Tuesday, 4 February 2014

लोकतंत्र का .......क,ख, ग,........(आम जनता के लिए)

मेरा व्यक्तिगत मानना है की, 'व्यक्तिवादी लोकतंत्र' राजनीतिक दलों मे नही होना चाहिए, लेकिन आम मतदाता के लिए राजनीति को समझने का  बेहतर माध्यम  है "व्यक्तिवादी लोकतत्र" .! आज जिस तरह की महत्वहिन, और गैर-ज़िम्मेदाराना राजनीति हो रही है, ऐसे मे हमारी आम जनता के लिए लोकतंत्र को समझना काफ़ी जटिल हो गया है। राजनीति उनके लिए एक अबूझ पहेली बनती जा रही है, यही कारण है की आज लोकतंत्र मे जनता की भागिदारी कम हो रही है।  ऐसे मे बेहद आवश्यक है की हमारे मतदाता सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने क्षेत्र के उम्मीदवारो को ध्यान मे रखकर वोट करे, क्योकि यही भारतीय राजनीति के हित मे उचित होगा।  हम मदाताओ को दलगत/केंद्रिय/ जातिगत/धार्मिक/ समीकरण को मतदान प्रकिया से बाहर करना होगा।  
                             उदाहरण के लिए-- अगर किसी दल के घोषित प्रधानमंत्री उम्मीदवार हमे प्रधानमंत्री के रूप मे पसंद है, लेकिन उनके दल का हमारा स्थानीय उम्मीदवार सही ना हो, तो हमे उसे वोट नही देना चाहिए।  इसी तरह अगर कोई राजनीतिक दल हमे पसंद हो, लेकिन उनका स्थानीय उम्मीदवार योग्य ना हो तो हमे उसे वोट नही करना चाहिए।  देश के सभी मतदाताओ को राजनीति की मुश्किलों मे पड़े बिना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना नेता चुनना चाहिए, क्योकि प्रधानमंत्री /मंत्री चुनने का अधिकार हमारे पास नही है।  हम सभी अच्छे व्यक्तियो को चुन कर संसद मे भेजेंगे, ऐसे में जिस दल के ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे उम्मीदवार होंगे उनकी ही सरकार बनेगी और उनका ही नेता प्रधानमंत्री बनेगा, अर्थात हमें अपने क्षेत्र के लिए 'व्यक्तिवादी  नजरिया ' का प्रयोग राजनितिक सरलता के लिए करना चाहिए, और यही देश कि लोकतंत्रिक  व्यवस्था के हित में होगा। --------------------- के. कुमार (अभिषेक)

छठ पूजा :- वास्तविकता के आईने मे

देश के प्राचीन इतिहास पर गहराई से नज़र डालें तो, स्पष्ट रूप से पता चलता है कि,  हमारे पूर्वजो ने प्राकृतिक तत्वो की पूजा की है।  जी हाँ, वास्तविक सचाई यही है की हमने भगवान के हर रूप मे किसी न किसी प्राकृतिक तत्वो की पूजा की है। इतिहास मे नदी-तालाबो, पेड़-पौधो, अग्नि, वायु, सूर्य, भूमि, लिंग, पत्थर-पहाड़ो, आदि प्राकृतिक जीवनदायिनी स्रोतो की पूजा का प्रमाण मिलता है।
वास्तव मे देखें तो इनकी पूजा का कोई धार्मिक कारण नही है।  ये सभी तत्व मानव जीवन को संभव बनाते है, इनमे से किसी एक तत्व की कमी धरती पर मानव-जीवन की संभावनाओ को समाप्त कर सकती है।  इस आधार पर इनकी पूजा को ग़लत नही कहा जा सकता है, इन तत्वो की पूजा करके कँहि ना कहि हमने इनके प्रति आभार प्रकट करने की कोशिस की थी।
                                                                     समस्या तब प्रारंभ हुआ, जब लोगो ने प्राकृतिक तत्वो की वास्तविकता को धर्म के साथ जोड़ कर भ्रामकता की तरफ मोड़ने का प्रायास किया। इस प्रयास को अमली जमा पहनाने मे हमारे धार्मिक ग्रंथो का महत्वपूर्ण योगदान है।  इन्ही तत्वो को मानव रूपो मे कल्पित करके जनता के सामने नयी-नयी कहानियाँ रची गयी। 

