Friday, 5 December 2014

शिक्षित कौन है?

                                                                                                        -K.Kumar 'Abhishek'

यह ब्लॉग दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित एवं सप्ताह के सर्वक्षेष्ठ ब्लॉग के रूप में सम्मानित है 



एक प्रश्न जो पिछले काफी दिनों से मुझे परेशान किये जा रहा है, शिक्षित कौन है? संभव है की यह प्रश्न कई लोगों के लिए अत्यंत हास्यास्पद हो, क्योंकि बेहद सामान्य अवधारणा है की वह इंसान जो हमारी शिक्षा पद्धति के अनुसार अध्ययन के पश्चात परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त कर, 'प्रमाणपत्र' का हक़दार बनता है, वही शिक्षित है! लेकिन जब भी हम शिक्षा के बुनियादी उदेश्यों और ज्ञान के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, इस प्रश्न का हल ढूढ़ने का प्रयास करते है, देश के शैक्षणिक वातावरण कि एक चिंताजनक तस्वीर परिलक्षित होती है! आज जिस तरह से हमारे समाज में सामाजिक,आर्थिक, व्यवहारिक, व्यवसायिक,नैतिक और धार्मिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है ! जिस तरह अपने आपको शिक्षित कहने वाले लोग ,धोखाधड़ी, जालसाजी,अपहरण, बलात्कार और विभिन्न समाज व् राष्ट्र को कलंकित करने वाले भ्रष्ट् कर्मो में लिप्त हो रहे हैजिस तरह से अपने आपको 'ज्ञानी' कहने वाले लोग..लोभ, लालच, और  द्वेष जैसे मानवीय अवगुणो के प्रभाव में लगातार मानवता और इंसानियत को शर्मसार कर रहे हैं, .....मुझे बेहद आश्चर्य है कि, ऐसे लोग शिक्षित कैसे हो सकते है? जबकि  ऐसा  अनैतिक और घृणित ज्ञान किसी भी कक्षा के किसी भी पुस्तक में नहीं मिलता है!

आज हम अपनी शिक्षा पद्धति के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न विषयों में बड़ी-बड़ी डिग्रियों के प्रमाणपत्र प्राप्त करते है, और उन्ही प्रमाणपत्रों के आधार पर हम सरकारी, अर्द्धसरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में प्रतिनियुक्त होते हैं! प्रतिनियुक्ति के पश्चात हम उन्ही भ्रष्ट कार्यों में लग जाते है, जिसकी मनाही हमारी पाठ्य पुस्तकों में की गयी है! इस तरह हम लगातार पाठ्य पुस्तकों से प्राप्त 'ज्ञान' को दरकिनार कर असामाजिक, अनैतिक और अपराधिक कार्यशैली को जीवन का आधार बना लेते है, और जब भी शिक्षा की बात आती है...प्रमाणपत्रों को आगे कर अपने आपको शिक्षित भी साबित कर लेते हैं! स्पष्ट है की हम भारतीय सिर्फ और सिर्फ प्रमाणपत्रों में ही शिक्षित है ! हमारी शिक्षा सिर्फ और सिर्फ कागज के कुछ पन्नों का स्वरुप भर है! पाठ्यक्रम में सिखाई अच्छी बातों, मानवीय मूल्यों, और आदर्श जीवन के सिद्धांतों के लिए हमारे वास्तविक जीवन में कोई जगह नहीं है! उन बातों के लिए हमारे व्यवहारिक जीवन में कोई जगह ही नहीं है! परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए हमें चिंतन करना होगा की ...आखिर इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार कौन हैं? हमें समझने का प्रयत्न करना होगा कि, जिस शिक्षा ने एक इंसान के रूप में हमारा मह्त्व सिद्ध किया , वही शिक्षा हमारे जीवन  में महत्वहीन कैसे हो गई ? क्यों 'शिक्षा' सिर्फ प्रमाणपत्र आधारित औपचारिकता बन के रह गयी?

