा है, यह पार्टी कि ताकत रही है कि एक ही समय में बड़े बड़े कद्दावर नेता रहे हैं, इसके विरुद्ध अन्य राजनितिक दल किसी एक चेहरे या, परिवार कि परिक्रमा करते नजर आये हैं! इस वास्तविक तथ्य को आज के सन्दर्भ में देखें तो, २.5 वर्ष पहले तक भारतीय जनता पार्टी के अग्रणी नेताओं में नरेंद्र मोदी का नाम काफी पीछे था. लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, जसवंत सिंह, जैसे नेता नरेंद्र मोदी से काफी आगे थे....आज के राजनितिक हालत कि कोई सुग-बुगाहट नहीं थी, फिर ऐसा क्या हुआ कि इन बड़े और केंद्रीय राजनीति में कद्दावर नेताओं कि मौजूदगी में एक प्रादेशिक राजनीति से निकलकर नरेंद्र मोदी सबसे बड़े नेता बन गए? इस हकीकत का रहस्य देश कि राजनीति के लिए बेहद अहम् है....

इसमें कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी जी का चेहरा चमकाने के लिए कई बड़े और सफल प्रयास किये गए...मुख्यतः उन राजनितिक प्रयाशों को घटनाक्रम के अनुशार दो खण्डों में बाँट सकते है १. गुजरात विधानसभा चुनाव पूर्व और, २. गुजरात विधानसभा चुनाव पश्चात !
जहाँ तक प्रश्न नरेंद्र मोदी को लेकर आज के राजनितिक सन्दर्भ में किये गए प्रयाशों का प्रश्न है, मेरे कई बीजेपी समर्थक मित्र इस बात से निस्चय ही इत्तेफाक नहीं रखेंगे, लेकिन यही हकीकत है कि गुजरात विधानसभा चुनाव पूर्व पुरे गुजरात में यह सन्देश फैलाया गया था कि '"""अगर नरेन्द्र मोदी इस बार गुजरात जीत गए तो, प्रधानमंत्री बन सकते हैं""" .....यह वास्तव में गुजरात के मतदाताओं को आकर्षित करने का सबसे बड़ा हथियार था ! इस तथ्य को व्यवहारिकता कि नजर से देखें तो, हमें समझाना होगा कि देश में क्षेत्रीय राजनीति कि भी बड़ी भूमिका है! एक आम मतदाता के रूप में हमें बड़ा गर्व होता है कि हमारे प्रदेश का नेता देश का प्रधानमंत्री बने ! वह नेता कितना भी बुरा हो, लेकिन प्रदेश कि गरिमा का ख्याल कर हम उसे वोट दे ही देते है! स्पस्ट है कि नरेंद्र मोदी को लेकर फैलाये गए संदेशों को भी गुजरात कि जनता ने, प्रदेश कि गरिमा और आत्मसम्मान से जोड़ कर देखा, और उन्हें वोट देकर भरी बहुमत से जिताया! यह नरेंद्र मोदी के पहले बड़े रणनीतिक प्रयाश कि जीत थी!

