Saturday, 4 November 2017

ढोंगी 'ईश्वर' के पाखंडी भक्त हैं 'हम'




आज भले ही कुछ लड़कियों के सपने में सलमान खान या विराट कोहली आते हो, हकीकत यही है कि सुबह मंदिर कि चौखट पर माथा टेकने वाली हर लड़की के सपनों में आज भी राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु जैसे देवता आते है । इन भगवानों के जैसा वर पाने कि ही कामना रखती है क्योंकि काल्पनिक कहानियों में उन्हे सर्वगुण सम्पन्न और सर्वाधिक खूबसूरत बताया गया है । वास्तव में हमारी महिलाओं को कहानियों में वर्णित ईश्वर से अथाह प्रेम है । एक बार ईश्वर कह दें, तो ये अपना सर्वस्व अर्पण कर दें । हमारी माताओं-बहनों कि ईश्वर के प्रति इसी आस्था और प्रेम का फायदा राम रहीम और आशाराम जैसे ढोंगी उठाते है । खुद को संत, महात्मा, महाज्ञानी, महाबलशाली बता कर....न सिर्फ स्व-घोषित ईश्वर बन जाते है, अपितु नाट्य मंडली का पोषाक धारण कर खुद को कभी राम, कभी कृष्ण तो कभी शिव भी बना लेते है । साथ ही चिकनी-चुपडी बातों कि ऐसी माया फैलाते हैं, जिससे सामने बैठी भीड़ को उस ढोंगी में ईश्वर नज़र आना लगते है । ईश्वर को पाने के लिये मंदिरों कि चौखट चाटने वाली हमारी मातायें-बहनों को लगता है, जैसे साक्षात प्रभु श्री राम, कृष्ण कन्हैया के ही दर्शन हो गये । उनके मन का सोया ख्याब जग उठता है । वो चाहती हैं,  काश एक बार सामने खड़े प्रभु मेरे माथे पर आशिष दे दें ।...लेकिन दूसरी तरफ़ धर्म के बिसात पर ईश्वर कि माया फैलाये वह राक्षस , भीड़ में खूबसूरत स्त्रियों कि नजरो से तलाशी ले रहा होता है । जब उसके आदमी खूबसूरत स्त्रियों को 'ढोंगी प्रभु' के विशेष दर्शन और प्रसाद दिलाने का लालच देते है ...ईश्वर को पा लेने कि चाहत में भाव-विभोर हो वह सहर्ष 'हाँ' कर देती है । उसके मन मस्तिष्क में यह बात बैठ चुकी होती है कि, मंदिरों में विराजमान ईश्वर ने ही मुझे बुलावा भेजा है । वह खुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने को तैयार करने लगती है । उसे लगता है कि ईश्वर एक बार मेरे प्रेम को स्वीकार कर लें, उसका जीवन ही धन्य हो जायेगा । होता वही है ....वह ईश्वर का चोला पहने दरिंदे के सामने बिछ जाती है । एक तरफ़ भोग का आनंद होता है, तो एक तरफ़ भक्ति का आनंद होता हैं । एक तरफ छल-कपट की माया होती हैं तो एक तरफ सर्वस्व अर्पण को तैयार नारी काया होती हैं ।