इस सन्दर्भ में हालात कि वास्तविकता और परिस्थिति कि गंभीरता को समझने का प्रयत्न करें तो, हम पाएंगे कि आज हमारे भारतीय समाज में शिक्षा का उदेश्य 'ज्ञानोपार्जन' नहीं, अपितु 'धनोपार्जन' हो गया है! आज छात्र, अभिभावक, और गुरु ...तीनो के लिए शिक्षा का औचित्य सिर्फ और सिर्फ प्रमाणपत्रों कि प्राप्ति रह गया है, जिससे नौकरी या, व्यवसाय के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके! कड़वी परन्तु वास्तविक सचाई है कि, आज हमारे जीवन में पाठ्य पुस्तकों कि सिखाई गयी बातों का कोई महत्व नहीं है! एक इंसान के रूप में हमारे कर्तव्यों और सामर्थ्यवान जीवन के सिद्धांतों कि जो सिख हमारी पुस्तकों में मिलती है, आज छात्रों के लिए ऐसे सिर्फ और सिर्फ परीक्षा कि वस्तु मात्र है! आज छात्र सिर्फ पाठ्य पुस्तकों को रट्टा मार रहे है, जिससे वे परीक्षा में पूछे गए सवालों का सही जवाब देकर अच्छे अंक प्राप्त कर सकें.! एक बार परीक्षा समाप्त हुई ...पुस्तकों कि पढ़ी गयी बातों को हम अपनी सोच के दायरे से बाहर निकल फेंकते है ..!



आज इस देश के हर नागरिक को इस विषय कि गंभीरता को समझना होगा, मुख्य रूप से अभिभावकों को अपनी सोच को लेकर बेहद गंभीर चिंतन करने कि आवश्यकता है.! आज परिस्थितियां निश्चय ही सामान्य दिख रही है..लेकिन हमारे देश में एक ऐसा वर्ग भी तैयार हो रहा है, जिसका मानना है कि जब से भारतीय समाज में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है, जैसे-जैसे लोग शिक्षित हुए है...देश में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी-जालसाजी, और हर प्रकार कि अपराधिक, असामाजिक, अनैतिक गतिविधियाँ बढ़ी है! लोगो में लोभ,लालच, द्वेष-जलन, अहंकार, जैसे अमानवीय अवगुणों का प्रभाव बढ़ा है! 'शिक्षा' ने हमारे समाज को पथभ्रष्ट करने का कार्य किया है! विश्वास कीजिये..आंकड़ें  बेहद मजबूती के साथ इस अवधारणा को बल भी देते नजर आते है! हकीकत तो यही है कि जिस शिक्षा ने एक इंसान के रूप में हमें मानवीय विकास कि नयी राह दिखाई, उसी शिक्षा को हम दिशाहीन बना चुके हैं!    




'महिला सशक्तिकरण' और 'पुरुष प्रभुत्व' का संघर्ष

                                                                                      -K.Kumar 'Abhishek'