अपने प्रयाश में बड़ी सफलता के बाद नरेंद्र मोदी जी ने बेहद खूबसूरती से गुजरात चुनाव पश्चात दूसरा बड़ा प्रयाश किया,,,,,और पुरे देश में यह सन्देश फ़ैलाने का कार्य किया गया कि, """'नरेंद्र मोदी जी गुजरात में इसलिए तीसरी बार जीत पाये, क्योकि गुजरात में बहुत विकास हुआ है'"" पुरे देश में यह माहौल बनाया गया कि नरेंद्र मोदी जी एक विकास पुरुष है! सीधे शब्दों में कहें तो, पहले गुजरात में "भविष्य के प्रधानमत्री के नाम पर वोट माँगा गया, और अब देश में गुजरात के मुख्यमंत्री रूप में किये गए कामों के नाम पर वोट माँगा गया" यह वास्तव में एक बहुत बड़ा राजनितिक घटनाक्रम है, जिसे समझाना एक आम मतदाता के लिए सम्भव नहीं है!
कुछ दिनों लालू यादव पर एक बहुत खूबसूरत चुटकुला प्रचलित हुआ था, --एक बार लालू जी अपने पुत्र कि शादी के लिए बिल गेट्स कि लड़की का हाथ मांगने गए, उन्होंने बिल गेट्स से कहा कि 'लड़का वर्ल्ड्बैंक में वाइज प्रेसिडेंट है," बिल गेट्स खुश हुए और शादी के लिए मान गए, .....वहाँ से निकलकर लालू जी, सीधे वर्ल्ड्बैंक के प्रेसिडेंट के पास गए..और उनसे कहा "एक लड़का है जो, बिल गेट्स का होने वाला दामाद है, उसे आप अपने यहाँ वाइज प्रेसिडेंट रख लो" ......वह मन गया और उसने लालू जी के लड़के को वाइज प्रेसिडेंट रख लिया ! लालू जी के ऊपर लिखा गया यह चुटकुला, अवश्य ही काल्पनिक और हास्य के लिए है......लेकिन मोदी जी ने इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी का बेहतर उपयोग किया है, अपनी राजनितिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए .....लोकसभा चुनाव २०१४ कि पृष्टभूमि ऐसी जुगाड़ टेक्नोलॉजी पर आधारित होगी, मुझे नहीं लगता कि किसी ने कल्पना भी कि थी, लेकिन आने वाले समय में भारतीय राजनीति का भविष्य इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी के प्रयोग से कैसा होगा, यह देखना उतना ही दिलचस्प होगा, जितना लालू जी का चुटकुला .......हंसिये मत, आचार संहिता लागु है !!!! चुटकुले ही अब नेताओं कि रणनीति और देश कि राजनीति तय करेंगे... ..... के.कुमार. अभिषेक (२३/0३/२१४ )