इस ऐतिहासिक तथ्य को हम यही रहने दें, और आज की बात करें तो, आज देश के कई हिस्सो मे सूर्य की पूजा का आयोजन होता है। मित्रो, आज हमे समझने की ज़रूरत है की, आज जिस तरह से वायु प्रदूषण फैल रहा है. उससे वायुमंडल का अति-महत्वपूर्ण परत "ओज़ोन परत " निष्क्रिय हो रहा है। यह वही ओज़ोन परत है, जहाँ पाया जाने वाला ओज़ोन गैस सूर्य की हानिकारक किरण को अवसोषित करके पृथ्वी पर आने से रोकता है। मित्रो, अगर हमे सूर्य के इस भयानक प्रकोप से बचना चाहते है तो, हमे वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना होगा।  आज हमे समझने की आवश्यकता  है की हम अपने मानसिक अंधापन के आवेश मे आकर सूर्य को जल चढाकर, पूजा करके या उनकी स्तुति करके, कभी भी सूर्य की क्रोध रूपी हानिकारक किरणो  के प्रभाव से नही बच सकते है।  अगर हम सूर्य के क्रोध से बचना चाहते है तो, हमे ढोँगापंथि से बाहर आना होगा और वास्तविकता को स्वीकार करना होगा, अन्यथा वह दिन दूर नही जब धरती पर हमारा जिवन मुश्किल हो जाएगा..!!!------के. कुमार (अभिषेक )

(छठ पूजा के अवसर पर /८-११-२०१३)

नेता, राजनेता, और हम

नेता" और "राजनेता" दो अलग शब्द हैं, जो व्यक्ति समाज से जुड़कर समाज और देश को आगे बढाने का प्रयत्न करे, वही नेता है,  बाकी राजनेता तो हम देख ही रहे हैं जो गद्दी के लिए मानवीय बुराइयों की हर सिमा लाँघने को तैयार हैं .!   हाँ, यह बात स्वीकार्य है की अच्छे और बुरे लोग हर जगह हैं और ये सभी हमारे बीच से ही हैं ! एक बात और की यह हमारी ग़लतफहमी हैं की समाज से व्यक्ति बनता हैं, सच यही है की व्यक्ति से समाज बनता है ! हमसे समाज बनता है और हमसे समाज बिगड़ता है ! आज देश मे जो भी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक,  सांस्कृतिक, आर्थिक हालत हैं, उसके लिए इस देश के 120 करोड़ लोग ज़िमेदार है, इसके लिए हमारी कर्महीनता, और मानसिक अंधपान ज़िमेदार है, कड़वी सचाईयो से भागने की आदत ज़िम्मेदार है ! यहाँ हर व्यक्ति समाज और देश को बदलते देखना चाहता है, व्यवस्था मे परिवर्तन चाहता है, हम सभी हर स्थिति मे परिवर्तन चाहते है, लेकिन हम अपने आप को नही बदलना चाहते हैं !  देश के 100 करोड़ ज़िमेदार व्यवस्को को समाज, और व्यवस्था मे खामियाँ तो दिखती हैं, लेकिन इनमे से किसी को खुद मे खामियाँ नही दिखती है ! दूसरो की खामियाँ निकालने से इस देश मे कोई परिवर्तन नही आने वाला है, जब तक कि, इस देश का हर नागरिक अपने अंदर नही झकेंगा, अपनी खामियों को नही पहचानेगा,,!!! In INDIA 2G is very easy to blame, GOD &GOVERNMENT..We all Indians are playing only blame game. THAT'S the biggest problem of Indian society.

Monday, 3 February 2014

MY POST:- AAL THE BEST SACHIN---( end of the last match)

आज से भारतीय क्रिकेट का एक अलग युग प्रारंभ होगा, क्योकि सचिन नाम का एक बड़ा और सुनहला अध्याय आज समाप्त हो गया है। माहौल गमगीन है, पूरा देश आज उस सख्स के साथ रो रहा हैं, जिस सख्स ने अपना पूरा जीवन हमे खुशिया देने मे व्यतित किया। सच मे सचिन तुसी ग्रेट नही "ग्रेटेस्ट हो यार" !
         