ईश्वर के प्रति इस अथाह प्रेमवश लूटी जा रही स्त्री के हालात को समझना ज्यादा मुश्किल भी नही है, क्योंकि हमने वह दृश्य भी देखा है, जब रामलीला के मंचन के दौरान जैसे ही मंच से प्रभु दर्शन कि घोषणा होती है, लोगों का हुजूम टूट पड़ता है उस राम के दर्शन के लिये जो सिर्फ राम का अभिनय अर्थात नाटक कर रहा होता है । उस भीड़ में भी महिलाओं और लड़कियों कि संख्या अधिक होता है । अपना पेट पालने के लिये मजबूरी में श्री राम का नाटक कर रहे कलाकार के लिये युवतियों का जो प्रेम उमड़ता है, उसका पैर छूकर आशीर्वाद लेने कि जो कामना जगती है ....यह वही कामना है जिसका फायदा आशाराम और राम रहीम जैसे ढोंगी उठाते है । मुझे तो इस बात का भी यकीं है कि, अगर नाटक मंडली के श्री कृष्ण भी गोपियों के चक्कर में पड़ जाये तो, उस भीड़ में से 10-20 गोपियों को निकालना ज्यादा मुश्किल नही होगा । यह स्थिति निश्चय ही हमारी बेहद घृणित मानसिक अवस्था का परिचायक है । अंधभक्ति का इससे बेहतर नमूना नही हो सकता है । हमें सोचना होगा, यह कैसी आस्था है, यह कैसा प्रेम है , जिसमे हम अपने ईश्वर को नही पहचानते है ? एक व्यक्ति चमकदार वस्त्र धारण कर खुद को ईश्वर कि अवतार कहता है और हम बिना सोचे-समझे उसे ईश्वर मान भी लेते हैं । वास्तविकता यह है कि, हम अपने ईश्वर को न तो जानते है और न ही पहचानते हैं  । ईश्वर के नाम पर हमारे पास हैं, सिर्फ कुछ कल्पनायें ...जो धार्मिक कथा कहानियों में बुनी गयी है । अलावे इसके कथा-कथित ईश्वर कि कोई पहचान नहीं हैं । कहीं चार ईंट-पत्थर जोड़ कर ईश्वर बना दिया जाता है तो, कहीँ टीवी कलाकार कि तस्वीरें ईश्वर बन अगरबती सूँघने लगती है । कहीँ नाटक का कलाकार ईश्वर बन...10-20 रुपये में आशीर्वाद बेचने लगता है तो कहीं राम रहीम और आसाराम जैसे ढोंगी ...कृष्ण -कन्हैया बन गोपियों संंग रास रचाने लगते है ।
वास्तव में  'ईश्वर' कि पहचान को लेकर हमारे अंदर जो अंतर्द्वंद है, जो कल्पनाओ कि धुंध है, उसकी प्रमुख वजह भी हमारा धर्म ही है । आज हमारे जीवन में 'धर्म' जिस प्रारूप, जिस अवस्था में मौजूद है, यह कहना बिल्कुल ही अतिशयोक्ति नही होगी कि, 'धर्म हमारे मस्तिष्क में ठोके गये एक किल (खूँटा) के माफिक है, जिसने हमारे सोचने,समझने, सवाल पूछने एवं तर्क करने कि क्षमता को अपने में बाँध लेने का काम किया है । इंसान का  विचारशील होना तभी सम्भव है, जब उसका मस्तिष्क स्वतंत्र विचरण कि अवस्था में हो । जबकि हमारे धर्म में संदेह करने, सवाल पूछने और प्रमाण माँगने कि गुंजाइश ही नही है । यहाँ  सिर्फ हर बात को आँख मूंदकर मान लेने और हाथ जोड़कर स्वीकार कर लेने कि ही गुंजाइश प्राप्त है । सवाल उठाने को ईशनिंदा माना जाता है । यही कारण है कि धर्म कि बुनियाद पर जब भी कोई ढोंगी ईश्वर बनने का स्वांग रचता है, हम उस पर सवाल नही उठाते है, उससे प्रमाण नही माँगते है । हद तो ये कि ...राम-रहीम जैसे ढोंगी सिनेमा के परदे पर स्टंट करते हैं, उसमे भी हमें ईश्वरीय चमत्कार ही दिखता है ।