AAP : POLITICAL CHANGE or, DRAMA

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह 'आम आदमी पार्टी' ने एक नयी राजनीति कि शुरुआत कि, उससे पुरे देश में एक बहुत बड़े राजनितिक परिवर्तन का माहौल तैयार होने लगा था. पार्टी बनाते समय स्वयं केजरीवाल ने कहा था कि, 'वे राजनीति करने नहीं, राजनीति बदलने आये है' . उनका मानना था कि, 'आम आदमी पार्टी' स्वस्थ राजनीति करेगी तो, अन्य पार्टियां भी स्वस्थ राजनीति करने को मजबूर हो जायेगीं , अन्यथा जनता उन्हें उखाड़ फेकेंगी' ! वास्तविक रूप से देखें तो, दिल्ली में सरकार बनाने के साथ ही केजरीवाल कि बात सच होना प्रारम्भ हो चुकी थी. जिस तरह केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के रूप सादगी के नए पैमाने गढ़े, पुरे देश ने देखा कि केजरीवाल कि देखा-देखी कई मुख्यमंत्रियों ने अपने चाल-ढाल बदल लियें ! वास्तव में यह 'केजरीवाल एंड कंपनी' कि सबसे बड़ी नीतिगत जीत थी कि, पुराने राजनीतिज्ञ ना चाहते हुए भी उनकी राह पर चलने को मजबूर होने लगे थे ! यह दौर था, जब मेरे जैसा तठस्थ इन्सान भी केजरीवाल कि प्रशंसा करने लगा था,
लेकिन आज हालत बदल चुके है, दूसरों को बदलने का दावा करने वाले केजरीवाल खुद बदल चुके है, ...नयी और स्वस्थ राजनीति कि बात करने वाले केजरीवाल, अब स्वयं पुराणी और गन्दी राजनीति अपनाने को मजबूर दिखने लगे है, हो ना हो राजनितिक महत्वकांक्षाएं जग चुकी है और सता पाने कि लालच में कुछ भी कर गुजरने कि प्रवृति घर करने लगी है! अब तो केजरीवाल जी का हर कदम एक राजनितिक स्टंट दिखाई देता है!
आज मुझे व्यक्तिगत रूप से बड़ा दुःख होता है, जब मै केजरीवाल को हिन्दू मंदिर में टिका लगाये और मस्जिद में इस्लाम टोपी लगाये देखता हूँ ! पुराने राजनितिक बहरूपियों कि छवि दिखाई देती है मुझे, जो जाती और धर्म कि बुनियाद पर राजनितिक रोटियां सेकने का प्रयास करते है! मुझे दुःख होता है जब केजरीवाल अन्य राजनेताओं कि तरह इंटरव्यू से पहले पत्रकारों से सेटिंग करते है, खास अंश के प्रदर्शन कि मांग करते हैं ! मुझे दुःख होता है जब केजरीवाल जाति के आधार पर आरक्षण कि बात करते है, जातिगत आधार पर वोटों के धुर्वीकरण कि कोशिस करते है! केजरीवाल भ्रस्टाचार से लड़ने कि बात तो करते है लेकिन जब बिहार में शिवानंद तिवारी जैसे अनुभवी भ्रस्टाचारियों को गले लगाते है, तो एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं एक 'राजनितिक नाटक' कि बू आती है! शिवनाद तिवारी इतने काबिल इन्सान है कि एक समय बिहार के राजनितिक परिदृश्य में शिखर पर होने के बावजूद, उनके लिए आज किसी भी दल में जगह नहीं है! पिछले दिनों ऐसी हज़ारों घटनाएं हुई है जहाँ 'केजरीवाल एंड कंपनी' अपने राजनितिक उदेश्यों से भटकती नजर आयी है! मन में यह संशय भी होता है कि दिल्ली में 'सता सुख' पाने के बाद कही राजनितिक उदेश्य तो नहीं बदल गए !
मेरे कई मित्र 'आम आदमी पार्टी' से हैं, और निश्चय ही उनका जवाब मुझे मिलेगा, बेहतर होगा कि वे मुझे जवाब देने में समय व्यय करने कि जगह इन समस्याओं के विरुद्ध 'पार्टी' के अंदर आवाज उठायें....मै केजरीवाल जी का प्रसंशक अवश्य रहा हूँ, लेकिन समर्थक नहीं! अच्छी बातों पर प्रशंसा कर सकता हूँ तो, गलत बातों पर आलोचना भी करूँगा ! मेरे साथ ऐसी कोई राजनितिक मज़बूरी नहीं है कि मैं केजरीवाल जी कि हर सही-गलत बात कि प्रशंसा करना पड़े! ---के . कुमार.अभिषेक

Sunday, 16 March 2014

'राजनीति' की जगह 'लोक-नीति' या, 'जन-नीति'

आज राजनीति शब्द हिन्दी साहित्य के सबसे कड़वे शब्दों मे से एक है! इस शब्द का संस्मरण होते ही, मन-मस्तिष्क मे एक ऐसा मानवीय चरित्र घूम जाता है जिसे इंसान मानने से पूर्व इंसानियत की परिभाषा मे भी सामंजस्या बैठने की ज़रूरत पड़ जाएगी!
वास्तविक रूप से देखा जाय तो, 'राजनीति' शब्द के उच्चारण मात्र से ही "राजतंत्र" की बू आती है! वास्तव मे वर्षों पहले हमारे देश से "राजतंत्र" का अंत हो गया, लेकिन इसकी नीति (राजनीति) आज भी हमारे बीच मौजूद है, और मौजूद ही नही कहीं ज़्यादा मजबूत स्थिति मे है! राजतंत्र मे राजनीति का शब्द का औचित्या राजा और उनके मंत्रियों तक सीमित था, लेकिन लोकतंत्र मे हर आम व, खास के लिए इस शब्द का औचित्य महत्वपूर्ण हो गया, सबके लिए 'राजनीति' के दरवाजे खुल गये !
मेरा व्यक्तिगत मत है की 'राजतंत्र' के साथ 'राजनीति' शब्द को भी समाप्त कर देना चाहिए था, इस शब्द को भी इतिहास के नाम अधिकृत कर देना चाहिए था! ज़्यादा बेहतर होता के हमारे संविधान निर्माता 'राजनीति' की जगह 'लोक-नीति' या, 'जन-नीति' जैसे शब्दों के इस्तेमाल का प्रचलन शुरू करते! ये शब्द वर्तमान शासन प्रणाली के साथ बेहतर सामंजस्या के साथ परिभासित होते हैं!
---के.कुमार 'अभिषेक' (24/02/2014)