मित्रों..साथ ही हमे इस बात की बेहद खुशी है, की भारत सरकार ने भी मौके को इतिहास के नाम करने मे बड़ा योगदान दिया और सचिन को मैदान छोड़ने के 2 घंटे बाद ही देश का सबसे बड़ा सम्मान देने की घोषणा  की। एक धन्यवाद तो सरकार के लिए भी आज बनता है, की उसने देश के करोड़ो सचिन प्रसंशको को सबसे बड़ी खुशी देने का सबसे उचित समय चुना..!~

हालाँकि हमारे बीच, कई ऐसे लोग अवश्य हैं , जो सचिन को एक खिलाड़ी के रूप मे देखते हैं और आज भी उनके सामने ये सवाल आएगा कि , सचिन को भारत रत्न क्यों?

मित्रों...वास्तव मे मै भी उन लोगो मे से हि हूँ, जो खेल को सिर्फ़ खिलवाड़ समझते है।  इस लिहाज से मेरे तर्क हो सकते है, लेकिन आज मै कुछ नही कहूँगा।  ये सही है की सचिन की पहचान क्रिकेट खिलाड़ी की रही है।  उनकी उपलब्धियों को देश से जोड़ने मे विवाद हो सकता है लेकिन आज मै एक बात खुले दिले से कह सकता हूँ की, एक खिलाड़ी के रूप मे सचिन ने देश को एकजुट करने का काम किया है। आज देश का हर निवासी..चाहे वो किसी जाति -धर्म, भाषा, क्षेत्र से हो...सचिन के लिए आँसू  बहा रहा है। यहाँ तक की हर सही ग़लत बात पर राजनीति करने वाले राजनीतिक दल सचिन के नाम पर एकमत हैं , पता नही पिछली बार ऐसा कब हुआ था। सच मे सचिन भारत रत्न हैं....उन्होने देश को जिस तरह से सूत्र मे एकजुट कर दिया, इस देश के हर नागरिक को सबक लेने की ज़रूरत है। 
साथ ही उन्होने जिस तरह पिच को छु-कर, उसे नमन किया, यह दर्शाता है की, सम्मान के शिखर पर पहूँच चुके सचिन, आज भी धरती से जुड़े है। आज भी वे अपना अस्तित्व मिट्टी मे ही ढूढ़ने का प्रयाश कर रहे हैं......

कल के लिए धन्यवाद...आज के लिए बधाइयाँ.....और आने वाले भविष्य के लिए शुभकामनाएँ .....!!!!!! THANK YOU GOD OF CRICKET.....We all Indians love you...and waiting for another master role in INDIAN CRICKET!!

MY VIEW:- changing indian society & future ahead

 मैं  स्वयं एक युवा हूँ, लेकिन सामाजिक मूल्‍यो को भली-भाँति समझता हूँ, जिसके लिए मेरे माता-पिता ज़िम्मेदार हैं, जिन्होने हमे मानवीय मूल्‍यो की सिख दी।  आज फ़ेसबुक पर जिस तरह से अपशब्दो, तत्यविहीन संवादों  और असभ्यता प्रदर्शन जंग चल रहा है, वास्तव मे भारत के भविष्या की बेहद शर्मनाक संरचना प्रस्तुत करता है।  मेरा व्यक्तिगत मानना है की आज का फ़ेसबुक 2025 का भारतीय समाज है। हालात बेहद भयावाह समाज की कल्पना करने को मजबूर करते है, एक ऐसे समाज की जहाँ व्यक्तिगत, परिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्‍यो के लिए कोई जगह नही होगी।  आज लोगो को भद्दे नाच, द्विअर्थी संगीतो, कम कपड़ो, और शराब की बोतलो मे आधुनिकता दिखती  है, ये सारे विक्षीत मानवता के पैमाने, आज मानव विकाश का प्रयाय बन गये है।

HUMAN JUSTICE :- changing Relation of male & female in our society !