वास्तव में हम भारतीय सदियों से आस्था और विश्वास के नाम पर लूटते आये है । 'धर्म' कि काल्पनिक एवं भ्रामक कहानियों में उलझा हमारे मस्तिष्क को गुलाम बनाने का लगातार प्रयास किया गया है, जो आज भी बदस्तूर जारी है । हमारी महिलायें जो अपनी अशिक्षा के आवेश में प्रारम्भ से ही पुरुषों कि अपेक्षा कुछ ज्यादा ही धार्मिक रही है, उन्हें लगातर ठगने, नीचा दिखाने और समाज कि मुख्य धारा से वंचित करने के सभी प्रयास भी 'धर्म' और धार्मिक परम्पराओं कि आड़ में ही हुये है । जिसे कल कि अशिक्षित नारी न समझ पायी थी और न ही आज कि 'महिला सशक्तिकरण' का नारा लगाने वाली नारी समझ पायी हैं । आज आसाराम और राम रहीम जैसे बाबाओं के घिनौनी करतूतों का पर्दाफाश होना, यह साबित करने को पर्याप्त है कि ...धर्म और धर्म कि आड़ में सिर्फ और सिर्फ महिलाओ को लूटने, उनकी आस्था और विश्वास का नाजायज फायदा उठाकर  ...उनका शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शोषण करने का प्रयास किया गया है । शिक्षा के अभाव में अंधश्रद्धा में लीन महिलाओ और लड़कियों का फायदा उठाकर उनका शारीरिक दोहन किया गया है । सवाल पूछने का मन होता हैं इस देश के धार्मिक ठेकेदारों से, आखिर हमारे धर्म में ऐसी घिनौनी कृत्यों के लिये जगह कैसे बन रही है ? क्यों हमारा धर्म ढोंगी बाबाओं के लिये अपने काले कारनामों को छिपाने का साधन बन गया है? क्या हमारा 'धर्म' 'अधर्म' का ही प्रारूप बन गया हैं ?
 सबसे अहम् तो यह कि बाबाओं के प्रसाद कि यह फैक्ट्री सिर्फ रामरहीम और आसाराम तक सिमित नहीं हैं, अपितु इस फैक्ट्री में हर वह ढोंगी हैं जो खुद को ईश्वर कि अवतार या ईश्वर का दूत कहता हैं, जिसके दरवाजे पर मजलसे लगते हैं । जो लोगों को कभी भूत-प्रेत, गृह- नक्षत्र, पाप-पुण्य का डर दिखा लुटता हैं, जो फूलों, हिरे-जवाहरात जड़े आसान पर बैठ लोगों को सबकुछ त्याग करने कि बात करता हैं, जो महलों में विराजमान हो आपको घर-द्वार छोड़ने कि बात करता हैं ।जब धर्म कि माया कम पड़ने लगती हैं तो ,...ये खुद को फिल्मस्टार, खिलाडी भी बना लेता हैं गायक और डांसर भी बना लेता हैं...जिससे नई-नई लड़कियों और औरतों को भी अपनी मायाजाल के फंसाया जाय।

सही  हैं कि आज हम इन घटनाओं पर काफी मुखर हैं, लेकिन ऐसी चर्चाये सिर्फ और सिर्फ आरोपी बाबाओं को कोसने, उसे बुरा-भला कहने मात्र में सीमित है ।अर्थात कहीं न कहीं हम आज भी धर्म और धर्म कि आड़ में फैले काले साम्राज्य कि हकीकत से कोसों दुर है ।आज यह स्पष्ट हो चुका है कि संत का चोला पहने इन धार्मिक भेडियों ने लाखों महिलाओं कि इज्जत लूटी है, उनकी आस्था और विश्वास का नाजायज फायदा उठा शारीरिक शोषण करने का काम किया है । लेकिन सवाल अहम है, यह कैसे हुआ ? कैसे पढी-लिखी महिलायें भी इन बाबाओं के चंगुल में फँस गयी ? और सबसे बड़ी बात जब बिस्तर पर हर रोज़ किसी न किसी लड़की को विशेष आशीर्वाद के नाम पर लूटा गया, सिर्फ एक या दो ही क्यों विरोध कर सकीं ? क्या बाकियों में हिम्मत नही थी, या उन्हे भी इसका आनँद आने लगा ?  इन चुभते प्रश्नों से हम मुंह नहीं छुपा सकता हैं, क्योंकि धर्म और धर्म में कल्पित ईश्वर के प्रति अपनी विकृत मानसिकता के लिए हम भी कम दोषी नहीं हैं । जब तक हम यूँ ही ईश्वर को लेकर ....अंधीभक्ति में लीन रहेंगे, जब तक हमारी माताएं-बहने पागलों कि तरह ईश्वर को ढूंढती रहेंगी...उन्हें ऐसे ही ढोंगी, पाखंडी, बहरूपिए ईश्वर मिलते रहेंगे । इसी प्रकार भक्ति कि आड़ में भोग का आनंद ईश्वर का ढोंग करने वाले भेड़ियें उठाते रहेंगे । फिर कभी- कभार जब नेताओं और बाबाओं के गठजोड़ में थोड़ी घर्षण पैदा होगी, यूँ ही 'बाबाओं के प्रसाद के इक्के-दुक्के किस्से' हवाओं में लहराते रहेंगे । हम और आप जबरदस्त गालियों कि गर्दिश उड़ाते रहेंगे ।  

Thursday, 17 August 2017

क्या 'मोदीभक्ति' ही 'देशभक्ति' का पैमाना हैं ?