"जाति और जातिवाद का जन्म"

अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को बेदाग दिखाने के चक्कर मे किस तरह जातिवाद की राजनीति को ढाल बनाया जा रहा है, यह काफ़ी हद तक समझा मे आ गया, ! वास्तविक रूप से देखें तो लाख प्रयास के बावजूद अभी तक समाज के जातिगत विखंडन का आधार नही मिल पाया है,...मेरी व्यक्तिगत राय मे हमारे समाज की "जातिवादी व्यवस्था" काफ़ी हद तक कर्म पर आधारित व्यवस्था हैं! प्राचीन समय मे जानवरों की तरह रहने वाले इंसान के अंदर थोड़ी जागृति आई, वह समूह मे रहने लगा ! जब समूह मे रहने लगा तो उसने एक 'कार्ययोजना' बनाई, जिसके तहत ऐसी व्यवस्था की गई की सब लोग मिलकर एक दूसरे की आवश्यकता को पूरा कर सकें, ! सबको अलग-अलग काम दे दिए गये, साथ ही यह भी तय कर दिया गया की, जिसको जो काम दिया गया है, वही काम उसकी आने वाली पीढ़िया भी करेंगी, जिससे आवश्यकता और उपलब्धता मे संतुलन बना रहेगा ! यहाँ ध्यान देने वाली बात है की यह सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़िमेदारियों की बात थी, समय गुजरने के साथ लोग अपने-अपने कामों मे औरों से बेहतर होते चले गये, ..परिवारिक कामों को बच्चे भी करने मे बचपन से अभ्यस्त हो जाते हैं इस तरह बच्चे भी ज़िमेदारी को निभाते चले गये ! यहाँ ध्यान देने की आवश्यकता है की यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बेहतर कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने के प्रयास मे ज़िमेदारीओं को निभाने की बात थी, अन्यथा आरम्भ मे सभी लोग सभी कामों को करने मे पूरी तरह सक्षम थे, और आज भी सक्षम है! आगे चलकर अलग-अलग काम करने वालों के सामूहिक परिचय के लिए जाति-सूचक शब्दों का प्रयोग आरम्भ हुआ ,....यह सिर्फ़ परिचय मात्र के लिए था ! शायद यह मानव सभ्यता की शुरुआत थी,

आगे चलकर लोगों मे भेद-भाव शुरू हो गया, .....अपने-अपने काम को समूह के लिए महत्वपूर्ण बता के अपनी जाति ( अपने जैसे कार्य करने वालो का समूह) को महत्वपूर्ण सिद्ध करने की कोशिश होने लगी, और इस तरह उँछ-नीच का भाव समाज मे पनपने लगा ! शायद यह मानव असभ्यता की शुरुआत थी! वास्तव मे यह घटना उस समय के लिए कोई बड़ी बात नही थी, क्योकि आज भी कुछ लोग साथ रहते हैं तो समय के साथ उनके आपसी संबंधों मे खटास आ ही जाती है, कौन ज़्यादा काम करता है? कौन कम काम करता है? कौन ज़्यादा कमाई करता है और कौन कम? किसका काम ज़्यादा महत्वपूर्ण है? ऐसी चर्चाए आज भी किसी भी समूह मे टुट का कारण बन जाती है! लेकिन आज के परिदृश्य मे उस घटना का बेहद बुरा प्रभाव हमारे समाज मे देखने को मिल रहा हैं,...
बदलते समय के साथ परिचय के लिए बने 'जाति सूचक शब्द' सामाजिक विखंडन का आधार बन गये....इसे हमारे राजनेताओं ने भी बखूबी इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक परिपाटी को मजबूत बनाने का काम किया ! लोगों को जातिवाद रूपी जाल मे इस तरह फँसाया गया और उनका जमकर शोषण किया गया.....इस बीच 'जातिगत आरक्षण रूपी' दाने भी डाले गये...और जिस तरह कोई शिकारी दाने डाल कर कबूतरों को अपनी जाल मे फँसा लेता है, उसी तरह इस देश के राजनेताओं ने लोगों को 'जातिगत आरक्षण' रूपी दाने डाल कर लोगों को जातिवादी जाल मे फँसाने का काम किया.....