अगर नग्नता प्रदर्शन भी एक कला है, तो व्यक्तिगत रूप से मैं असहमत हूँ।  इंसान के किसी भी रूप (महिला या, पुरुष) का अंग प्रदर्शन कला नही हो सकता है।  कई महान कलाकारो ने कला को 'पूजा' कहा है। दूसरी अहम बात की, काजल आँखो मे अच्छा लगता है, इसका ये मतलब कतई नही होता है की, पूरे शरीर पर लगाने से सुंदरता ज़्यादा बढ़ जाएगी।  कमरे की स्थिति बाहर मे प्रदर्शित करने से मनुष्य के किसी भी भाव की सुंदरता मे वृधि नही होती है। 

                             आज की सबसे बड़ी समस्या यह है की ऐसे मुद्दो पर समाज दो टुकड़ो पर बॅंट जाता है, महिलाओ को लगता है की पुरुषो की मानसिकता ग़लत है, और हम पुरुष साबित करने की कोशिस करते हैं की महिलाओ मे खामियाँ है।  ऐसा जब तक चलेगा, किसी भी समस्या का हल नही निकल सकता है।  मानसिकता बदलने की ज़रूरत इंसान के दोनो रूपो को है।  मानवता और इंसानियत के मूल तत्वो की बलि देकर समाज के परिवर्तन की कोशिस नारकिय स्थिति को जन्म दे सकता है।  महिलाओ पर लगाई गई पाबंदियो को हटाना होगा, उन्हे जीवन मे आगे बढ़ने का पुरुषो के समतुल्य अवसर देना होगा, लेकिन दूसरी तरफ हमारी बहनो को भी पाबंदियों से निकलकर उन ग़लत रास्तो पर जाने से बचना होगा. जिनके डर से पाबंदियाँ लगाई गई थी।  आज इस कड़वी सचाई से इनकार नही कर सकते है की कुछ बहनो के ग़लत कदमो की वजह से, माता-पिता अपनी पुत्री पर आज भी पाबंदियाँ लगा रहे है।  आधुनिकता सोच मे आए तो बेहतर है।
                      एक और अहम बात की, महिलाओ को इज़्ज़त देने का ये मतलब कतई नही होता की, उन्हे सिर्फ़ नौकरी मिलें।  घर मे रहकर घर-परिवार को संभालना, बच्चो की परिवरिश करना और उन्हे योग्य बनाना सबसे बड़ी नौकरी है।  पुरुष परिवार के "आज" के लिए मेहनत करते है तो, महिलाएं परिवार के कल (भविष्य) के लिए मेहनत करती है।  किसी भी माता-पिता के लिए योग्य बच्चे सबसे बड़ी कमाई है और यह कमाई माता की देन होती है।  सिधे शब्दो मे कहें तो महिलाओ के कार्यो, प्रयासो को इज़्ज़त देना ही उनके लिए सबसे बड़ी इज़्ज़त है। 
          एक दूसरे पर ग़लत मानसिकता का आरोप लागने से बेहतर होगा की, एक साथ मिलकर अपनी ज़िम्मेदारियो को स्वीकार किया जाए। महिला और पुरुष 'इंसान' नामक सिक्के के दो पहलू है, और किसी भी सिक्के के पहलुओ को अलग कर देने से दोनो पहलुओ के साथ-साथ, वह सिक्का भी मूल्यहिन हो जाता है!                         

                                                    -----के.कुमार 'अभिषेक'

MY POEM--


व्यवसायिकरण के इस दौर मे,
मेरा बदल रहा है पैगाम।

चंद रुपयो की खातिर,
आज हो रहा है "शब्द" निलाम।।

                                       कांप रही है रूह कलम की,
                                       तड़प रहा है स्याह।
                                       खुद के शब्द बाण से घायल,
                                       निर्जीव कागज से भी निकल रही है आह। 

साहित्य के सौन्दर्य का हो रहा चिर-हरण,
स्वयं की प्रतिष्ठा का स्वयं कर रहे अपहरण।
अश्लिलता, अशिष्टता, नंगेपन का हो रहा प्रचार,
समाजिकता का पाठ पढ़ाने वाले,
स्वयं कर रहे, समाजिकता से दुराचार !!