भारतीय समाज प्राचीन काल से पुरुष प्रभुत्व का केंद्र रहा है! भारतीय परिवारों में पुरुषों की सत्ता चलती आयी है ! यही कारण हैं कि, अपने प्रभुत्व का नाजायज इस्तेमाल कर महिलाओं को प्रताड़ित करने और समाज कि मुख्य धारा से वंचित करने का आरोप भी पुरुषों पर लगता रहा है! वास्तव में जिस तरह हमारे परिवार और समाज में महिलाओं को प्रताड़ित किया गया, उन्हें उपभोग की वस्तु समझा गया, शिक्षा और विकास की संभावनाओं को सिमित करते हुए अनेकों पाबंदियां लगाई गयी, परिवार के लिए बोझ और अपनी प्रतिष्ठा पर खतरे के रूप में देखा गया, निश्चय ही आरोपों की प्रमाणिकता काफी मजबूत हो जाती है, विशेषकर तब, जब पुरुष ही परिवार और समाज में निर्णायक भूमिका में थे ! आज हम इस सत्य से इंकार नहीं कर सकते कि, अपनी दकियानूसी नीतियों कि वजह से हमने हज़ारों लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, कल्पना चावला, सुनीता विलयम्स, सानिया मिर्जा, और  साइना नेहवाल को घरों में कैद करने का काम किया! आज जब 'वैश्विक विकास' की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे में  भारतीय महिलाओं कि दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति' एक राष्ट्र के रूप में हमारी संभावनाओं को कमजोर करती हैं ! प्रश्न अहम है कि, जिस देश कि आधी आबादी आज भी घरों से बाहर निकल कर अपनी क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं कर पा रही है..वह देश विकसित राष्ट्रों का मुकाबला कैसे कर सकता हैं?  अच्छी बात यह हैं कि, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय महिलाओं कि दशा और दिशा एक राष्ट्रिय मुद्दा बना है ! 'मिडिया' के साथ-साथ समाज का बुद्धिजीवी  वर्ग भी महिलाओं की  दुर्दशा के प्रति संवेदनशील हुआ है, फलस्वरूप सरकार भीं गाहे-बेगाहे नींद से जागती नजर आयी है! बड़े बदलाओं के लिए समाज मे लैंगिक भेदभाव को लेकर चेतना आयी है, और उस चेतना की वजह से 'महिला सशक्तिकरण' का नारा बड़ी प्रबलता के साथ बुलंद करने का प्रयास किया गया है! वास्तविक अर्थों में, भारतीय महिलाओं का सशक्तिकरण, भारतीय समाज का सशक्तिकरण है ! एक सशक्त महिला के साथ सशक्त समाज और सर्वोत्कृष्ट भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब महिला सशक्तिकरण का यह प्रयास, यह आंदोलन विचलित हुए बिना ...अपने उदेश्य कि तरफ गतिशील रहे

आज जिस तरह से देश में परिवर्तन की नयी उमीदें जन्म लेने लगी हैं, वास्तव में कल के भारत कि एक खूबसूरत तस्वीर उभरती नजर आती है, एक ऐसे भारत कि ..जहाँ स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर, एक दूसरे के प्रति पूर्ण सम्मान दर्शाते हुए..समाज और राष्ट्र को नयी उचाईयों पर ले जाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर रहे हों ! लेकिन जैसा कि, हम सभी जानते है..किसी भी आंदोलन कि सफलता में आंदोलनकारियों का अतिउत्साह, अनावश्यक वाद-विवाद, उग्र मानसिकता, और दिशाहीन विचारधारा  ...सबसे बड़ी बाधा साबित होती है! पिछले कुछ वर्षों में जैसे-जैसे देश कि नयी पीढ़ी इस आंदोलन से जुडी है, हमारी असंयमित सोच और अनियंत्रित कार्यशैली ने इस आंदोलन कि धार को कमजोर करने का कार्य किया है ! हमारे देश के अतिउत्साही युवावर्ग (पुरुष-महिला) ने मानवीय और सामाजिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष को एक दूसरे के सामने ला खड़ा किया है! बेहद संकुचित सोच के तहत 'महिला सशक्तिकरण के नाम पर स्त्री-पुरुष सबंधों के मूल तत्वों पर चोट पहुचाई जा रही !  ऐसे में कहीं कहीं एक अहसास होता है की परिवर्तन की यह धारा भी सामाजिकता के विपरीत दिशा में गतिशील होने लगी है! निश्चय ही यह स्थिति एक आदर्श भारतीय समाज की अवधारणा को चोट करती है! उस स्थिति की कल्पना भी बेहद भयावह है की हम अपनी माताओं-बहनो के विरुद्ध खड़े हो,..और माताएं-बहने हमारे विरुद्ध खड़ी हों..! लेकिन दुर्भाग्य की ऐसा हो रहा हैं...और हम अब तक सिर्फ इसलिए चुप हैं,क्योकि 'महिला विरोधी साबित' होने का डर सता रहा हैं ! हमें अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, 'महिला सशक्तिकरण' को दिशाहीन होने से रोकना होगा !