REALITY OF RELIGION !

व्यक्तिगत तौर पर मैं "मानव धर्म" मे विश्वास रखता हूँ, इसलिए मोदी जैसे लोग जो धर्म के आधार पर इंसानियत को खंडित कर रहे हैं, मुझे नापसन्द है! यहाँ कोई हिंदू मुस्लिम नही हैं, सब मूलरुप से मानव हैं, और इस आधार पर मानव धर्म ही सबका धर्म होना चाहिए! एक मिनट के लिए हम धर्मों की बात करें, तो मैं स्पस्त तौर पर कहना चाहूँगा की "आज कोई भी धर्म अपने विसुद्ध रूप मे हमारे समाज मे मौजूद नही है"! आज का "इस्लाम धर्म" हज़रत मुहम्मद साहब का "इस्लाम धर्म" नही रह गया है, यह कुछ गंदी मानसिकता से ग्रसित, स्वार्थी, भ्रष्ट, असामाजिक और अनैतिक लोगों द्वारा संचालित धर्म भर रह गया है! हज़रत मुहम्मद साहब के "पाक" धर्म को नापाक इरादों वालों इंसानो ने अपनी विकृत मानसिकता मे पैदा हुई विचारधारा को ही "इस्लाम धर्म" के रूप मे परिभासित करके मानवता को खंडित करने का काम किया है! सिर्फ़ इस्लाम धर्म ही क्यों हर धर्म की यही स्थिति है, धर्म के नाम पर "गैंग्वार"करने की कोशिस हो रही है ! काफ़ी अच्छ लगता है सुन कर जब लोग कहते हैं की "आतंकवादी" का कोई धर्म नही होता, लेकिन इस कड़वी सचाई से भी इनकार नही किया जा सकता की आत्नकवाद फैलने के लिए धर्म को आधार बनाया जा रहा है, और धर्म को आधार बना कर ही लोगों को आत्नकवाद से जोड़ जा रहा है! लगभग यही स्थिति इस देश के कोने-कोने मे फैले नक्सलवाद की भी है, जिसके लिए "जाति और अगला-पिच्छला" की भावना को आधार बनाया जाता रहा है! कल तक हमारे देश मे " डकैत" हुआ करते थे, जो जंगलों और पहाड़ों मे रहकर आस-पास के निवासियों को छति पहुचाने का काम करते थे, आज उन डकैतों मे से ही कुछ विभिन्न धर्मों मे धर्मगुरू/धर्मसनचालक बन बैठे है, और कुछ शायद राजनेता बन गये है!

Hindu GOD SHIV: unknown reality?