अगर हम भारतीय लोकतंत्र के अब तक के सफर को समझने का प्रयत्न करें तो, इस बेहद छोटे से कालखंड में ही विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा हैं, और बदलते दौर के साथ ये चुनौतियां मुश्किल होती चली जा रही हैं | मुख्यरूप से जब भी हम भारतीय लोकतंत्र में व्यक्तिवाद की चुनौतियों को समझने का प्रयत्न करते हैं, लगता हैं जैसे इतिहास अपने आपको दोहरा रहा हैं | अगर हम याद कर सकें ७०-८० का वह दशक जब भूत-पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के बारे में 'इन्डिया इज इंदिरा' एन्ड 'इंदिरा इज इण्डिया' की राय लोगों में बनाने की कोशिस की गयी थी | लोगों के मन-मस्तिष्क में यह धारणा स्थापित करने का प्रयास किया गया था कि, 'इंदिरा के बिना, राष्ट्र कल्पनाहीन हैं' | दुर्भाग्य से आज भी भारतीय जन-मानस में कुछ ऐसी ही राय स्थापित करने का प्रयाश 'हम' कर रहें हैं | यहाँ 'हम' से तातपर्य हम आम लोगों से हैं, हम युवाओं से हैं जो कल इंदिरा गाँधी कि भक्ति में लीन थे और आज मोदी भक्ति में लीन हैं | निःसदेह स्वर्गीय इंदिरा गाँधी और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री अब तक के सर्वाधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं, लेकिन इस तरह के 'राय' उनके विचारों और कार्यक्रमों का कभी हिस्सा नहीं रहे हैं | वास्तव में हमारी लोकतान्त्रिक समझ सदेहास्पद हो जाती हैं, जब हम इस तरह से राजनैतिक व्यक्तित्वों के प्रभाव से 'राष्ट्र' कि तुलना करने लगते हैं , जब हम इंदिरा गाँधी को इण्डिया के समतुल्य और मोदीभक्ति को राष्ट्रभक्ति का पैमाना मान लेते हैं | मुझे बेहद पीड़ा के साथ यह बात कहनी पड़ रही हैं कि, आज हमने सिर्फ एक राजनैतिक सख्शियत कि ब्रांडिंग के चक्कर में 'राष्ट्रभक्ति' के नए पैमाने तय कर लिए हैं | उस पैमाने के अनुसार, आज जो माननीय प्रधानमंत्री जी के विचारों, कार्यशैली एवं शासन से असहमत हैं, जिसे वर्तमान सरकार में कोई कमी दिखाई देती हैं, हम उसे तुरंत एक सुनियोजित माध्यम से 'राष्ट्रविरोधी' साबित कर देते हैं | यह क्या हैं ? हम कैसा लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं ? हम कैसे राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं ? हमें, विशेषकर हम युवाओं को आत्मचिंतन कि आवश्यकता हैं |