                                             भ्रष्टाचार के आगोश मे,
                                             इंसानियत और मानवता का हो रहा हास्।
                                             स्वार्थ और लालच की आग मे ,
                                            भाषा का भी होने लगा है विनाश !!

असभ्यता  के आलम मे,
दाँव पर लगा है ईमान !
समझ नही, किससे बचाए दामन?,
कौन नही है बेईमान ?!!

                                          अब तो खुद से ही डरने लगा हूँ,
                                          कहीं हो ना जाउ बदनाम !
                                          क्योकी दोस्तों, चंद रुपयो की खातिर,
                                          आज हो रहा है, शब्द नीलाम !!


                                                             ---आपके आशिर्वाद का आकांक्षी
                                                                  KKUMAR 'ABHISHEK'

धर्म :--मानव विकाश" नही, "मानव विनाश"

मुझे नही लगता की आज कोई भी धर्म अपने मूल रूप मे हमारे समाज मे रह गया है।  हर धर्म अपने मानवीय उदेश्यों से भटक गया है, जिसके लिए चंद स्व-कथित धर्म संचालक ज़िमेदार हैं।  इन्होने अपनी विकृत मानसिकता के प्रभाव से धर्म को मानव पतन का कारण बना दिया है। अपने नकारात्मक सोच और असामाजिक उदेश्यों के साथ धर्म को परिभाषित करके, मानवता के विभाजन का कारण बना दिया है। आज वास्तव मे हर धर्म मानवता के विभाजन का कारण भर रह गया है। सभी धर्मों की स्थापना मानवीय मूल्यों के साथ मानव विकाश है, लेकिन आज हर धर्म इस हद तक गंदी मानसिकता वाले लोगो की जद मे आ चुके हैं की, उदेश्य "मानव विकाश" नही, "मानव विनाश" रह गया है।

दहेज प्रथा:- MY VIEW

1.....
दहेज प्रथा की शुरुआत, शादियों मे मिलने वाले उपहारों से हुई थी। लड़की वाले विवाह के उपरांत विदाई के समय अपनी क्षमतानुसार उपहार देते थे।  उपहार अपनी मर्ज़ी से देते थे, लड़केवालो की तरफ से कोई माँग नही होती थी।  वैसे भी उपहार माँगा नही जाता और जो माँगा जाय वो उपहार नही होता है।  ....{{शादियों मे उपहारों की स्वीकृति हमारे क़ानून मे भी है)) उस समय दहेज जैसी कोई बात नही होती थी, लेकिन समय बितने के साथ लड़के वाले उपहारों की तुलना करने लगे।  "किसके बेटे को कितना उपहार मिला" ऐसा चर्चा होने लगा।  इसे समाज मे अपनी इज़्ज़त का प्रतिक बना दिया गया। ऐसी  सोच पैदा हो गयी  की, शादियों मे मिलने वाले दहेजों से ही लड़के की योग्यता और समाज मे परिवार की प्रतिष्ठा  तय होने लगी। यहाँ से दहेज प्रथा की शुरुआत का माहौल तैयार हुआ।  लोगों ने बेशर्मी और मानवता की सारी हदें पार कर अधिक से अधिक उपहारों की माँग रखनी शुरू कर दी। उपहारों के पिछे छिपी भावनाओ और प्रेम को लोगों ने सामाजिक दिखावे के प्रयास मे रौद्ना शुरू कर दिया। यह समय था, जब इज़्ज़त के लिए लोग अपनी जान भी दे देते थे।
                                               समय गुजरने के साथ लालच भी जुड़ गया। लड़कों को किसी व्यापारिक वस्तु की तरह समझा जाने लगा। व्यापारिक वस्तु की तरह लड़को की किमते तय होने लगी। किमते तय करते समय जिस तरह किसी व्यापारिक वस्तु की लागत खर्च ध्यान मे रखा जाता है, उसी तरह लड़को का पालन-पोषण, शिक्षा और अन्य लागत खर्चों को भी ध्यान मे रखा जाने लगा ! पद तो ब्रांड बन गये...इंजीनियर, डॉक्टर , व्यापारी, किसान की अपनी "ब्रांड वैल्यू " तय कर दी गई।  ....सिधे शब्दो मे लड़के बिकने लगे। जिसके पास जितना पैसा, उतना अच्छा दूल्हा खरीदने का मौका था।