जिस तरह 'दही' को मथने से शुद्ध "घी" निकलता है, उसी तरह धर्म के नाम पर फैले "झोल" मे से सत्य को निकालने के लिए तर्क आवश्यक है,! आज सुबह से मेरे कई मित्र बड़ी श्रधा भाव से उस ' शिव अंग' की पूजा भक्ति मे लीन हैं, ना जाने क्या क्या माँगें रख रहे हैं, ! रही बात धर्म को तो, इतिहास पर गहराई से नज़र डालें, तो यही स्पस्त होता है की प्राचीन काल से 'हिंदू धर्म' के नाम पर हमारे पूर्वजों ने प्रकृति की पूजा की है, इतिहास मे नदी,तालाब, पेड़-पौधे, अग्नि, वायु,सूर्य,भूमि, जल, और लिंग की पूजा का प्रमाण मिलता है, हम ध्यान से देखें तो, ये सभी प्राकृतिक तत्व इस ब्रम्‍हांड मे मानव जीवन को संभव बनाते हैं, इनमे से किसी एक की कमी भी धरती पर हमारे जीवन को असंभव बना सकती है, अगर हम बात लिंग की ही करें तो, वास्तव मे यह 'मानव निर्माण' का कारण है, स्वस्थ मस्टिस्क से इस की वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा हमे.....मुझे दुख इस बात की है की, हमारे कई पढ़े-लिखे विद्वान मित्र 'शिव लिंग' की पूजा करते हैं और उससे ना जाने क्या-क्या माँगते हैं....कोई नौकरी माँगता है, किसी को शिव लिंग से धन चाहिए....किसी को परीक्षा मे अच्छे नंबर चाहिए.....क्या है ये? मेरी मन दुखी हो जाता है, अंधभक्ति का रूप देख कर ! मुझे खुद बुरा लग रहा है की मैं कैसे विषय पर चर्चा कर रहा हूँ, लेकिन "सच का कीड़ा" जो मेरे अंतर्मन मे निवास करता है, मुझे बेबस कर देता है..........

 सर्वप्रथम हमे इस विषय मे "सत्य" को गंभीरता को समझते हुए, स्वस्थ मस्तिष्क के साथ चिंतन करना होगा !
वास्तविक रूप से देखा जाए तो, "शिव लिंग" की पूजा MALE SEX PART की पूजा है, इसी तरह शिव की तीसरी आँख का तात्पर्य FEMALE SEX PART से हैं ! ये दोनो मानव प्रजनन क्रिया के प्रतीक हैं, जिसकी वजह से मानव जन्म संभव होता है! शिव को मादक और नशीले पदार्थों के सेवन के लिए भी जाना जाता है, कही ना कही "भोग-विलास" से संबंध जुटते हैं, !

इस तरह देखें तो, "शिव लिंग" की पूजा ग़लत लगता है,.......लेकिन हमे एक और बात को भी समझना होगा की, "मानव प्रजनना" को धर्म से जोड़ कर "पति-पत्नी" की बात की गई है ..शिव की वह तस्वीर सबने देखी होगी, जिसमे अर्ध शिव-पार्वती को दिखाया गया है, यह पति-पत्नी के संबंधों की वास्तविक परिभाषा है.....वास्तव मे "शिव" का तात्पर्या पति से हैं......शिव को महादेव माना गया है वही कई धर्मग्रंथों मे पति को भी महादेव कहा गया है.....दूसरी तरफ पार्वती को "जगत जननी" कहा गया है,! वास्तव मे पति-पत्नी के बीच पैदा हुई उस भावना को ग़लत भी नही कहा जा सकता है!

जो लोग तर्क को नही समझ सकते हैं, जो धर्म और धर्मग्रंथो पर आँख मूंद कर विस्वास करते हैं, मैं चाहूँगा की वे शिव पुराण के पन्ने देखें, और तथ्यों को अपने विवेक से परिभासित करके समझने का प्रयास करें.........