हम एक ऐसे राष्ट्र के निवासी हैं, जिसकी पूरी बुनियाद लोकतान्त्रिक हैं | इस राष्ट्र को समझने के लिए, लोकतंत्र को समझना बेहद आवश्यक हैं | यहाँ हमें एक बात गहराई से समझने की आवश्यकता हैं कि, दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में भक्ति/उपासना/पूजा के लिए कोई जगह नहीं हैं , अपितु ये सभी लोकतंत्र के लिए विष के सामान हैं | जैसा की हम जानते हैं, हमारा लोकतंत्र मुख्यतः दो खण्डों में विभाजित हैं, १. 'लोक' अर्थात जनता और २. 'तंत्र' अर्थात व्यवस्था | यहाँ 'लोक' ही 'तंत्र' का जन्मदाता हैं | वास्तव में  हमारी लोकतान्त्रिक पद्धति में 'लोक' अर्थात हम आम जनता ही तंत्र (व्यवस्था) के  चयनकर्ता हैं | इस देश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर किसी गांव के किसी वार्ड का निर्वाचित सदस्य के चयन के लिए भी हम प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं | अब सवाल बेहद अहम् हैं कि, क्या किसी चयनकर्ता को अपने चयनित इकाई या व्यक्ति कि भक्ति/उपासना/पूजा करनी चाहिए? क्या एक चयनकर्ता के रूप में राजनैतिक व्यक्तित्वों कि ब्रांडिंग करना' हमारे लोकतान्त्रिक कर्तव्यों' के अनुसार हैं ? हम कल्पना करें कि, कल भारतीय क्रिकेट टीम कि चयन समिति किसी क्रिकेट खिलाडी का चयन करें और फिर खुद उसकी पूजा में लीन हो जाए, उसे खेल से भी बड़ा घोषित कर दें, क्या यह उसके कर्तव्यों के अनुरूप होगा ?
अगर हम तनिक भी भारतीय लोकतंत्र को समझते हैं, उपरोक्त सभी प्रश्नों का जवाब 'नहीं' ही होगा, क्योंकि एक चयनकर्ता के रूप में अपने द्वारा चयनित इकाई/व्यक्ति कि पूजा, उसकी ब्रांडिंग हमारी लोकतान्त्रिक जिम्मेदारियों के विरुद्ध हैं | अपितु चयनित इकाई/व्यक्ति कि हर गतिविधि का अवलोकन करना, उसके हर क्रिया-कलाप का लेखा-जोखा रखना, और पांच वर्ष के पश्चात उसका हिसाब करके पुनः अपना निर्णय वोट के माध्यम से सुनाना ही हमारी मूल जिम्मेदारी हैं, जिससे हम पूर्णतः भटक गए हैं | स्थिति उत्पन्न हो गयी हैं कि, हम 'लोक बनाम तंत्र' के इस विमर्श में कहाँ खड़े हैं, क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं? हमें खुद ही नहीं पता हैं |
मैं स्वयं एक युवा हूँ, और आज जिन प्रश्नों को लेकर हम चिंतित हैं, उसके लिए भी जिम्मेदार हम युवा ही हैं | जब भी मैं भारतीय राजनीति में युवाओं कि स्थिति को समझने का प्रयास करता हैं, दुर्भाग्य कि हम सिर्फ और सिर्फ नारे लगाने वाली भीड़ बन के रह गए हैं | अब तो यह भीड़ भेड़-चाल में तब्दील हो चुकी हैं | कल तक कभी-कभार हम बेरोजगारी, बेहतर शिक्षा व्यवस्था, दहेज़ प्रथा, जातिवाद, अन्धविश्वास पर बात करते थे, लेकिन आज हमने गौ-हत्या, काश्मीर, घर वापसी जैसे जिम्मे उठा लिए हैं | नेताओं और राजनैतिक दलों कि ब्रांडिंग, उनके कार्यक्रमों के प्रचार के जिम्मे उठा लिए हैं, उनके बदले में उनके राजनैतिक/वैचारिक विरोधियों पर हमले का ठेका ले लिया हैं | हमें तो यह अहसास भी नहीं होता कि, इन विवादों का ठेका हमें कब मिल गया | सोशल मिडिया के दौर में सबकुछ बिना आगे-पीछे सोचे समझें आगे बढ़ता चला जा रहा हैं | हम तो यह भी भूल जाते हैं, कि अगर किसी गौ-हत्या के सम्बन्ध में गैर-क़ानूनी हो रहा हैं तो, हमने इस देश में एक सरकार भी चुना था, जिसके पास पुलिस भी हैं और कानून भी हैं, जिसपर लाखों करोड़ खर्च भी होता हैं |