हम इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकते की, भारतीय समाज में महिलाओं को वह सम्मान नहीं मिला...जो मिलना चाहिए था, लेकिन अगर तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो..इस तथ्य से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि, आज की तुलना में प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों का सम्मान अधिक था ! सती प्रथा और विधवा विवाह को लेकर समाज की नीतिया निश्चय ही अत्यंत अमानवीय थी...लेकिन इन कुरीतियों के बावजूद लोगों की भावनाएं महिलाओं/लड़कियों के लिए बेहद संवेदनशील थी ! वास्तव में यह महिलाओं के प्रति प्रेम-सम्मान ही था कि, पुरुष अत्यधिक परिश्रम वाले कार्यों कि जिम्मेदारी स्वयं लेते थे ! आज भी पुराने लोग किसी महिला को खड़ा देखकर..अपनी जगह दे देते हैं, उन्हें दुःख में देखकर स्वयं पीड़ा महसूस करने लगते है ! ..लोग घर की बहुओं को परिवार की मर्यादा का प्रतिक ...और बेटियों को 'शान की पगड़ी' मानते थे! आज जब हम स्त्री सम्मान की बात करते हैं, हमें स्वयं से पूछना चाहिए,... क्या इतना सम्मान आज हम महिलाओं को दे पा रहे हैं? अभी हालात यह है की किसी लड़की की लुटती इज्जत पर तालियां बजने वाले ही इस समाज के बहुसंख्यक है...जिनमे थोड़ा-बहुत आदर्श बचा भी है... वे कुछ करने की जगह, सरकार और समाज को गाली देना ज्यादा उचित समझते हैं! प्रतिष्ठा की जगह पैसे ने ले ली है...आत्म सम्मान कौड़ियो के भाव बिकने लगा है...ऐसी स्थिति में हम स्त्री सम्मान की कल्पना भी नहीं कर सकते ! 
जहाँ तक प्रश्न..,प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं को चारदीवारी में कैद करने और विकास से वंचित रखने का है '', निश्चय ही आज जिस तरह से महिलायें समाज कि मुख्यधारा से अलग कट गयी है, जिस तरह उनका सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और व्यवहारिक विकास लगभग रुक सा गया था...आरोप पूर्णतः प्रमाणित है! लेकिन इसी तथ्य का दूसरा पक्ष यह भी है कि प्राचीन भारतीय परिवारों में बहु-बेटियों के प्रति यह प्रेम ही था ...जो उन्हें घर में ही सुरक्षित देखना चाहता था ! वे नहीं चाहते थे कि ...उनकी पुत्री घर से बाहर निकले, और किसी की बुरी नजर/नियत कि शिकार हो जाये ! यहाँ हमें समझना होगा कि ...यह बेहद सामान्य भावना है कि हम उन्ही वस्तुओं को छुपाते है, जिनसे हमें ज्यादा प्रेम होता है...जिन्हे हम खोना नहीं चाहते है!
जब हम उन परिस्थितियों को आज के सन्दर्भ में देखने का प्रयास करते है,..कहा जा सकता है की माता-पिता का प्रेम दर्शाने का तरीका भारी पड़ गया ! लेकिन तत्कालीन समाज की स्थिति में माता-पिता की चिंताओं और प्रेम भावना पर प्रश्नचिन्ह लगाएं...ये कतई उचित नहीं होगा ! उनकी नीतियां गलत साबित हुई है..लेकिन उनकी भावनाएं १००% शुद्ध थी..!
साथ हमें गौर करने की आवश्यकता हैं कि, प्राचीन भारतीय परिवारों में पुरुष ही घर से बाहर निकल कर जीविकापार्जन किया करते थे, जबकि महिलायें घर में रहकर परिवार, बच्चों को सँभालने की जिमेदारी होती थी! यह दौर था, जब कृषि ही आय का सबसे बड़ा साधन था और लोगों का मानना था कि, कृषि जैसे कठिन शारीरिक परिश्रम वाले कार्य महिलायें/लड़कियां सहजता से नहीं कर पाएंगी ! तब राजा या, बड़े धनवानों के यहाँ नौकरी तो होती थी...लेकिन उस नौकरी में सम्मान कम..और जिल्लत ज्यादा थी ! दास प्रथा और 'बधुआ मजदूरी' हमारे प्राचीन भारतीय समाज कि कड़वी हकीकत हैं!  इतिहास के तथ्यों को हम चाहें जितना तोड़-मरोड़ लें....लेकिन इस सत्य को नहीं बदल सकते कि हमारा देश हज़ारों वर्षों तक किसी किसी दुष्ट शासक का गुलाम था ! समाज आज की तरह सुरक्षित था..और ही इतनी रोजगार कि संभावनाओं से भरा था ! शासकों के लिए गरीबों कि इज्जत से खेलना शौक हुआ करता था...बावजूद, हमारे पूर्वजों ने हमारी माताओं-बहनों कि अस्मितां पर आंच नहीं आने दी !