मैं शिव पुराण की एक कथा का ज़िक्र मैं यहाँ करना चाहूंग..."शिव पुत्र कार्तिकेय जन्म कथा" =====एक बड़े एक दुष्ट दानव ने स्वर्ग पर हमला कर दिया, स्वर्ग के राजा इंद्र और उस दानव के बीच भीषण युद्ध हुआ, लेकिन उसने इंद्र को पराजित करके स्वर्ग पर कब्जा कर लिया....अब स्वर्ग के सारे देव वहाँ से भाग खड़े हुए, भागते -भागते वे ब्रम्‍हा के पास गये और उनसे मदद की गुहार लगाई, लेकिन वह दानव ब्रम्‍हा का भक्त था, ऐसे मे ब्रम्‍हा देवताओं की मदद करने मे सक्षम नही हुए, उन्होने देवताओं को विष्णु के पास जाने की सलाह दी.....सभी देवता विष्णु के पास गये, और सारी स्थिति बता कर, मदद की गुहार लगाई....लेकिन किसी कारणवश वो भी मदद करने मे असमर्थ थे, फिर विष्णु ने देवताओं को शिव के पास जाने की सलाह दी.....लेकिन समस्या ये खड़ी हो गई की 'शिव' तपस्या मे लीन थे, और उनकी तपस्या को भंग करने की क्षमता किसी के पास नही थी, सारे देवताओं ने कई उपाय किए लेकिन शिव की तपस्या भंग नही हुई....शिव की तपस्या को भंग करने की ताक़त सिर्फ़ "कामदेव" (GOD OF SEX) के पास थी, .......सारे स्वर्ग के देवता कामदेव के पास गये, और उनसे तपस्या पर लीन शिव को जगाने का आग्रह किया...कामदेव तैयार हो गये.....सभी लोग कैलाश पर्वत पर जमा हुए....कामदेव ने अपनी शक्तियों का प्रयोग शुरू किया....उन्होने शिव के शरीर पर 6 बान माँगे, शिव नही जागे......अंत मे कामदेव ने अपने सबसे मजबूत शक्ति का प्रयोग किया और एक बान शिव की "तीसरी आँख" मे मारा....बान का लगना था की शिव भारी क्रोध के साथ जग गये....तीसरी आँख मे कामदेव की बान लगते ही, उनकी सारी तपस्या भंग हो गयी....उस क्षण शिव को इतना गुस्सा आया की, तीसरी आँख से निकली ज्वाला मे "कामदेव" भस्म हो गये....कुछ देर पश्चात सभी देवताओं ने आग्रह-विनती करके शिव को शांत कराया, ....शिव ने जब समस्या को सुना तो उनका क्रोध शांत हो गया....उन्होने भस्म कामदेव को माफ़ कर दिया और उन्हे भगवान कृष्ण के पुत्र के रूप मे नया जन्म लेने का आशीर्वाद दिया....वही कामदेव कृष्ण और रुक्मणी के पुत्र (प्रदूमान) के रूप मे अवतरित हुए.....दूसरी तरफ "कामदेव" के प्रभाव मे जगे, शिव-पार्वती के प्रथम पुत्र (कार्तिकेय) का जन्म हुआ और उसी बालक कार्तिके ने स्वर्ग पर विराजमान उस दानव को युद्ध मे पराजित किया और स्वर्ग पर इंद्र का शासन पुनः स्थापित किया!
इस धार्मिक कहानी को पढ़कर भी किसी को समझ ना आए तो, मुझे भी अपना मस्तिष्क फोड़ने का कोई खास शौक नही है, कहते है की शिक्षा से इंसान के अंदर व्यावहारिक आत्मनिर्भरता आती है. वह हर तथ्य को आत्म विवेक से अध्ययन करके ही स्वीकार करता है, दूसरी तरफ एक अशिक्षित इंसान के लिए "काला अक्षर भैंश बराबर होता है....उसे जो कहा जाता है, सुनाया जाता है उस पर विस्वास करना ही होता है!


लोगों को पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते, उसकी विनती करते, उससे अपनी इच्छानुसार माँगे माँगते देख कर मुझे शराब के नशे मे धुत शराबी की याद आती है जो अपनी नशे मे सजीव और निर्जीव का फ़र्क भी भूल जाता है, ! नशे के सेवन से इंसान का मानसिक संतुलन समाप्त हो जाता है, उसे ग़लत-सही का ज्ञान नही होता ! अक्सर हमने देखा है की नशे मे धुत इंसान निर्जीव वस्तुओं से भी काफ़ी भावनात्मक बाते करते हैं, उसे गले लगते है, उससे अपना दुखड़ा रोते है, और फिर बेहोश होकर वही गिर जाते है! ठीक यही स्थिति अंधभक्तो की होती है!