बेहद दुखद हैं कि, आज बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थाओं से बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिक भी सोशल मिडिया के इस भयानक संक्रमण से ग्रसित हो गए हैं | विचार कि जगह सिर्फ प्रचार हो रहा हैं | थिंकिंग कि अपेक्षा सिर्फ लिंकिंग हो रही हैं | अपनी कोई सोच हैं, न समझ हैं, सिर्फ अफवाहों कि आंधी हैं | इस देश का एक मतदाता, एक आम नागरिक अपनी सरकार से कुछ सवाल करता हैं तो, सभी लोकतान्त्रिक मूल्यों कि धज्जियाँ उड़ाते हुए, उसे राष्ट्रविरोधी साबित कर देते हैं | आम नागरिक कि बात भी कौन करें, हम इस देश के उपराष्ट्रपति कि धज्जियाँ उड़ा देते हैं, क्योंकि वह अपनी सरकार को कुछ हिदायत, कुछ संकेत देने का प्रयास कर रहा हैं | उसे पाकिस्तानी एजेंट, आतंकी एजेंट और न जाने क्या-क्या चंद मिनटों में ही साबित कर देते हैं | इसके लिए ऐसे-ऐसे रिसर्च पोस्ट सामने आते हैं, जो इस देश कि शांति और एकता कि हमारी विरासत में आग लगाने को काफी हैं | दुर्भाग्य से इस देश में आग लगाने कि ऐसी सैकड़ों कोशिशे प्रतिदिन हो रही हैं और हम बदहवाश 'युवा' उसका जरिया हैं , अर्थात जिनके कन्धों पर राष्ट्रनिर्माण का जिम्मा था, वो अब कुछ राजनैतिक दलों/व्यक्तियों का स्वार्थ ढोने लगे हैं | इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि, इस देश में आज धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक हर स्तर पर 'वैचारिक उग्रवाद' फैलाने कि साजिश हो रही हैं और हम युवा इसकी चपेट में सर्वाधिक हैं | इस साजिस को समझना बेहद आवश्यक हैं |
हमें चिंतन करना होगा कि कैसे १३० करोड़ भारतीयों कि राष्ट्रीयता एक व्यक्तित्व में परिभाषित हो  सकती हैं ? नरेंद्र मोदी जी मेरे भी बेहद पसंदीदा राजनेताओं में से हैं, लेकिन वो मेरी राष्ट्रीयता कि सीमा नहीं हो सकते हैं | उन्हें प्रधानमंत्री पद पर मैंने भी चयनित किया हैं, इस नाते उनके क्रायक्रमों, उनके शासन व्यवस्था और व्याप्त हालात पर बात करना मेरा लोकतान्त्रिक अधिकार हैं, ....इसके लिए मुझे किसी भी राष्ट्रवाद कि चिंता नहीं हैं | सरकार के काम-काज को लेकर हमारे बिच असहमति हो सकती हैं | जो कार्यक्रम आपको अच्छा लगता हैं, किसी को बुरा लग सकता हैं | लेकिन यह 'असहमति' ही हमारे लोकतंत्र कि जान हैं | इस तरह मोदी भक्ति को देशभक्ति के तराजू पर तौलना और मोदी विरोध को राष्ट्रविरोध बताने कि साजिस जितनी जल्दी बंद हो सके, हमारे राष्ट्र और  लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा | स्वर्गीय इंदिरा गाँधी के दौर में जब लोकतंत्र के ऊपर व्यक्तिपूजा हावी हो गया था, तब लोकतंत्र ने अपनी ताकत दिखाई थी | अगर आज  चीजें नियंत्रण में न हुई, लोकतंत्र पुनः अपना रूप दिखायेगा और इसके लिए प्रिय मोदी जी नहीं, सिर्फ और सिर्फ उनके अंधभक्त जिम्मेदार होंगे | एक बार पुनः दुर्भाग्य कि, मैं अपने युवा-मित्रों को अंधभक्त कह रहा हूँ, क्योंकि जरुरत हैं हमें खुद को झकझोरने कि | यह देश आज तक धार्मिक अंधभक्ति कि कैद में हैं और अब राजनैतिक अंधभक्ति ....निश्चय ही इस देश का भविष्य अंधकारमय हैं | जिस प्रकार 'शेक्सपियर' सर्वक्षेष्ठ साहित्यकार हो सकते हैं, लेकिन साहित्य कि सीमा नहीं हो सकते हैं, जिस प्रकार सचिन तेंदुलकर सर्वक्षेष्ठ क्रिकेटर हो सकते हैं, लेकिन क्रिकेट कि सिमा नहीं हो सकते हैं, उसी प्रकार से माननीय मोदी जी भारत के सर्वक्षेष्ठ प्रधानमंत्री हो सकते हैं, भारतीयता कि सीमा नहीं सकते हैं | मोदी भक्ति को राष्ट्रभक्ति बिलकुल ही नहीं माना जा सकता हैं | इस विषय पर हम युवाओं को लोकतान्त्रिक रूप से सचेत होने कि आवश्यकता हैं, क्योंकि यह देश हज़ारों वर्षों पुराना हैं, हमारी राष्ट्रीयता हज़ारों वर्षों कि विरासत हैं, उसे यूँ ही किसी व्यक्ति विशेष से तुलना करना, अपने आप में सबसे बड़ा राष्ट्रविरोधी कृत्य हैं  |