 आज जिस तरह महिला सशक्तिकरण कि आड़ में इतिहास कि नकारात्मक विवेचना कर समाज में द्वेष फ़ैलाने का प्रयास किया जा रहा हैं, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ! हमें ऐतिहासिक तथ्यों को आज के सन्दर्भ में देखने से बचना चाहिए...! बेहतर होगा की हम तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार ही पारिवारिक और सामाजिक नीतियों की विवेचना करें ...तभी हम सत्य के निकट पहुंच पाएंगे !
 वास्तव में आज हम अपने इतिहास और वर्तमान कि नकारात्मक विवेचना कर समाज को दूषित कर रहे हैं..और इस प्रयास में हम व्यवहारिक जीवन के मूल सिद्धांतों पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहे हैं! पिछले दिनों एक सवाल बड़ी चर्चा में था,  भारतीय परिवार में विवाह के पश्चात महिलाओं को 'सरनेम' क्यों बदलना पड़ता है? पत्नी ही पति का सरनेम अपनाती है...पति अपनी पत्नी का क्यों नहीं ?..... वास्तव में जिस तरह से इस प्रश्न को 'महिला सशक्तिकरण' का मुद्दा बनाया गया...चिंतन करना होगा कि यह आंदोलन कहाँ जा रहा हैं ! जहाँ तक 'सरनेम' का प्रश्न है,  हमारी सामाजिक व्यवस्था के तहत विवाह के पश्चात पत्नी को पति के घर जाना होता है , ऐसे में स्थानीय परिचय के लिए 'ससुराल पक्ष' के 'पारिवारिक पहचान' (सरनेम) को अपने नाम के साथ जोड़ना आवश्यक होता है! कल्पना करें कि, अगर शर्मा परिवार की बहु श्रीमती वर्मा हो...क्या स्थानीय परिचय के लिए यह सहज स्थिति होगी?  भारतीय कानून के अनुसार भी हर महिला ससुराल पक्ष की पारिवारिक सदस्य ही मानी जाती है, ...ऐसे में अपने परिवार कि पहचान को अपनाना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है ! ....
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट पता चलता है की महिला सशक्तिकरण का यह किस हद तक दिशाहीनता का शिकार हो चूका है ! अगर हम वास्तव में अपनी माताओं-बहनो-बेटियों को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं, उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना चाहते है तो, 'महिला सशक्तिकरण' को दिशाहीन होने से रोकना होगा !.आवश्यकता हैं कि भारतीय समाज में महिलाओं कि मुख्य समस्याओं ,.जैसे .दहेज़ प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, अशिक्षा, असुरक्षा के खिलाफ आवाज उठाई जाये! साथ ही हमें समझना होगा कि,  महिलाओं की इस भयानक दुर्दशा के लिए हम सभी (स्त्री-पुरुष) जिम्मेदार है और  हमें एक-दूसरे पर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारियों से भागने की आदत छोड़नी होगी ! हम पुरुषों को अपने परिवार और समाज में महिलाओं के वजूद को स्वीकारना होगा, और उन्हें आगे बढ़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का सम्पूर्ण अवसर उपलब्ध करना होगा ! हमें समझना होगा की,  महिलाओं को सम्मान देने का ये मतलब नहीं होता कि उन्हें सिर्फ नौकरी ही मिलें' ! आत्मसम्मान के साथ परिवार को संभाल कर, और बच्चों को उच्च कोटि कि परिवरिश देकर भी वे समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का सर्वक्षेष्ठ निर्वाह कर सकती है! इस मामले में पश्चिमी देशों से सबक लेने कि जरुरत है, जहाँ माता-पिता घरों से बाहर निकलकर पैसा कमाने जाते हैं, और बच्चे बेहतर परिवरिश के आभाव में अमर्यादित और अशिष्ट हो जाते है! सीधे शब्दों में कहें तो, परिवार और समाज के प्रति महिलाओं के प्रयासों और योगदान को इज्जत देना ही, सही अर्थों में स्त्री सम्मान है!
 