                                        (27/2/2014.....mahashivratri day)

MY POEM-3

सुप्रभात मित्रों, लगभग एक सप्ताह पूर्व मैने एक बेहद छोटी कविता लिखने की कोशिस की थी ! आप सभी को समर्पित करने से पूर्व मैं अपने आद्रणीय 'कवि मित्रों' से इस दु-साहस के लिए माफी चाहूँगा.....मुझे पूरी उमिद है, मेरी यह कोशिस आपके आशीर्वाद के काबिल होगी...... गौर करें.....

मेरी खामोशी को लोगों पैगाम समझ लिया,
सुबह के धूंधुलके को लोगों ने 'शाम' समझ लिया !

लाज-शर्म-हया जब बिकने लगी यहाँ,
नासमझी का आलम था,
लोगों ने इसे संस्कार समझ लिया !

भारत माँ के दर्द को कैसे करूँ मैं बयाँ,
जमाने ने उनके आसुओं को 'जाम' समझ लिया !

अंधों की भीड़ मे,
लंगड़ों की दौड़ हो रही यहाँ,
बिक रहे सपनों को,
लोगों ने परिणाम समझ लिया !

- आपके आशीर्वाद का आकांक्षी
के.कुमार 'अभिषेक'

What is ture nad false?

"सही और ग़लत" की करोड़ो परिभाषाएँ होते हुए भी, आज तक ये शब्द अपरिभाषित है ! आज तक हम 'सही-ग़लत' की सर्वमान्य परिभाषा नही बना पाएँ है ! हम यह तय नही कर सकें है की निश्चित रूप से क्या सही है और क्या ग़लत ? संपूर्ण ब्राम्‍हांड मे ऐसा कोई कार्य-व्यवहार नही जिसे ग़लत साबित नही किया गया है, और जिसे सही साबित ना किया जा सकें ! वास्तव मे 'सही-ग़लत' की हमारी परिभाषा व्यक्ति विशेष के साथ बदलती जाती हैं, यह काफ़ी हद तक व्यक्तिगत नज़रिया और हमारी तत्कालिक अवधारणा पर निर्भर करती है ! हम बाज़ार मे खरीदारी के लिए जाते हैं, कुछ चीज़े देखते हैं और पसंद कर लेते हैं, वह वास्तु हमारे नज़र मे 'सही' होती है, वही बगल मे बैठे दूसरे इंसान को वह पसंद नही होती है, और उसके लिए वह 'ग़लत' हो जाती है,! समझने की ज़रूरत है की एक ही वास्तु, एक ही समय पर अलग-अलग नज़रों की वजह से 'सही और ग़लत' दोनो साबित हो गयी ! कई मामलों मे एक ही इंसान एक ही घटना को अलग-अलग परिस्थितियों मे अलग-अलग परिभासित करता है!

हम अपने आम जन-जीवन मे ही देखें तो यही स्पष्ट होता है की 'सही-ग़लत' की स्थाई और सर्वमान्य परिभाषा नही है ! उदाहरण देखे की , 'चोरी करना एक ग़लत काम है' लेकिन उस पिता को ग़लत कैसे कह सकते हैं, जो अपने भूखे पुत्र को जीवित रखने के लिए चोरी करने को मजबूर हो जाता है ! अपने समय का बहुत बड़ा डकैत और चंबल का आतंक वीरप्पन पूरी दुनिया के लिए ग़लत इंसान था, उसके कर्म ग़लत थे, लेकिन उन आस-पास के गाँवों मे रहने वाले कई लोगों के लिए वह मशिहा भी था, उन लोगों के लिए उसके कर्म ग़लत नही थे !
वास्तव मे 'सही-ग़लत' की सर्वमान्य परिभाषा न होना, मानवीय अस्थिरता का कारण है! आज 'सही-ग़लत' के पैमाने के तौर पर हर देश के पास अपना क़ानून है, लेकिन ये क़ानून भी तब तक अपुष्ट हैं जब तक 'सही-ग़लत' की सर्वमान्य परिभाषा ना हो ! हालात के साथ जिस तरह 'सही-ग़लत' की परिभाषाएँ बदलती हैं, ऐसे मे किसी भी क़ानून की संपूर्णता और स्थिरता पर सवाल आवश्या खड़े होंगे!

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...