2..... दहेज प्रथा इस देश के हर नागरिक की समस्या है, क्योकि लड़के वाले भी हम हैं, और लड़की वाले भी हम हैं।  यह एक मिठाई है, जो कभी तीखा लागत है, और कभी मीठा।  जब मिठा लगता है, तो ज़्यादा से ज़्यादा खाना चाहते हैं और  जब तीखा लगता है तो दूर भागते है।  दहेज लेना पड़ता है तो अधिक से अधिक लेने की इच्छा रखते है, जब देना पड़ता है तो कम से कम मे काम निकालने  की कोशिस करते है।  हमे स्वयं को बदलना होगा। समस्या हमारी वजह से पैदा होती है और उस समस्या से पीड़ित भी हम ही होते है।  समस्या के लिए ज़िमेदार भी हम है, समस्या को समाप्त करने की ज़िमेदारी भी हमे उठानी होगी....

3 ...
आज दहेज उसी तेज़ी से बढ़ रहा है, जिस तेज़ी से देश मे महँगाई बढ़ रही है।  आज-कल दूल्हे भी बहुत महँगे हो गये है।  मेरे जैसा कोई फ्री मे मिल जाए, तो लोग कहेंगे...ज़रूर सड़क पर पड़ा मिल गया है (सड़क छाप दूल्हा)  आज लड़की का बेहतर पिता होने की पहली शर्त है, अमिर पिता होना।  ग़रीबों को किसी भी लड़की का पिता होने का कोई हक ही नही होना चाहिए !! पहले अमिर बनो फिर, लड़की का पिता बनो!

4 ......

दहेज प्रथा मे स्पष्ट तौर पर माता-पिता ज़िमेदार नज़र आते है, लेकिन गहराई से देखने पर कई बड़े कारण है। आज दहेज प्रथा समाज मे दिखावे के लिए भी ज़रूरी है।  अगर आप दहेज ना लें तो, आपके गुण पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।  ..."लड़के मे कमी है" जैसी अफवाहे उडेगीं।   
                               इसके लिए बड़ी-बड़ी उपहार की माँग करने वाले, हम लड़के भी कम ज़िमेदार नही हैं। शादियों की फ़िज़ूलखर्ची भी इसका एक बड़ा कारण है।  एक दिन के लिए ही सही, हम महाराज दिखना चाहते है।  दहेज कहाँ से शुरू हुआ? क्यों शुरू हुआ? इसकी शुरुआत किस तरह हुई? यह किस तरह हमारे समाज मे फला-फूला?...इन बिंदुओं पर चिंतन के बिना दहेज प्रथा पर कोई भी राय अधूरा ही होगा