 दूसरी तरफ हमारी माताओं-बहनो को भी संजीदगी के साथ आगे बढ़ना होगा! आज पुरुषों कि हर अच्छी-बुरी आदत कि बराबरी के प्रयास को 'महिला सशक्तिकरण' समझा जाता है! हमें समझना होगा कि अपने पति के साथ नशे में झूमने वाली महिला से ...पति का नशा छुड़ाने वाली महिला कहीं ज्यादा सशक्त होगी ! पुरुषों कि गलत आदतों कि बराबरी कि हक़ मांगने वाली औरतों कि अपेक्षा....उन्हें सही रास्तो पर लाकर, समाज और राष्ट्र को निर्णायक दिशा देने वाली महिला ज्यादा सशक्तता का परिचायक है! वास्तव में ''महिला सशक्तिकरण'' कि यही परिभाषा 'सामाजिक सशक्तिकरण' के उदेश्यों को पूरा कर ...भारत के नव-निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है!  स्त्री और पुरुष 'इंसान' नामक सिक्के के दो अलग-अलग पहलु है...इनमे से किसी एक पहलु को अलग कर देने से ..दोनों पहलुओं के साथ वह सिक्का भी मूल्यहीन हो जायेगा ! इंसान के दोनों रूपों में युद्ध सी स्थिति पैदा कर... तो महिलाएं सशक्त होंगी और ही यह समाज सशक्त होगा! अगर किसी को ऐसा लगता भी है...उसे 'सशक्तता' और 'निःशक्तता' के अंतर को समझना होगा ! सच यही है कि स्त्री-पुरुष में वैचारिक विभेद पैदा कर...हम मानवता को विकलांग बनाने का कार्य कर रहे हैं ! पूर्व से ही हमारा समाज कई असामाजिक, अनैतिक और रूढ़िवादी नीतियों कि वजह से पिछड़ता आया है,..अब हमें सिर्फ दुर्भावनावश समाज को और पीछे धकेलने से बचना होगा ! कहीं कहीं हमें समझना होगा कि महिला सशक्तिकरण और पुरुष प्रभुत्व कि लड़ाई में हम आदर्श समाज कि अवधारणा कि बलि चढ़ा रहे हैं, हम अपनी कारगुजारियों से एक बार पुनः इंसानियत को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं ! आज समय बदल रहा हैं, जीवन की चुनौतियाँ बदल रही है..हमें 'महिला सशक्तिकरण' और 'पुरुष प्रभुत्वा' के इस संघर्ष को दरकिनार करते हुए...लिंगी भेदभाव से ऊपर उठकर, कंधे से कन्धा मिलते हुए..मानवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों के साथ समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में अपना सर्वक्षेष्ठ योगदान देना होगा ...तभी हम सच्चे अर्थों में सशक्त महिलाओं के साथ स्वस्थ, सुन्दर, शिक्षित, सुरक्षित और सर्वोत्कृष्ट समाज की स्थापना करने में सफल होंगे ! 

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...