INDIAN POLITICS- A BAD TRUTH

पुराने चस्मे से केजरीवाल की राजनीति समझने का प्रयास "बीरबल की खिचड़ी पकाने जैसा है!  नेताओं को रणनीति और मीडिया को आपबीति  बदलनी पड़ेगी !पुराने भवन की जगह नयी इमारत बनाने के लिए, तोड़-फोड़ हो रही है.…।  जनता की आवाज़ से दूर रहने वालों को यह अच्छा नही लग रहा। पहले राजनीति का यही तरीका था,.."तुम मुझे ग़लत कहो-मैं तुम्हे ग़लत कहूँगा" "तुम मुझे चोर कहो-मै तुम्हे चोर कहूँगा"… सिर्फ़ कहने भर से जनता वोट दे देगी, बाकी करेंगे तो वही, जो होता आया है।  दूसरा और एक अहम सत्य यह भी है की, हमारे चुनावों मे आधे (50-55%) के लगभग मतदाता ही वोट देते हैं, इसमे से 80% वही लोग  होते हैं, जो किसी न किसी पार्टी के कट्टर समर्थक होते हैं, इन्हे कोई फ़र्क नही पड़ता की उमिदवार कैसा है? वे उसको जिताना अपना कर्तव्य समझते हैं! तथस्थ मतदाता जो, सही उमिदवार का चयन कर सकते हैं, वे गंदी राजनीति से रुष्ट होकर मतदान नही करते हैं और  इसका फायदा  भी राजनीतिक दलों को भरपूर मिलता रहा है! चुनाव परिणाम "क्षेत्र मे समर्थकों की संख्या" पर निर्भर करता हैं! पहली बार दिल्ली ने दिखाया  की, अगर अच्छे राजनेता हों तो, तथस्थ मतदाता भी घरों से निकल कर वोट डालने जा सकते हैं। ....मेरा हमेशा से यही मानना रहा है की, जो मतदाता योग्य व्यक्ति को जीता सकता है, वह चुनाव के दिन टीवी  पर चुनावी रिपोर्ट देखता है, या चाय की दुकानों मे दूसरों को देश की राजनीति समझाता मिलता है,,....  उसे लोकतंत मे अपनी  ज़िमेदारी का तनिक भी अहसास नही होता  लेकिन  दूसरों को जिमेदारी जरुर सिखाता है ! किसी भी लोकतंत्र की सफलता जन-भागीदारी से तय होती है !...उमिद है की शायद देश की राजनीतिक बदलाओं का असर उस जनता पर भी पड़ेगा, जो नेताओं को गाली देने मे तत्परता तो काफ़ी दिखती है, नेताओं को गैर-ज़िमेदार होने का आरोप तो बहुत लगाती  है, लेकिन लोकतंत्र मे अपनी ज़िमेदारियों का ज्ञान नही है! अगर हम लोकतंत्र मे 'मत' नही देते हैं, तो इसका यही मतलब है की हमने अपना (खुद का) कोई नेता नही चुना है, ऐसे मे नेताओं को गाली  देने का कोई हक नही बनता है.!  हमे कोई हक नही होगा कि हम उनसे कुछ  उमिद रखें ! ये हक सिर्फ़ मतदान करने वालों को होगा

FIGHT FOR POLITICAL CHANGE

लड़ाई मे दुश्मन कितना भी मजबूत हो, लेकिन सामने हो..यही अच्छा होता है! दिल्ली मे आम आदमी पार्टी जो लड़ाई लड़ रही है, मुझे अब लगने लगा है की कुछ अच्छा ही होगा ! जिस तरह सोमनाथ भारती जी की खिलाफत की जा रही है, लोग उन्हे ग़लत साबित करने के लिए तर्क से ज़्यादा कुतर्क का सहारा ले रहे हैं ! दिल्ली मे 'देह और नशीले पदार्थों के  धंधे ' की स्थिति से हर कोई वाकिफ़ है, लेकिन गंदी राजनीतिक विवशता है की वे 'देह और नशीले पदार्थों के व्यापार ' का भी समर्थन  करने से नही चूक रहे हैं! मुझे शर्म आती है, लेकिन यही सच है की मेरे कई मित्र 'जनहित' की बात करते है, और जब जनहित का काम हो रहा है तो जनहित के मुद्दों पर राजनीति करते पाए जाते है,! मुझे कोई बताए की ऐसा कौन मंत्री होगा, जो 12 बजे रात को जनता के काम करता है, यहाँ तक की पूरी रात अपनी नींद बर्बाद करके मामले पर कड़ी निगरानी रखता है! आज देश किस तेज़ी से नैतिक पतन की तरफ बढ़ रहा है की हम आज देह और नशा व्यापारियों का समर्थन कर रहे हैं, राजनेताओं पर मुझे कोई आश्चर्या नही है, क्योकि गंदी राजनीतिक मजबूरियाँ समझा आती है, लेकिन हम क्यो मजबूर है? हमे क्या मिल रहा है? क्या हम अपने समर्थित  नेताओं के लिए अपने नैतिक मूल्यों की बलि नही चढ़ा रहे हैं? कुछ भी हो, इस मामले मे जिस तरफ से चौतरफ़ा हमला हुआ है, यह दर्शाता है की सारे दुश्मन सामने आ गये है, सबके चेहरे से सराफ़ात का नकाब हट रहा  है,, देल्ही पुलीस  की कर्महीनता, महिला आयोंग की बिकाउ पारदर्शिता, सरकार की शार्मविहीनता, और  नेताओं की संलिप्तता ......सबका सामना करना होगा, आम आदमी पार्टी को!

जातिगत आरक्षण

"जातिगत आरक्षण" जाति के नाम पर भीख देने के बराबर है ! ऐसा करके लोगों को "भिखमंगा" बनाया जा रहा है ! उन्हे कामचोर, कर्महीन, मूफ़्तखोर और परपोशी बनाया जा रहा है! जातिगत आधार पर किसी को "छोटा" मानना उतना ही ग़लत है, जितना किसी को बड़ा मानना ! किसी को "हरिजन" मानना उतना ही ग़लत है, जितना किसी को "राजपूत" मानना ! बहुत से लोग अंबेडकर को जातिगत आरक्षण का जनक मानते हैं, अगर ऐसा है तो, अंबेडकर ने ग़लत किया था ! उन्होने यह हमेशा के लिए तय कर दिया था की, "तुम पिछडे हो, और हमेशा रहोगे" .....क्योकि जब भी "जातिगत आरक्षण" की बात होगी, लोगों को पिछ्डा, कमजोर, शक्ति विहीन साबित करने का प्रयास होता रहेगा ! उन्हे भले ही थोडा धन मिल जाए, लेकिन हमारा समाज कभी बराबरी का अधिकार नही देगा ! सबसे बड़ी बात..."अपने आप को कमजोर समझना ही इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी है" ! ज़रूरत है की इन लोगों को जातिवाद के आईने से देखना हम बंद करें, और उन्हे याद दिलाया की वे भी इंसान है, उनके पास भी बराबर की शारीरिक क्षमताएँ हैं, उन क्षमताओं का प्रयोग कर वे भी शिखर पर पहुच सकते है! उन्हे आत्म-विश्वास की ज़रूरत है की, वे कमजोर नही है, वे बिना किसी मदद भी सफलता पा सकते हैं! ....अगर हम अंबेडकर का ही उदाहरण लें, तो क्या जातिगत आरक्षण के आधार पर उन्हे "भारत रत्न" मिला था? अंबेडकर को जो कुछ मिला, उनकी कर्म की वजह से मिला था, ..किसी ने भीख मे नही दिया था !.......लोग भीख का कटोरा जितना जल्दी त्याग करें, उतना ही उनके लिए हितकर होगा ! "ग़रीबी" हर जाति मे है, इसे किसी जाति की पहचान बनाना ग़लत है, ....सफलता के लिए मेहनत का कोई विकल्प नही हो सकता है, मेहनत से ही ग़रीबी को दूर भगाया जा सकता है! सबसे बड़ी शर्म की बात देश के उन चंद नेताओं के लिए है, जो अपने आपको दलितों का मशिहा कहते हैं, दलित के नाम पर राजनीति करके राजसुख भोगने वालों ने आरक्षण का "लालीपोप" देकर लोगों को सफलता से भ्रमित करने का काम किया है,....इनकी यही कोशिस रही है की, इन्हे कमजोर, और शक्तिहीन ही बनाए रखा जाए, क्योकि अगर ये मजबूत हो गये तो....फिर ये राजनीति किसके नाम पर करेंगे ! लोगों को दलित साबित करके, पिछड़ा साबित करके....कमजोर करने और आधुनिकता से दूर रखने का प्रयास किया गया है, .............आज ज़रूरत है की, जाति को नही, अपने व्यक्तित्वा को अपनी पहचान बनाया जाय, अपने कर्म को अपनी पहचान बनाया जाय ! पूरी दुनिया बदल रही है, लेकिन हम आज भी गंदी मानसिकता से ग्रसित नेताओं की चाल मे फंसकर अपने आपको जातिगत बंधनो मे जकड़े हुए है, ...जातिगत आरक्षण की ऐसी घुटि पीला दी गई है की हमे जातिवाद भी अच्छा लगने लगा है, और खुद अपने आपको कमजोर, दलित, और ना जाने क्या-क्या साबित करने मे लगे हुए है! अरे...इंसानों अब तो शर्म करो....भीख माँगना छोड़ो.....आगे बढ़ों, कर्म करो! -----के कुमार "अभिषेक"

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...