मुझे विश्वास हैं कि, आज हम सभी के मन-मस्तिष्क पर कुछ महान शख्सियतों के विचारों का प्रभाव हावी हैं, ऐसे में अपना विचार, अपनी सख्सियत दब सी गयी हैं | भारत वैसे भी सदियों से अनुयायियों और प्रचारकों का ही देश रहा हैं | हर स्थिति को खुद कि सोच और समझ से देखना हम अपनी शिक्षा का अपव्यय समझते हैं | हम आई.आई.टी से निकलकर भी दूसरों के अनुसंधान पर काम करने में महारत रखते हैं और आई.आई.एम् से निकलकर दूसरों द्वारा प्रबंधित होने कि कला भी बखूबी जानते हैं | मतलब इस 'पैक्ड/तालाबंद' मस्तिष्क को झकझोरना, सोये हुए सर्प को जगाने के जितना मुश्किल हैं, लेकिन कोशिशें अवश्य होनी चाहिए |

Sunday, 16 July 2017

एक अनुसंधान : ईश्वर क्या हैं?



जब भी 'ईश्वर' शब्द हमारे जेहन में आता है, मस्तिष्क स्वतः धार्मिक चिंतन में प्रवेश करने को अग्रसर हो जाता है| वास्तव में अगर हम हजारों वर्षों के मानवीय इतिहास पर एक गहरी नजर डाल सकें, एक स्पष्ट प्रमाणिक तथ्य निकलकर कर सामने आता है कि, 'हम मनुष्यों ने जब भी 'ईश्वर' शब्द को परिभाषित या विश्लेषित करने का प्रयास किया है, पृष्ट्भूमि धार्मिक ही रही है'' | यही वजह भी है कि, हम ईश्वर को एक धर्म तत्व के रूप में स्वीकृत करते आये हैं | अब तक कि मान्यताओं के अनुसार ''ईश्वर' एक ऐसी अलौकिक, अद्वितीय, महापराक्रमी इकाई हैं, जो इस सृष्टि का निर्माता और निर्देशक हैं | इस सृष्टि में किसी भी घटना के होने या न होने कि वजह हैं'' |

धर्म और धार्मिक मान्यताओं कि पृष्टभूमि से तैयार 'ईश्वर' कि इस परिभाषा को जब भी हम वास्तविकता कि नजर से देखने और समझने का प्रयत्न करते हैं, कुछ स्पष्ट सा नहीं दिखता है| ईश्वर कि इस धार्मिक परिभाषा को जब हम अपने जीवन में ढूंढने का प्रयत्न करते हैं, वहां भी एक विरोधाभास सा प्रतीत होता है | ऐसे में एक संदेह उतपन्न होता है कि, कहीं ईश्वर के प्रति हम गलत विवेचना तो नहीं कर रहे हैं ? कहीं हमारा ईश्वरीय चिंतन सिर्फ काल्पनिक संकल्पना तो नहीं बन कर रह गया है ? जब मैं यह प्रश्न आपके चिंतन हेतु रख रहा हूँ, इसके पीछे धर्म या धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाना हमारा उदेश्य बिलकुल भी नहीं है| अपितु धर्म और धार्मिक तत्वों कि एक बेहद स्पष्ट, सरल, परिभाषी, तार्किक और हमारी जीवनशैली से सम्बद्ध विवेचना लोगों के समक्ष रखना है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी जो 'धर्म' और 'धर्म-तत्वों' से आपने आपको सम्बन्ध नहीं कर पा रही है, इसे समझ सके |


हमें सोचना होगा कि, अगर धार्मिक पृष्टभूमि आधारित चिंतन से हम 'ईश्वर' कि स्वीकार्य परिभाषा तय नहीं कर पा रहे हैं, क्या हमारे वैचारिक/शैक्षणिक चिंतन कि किसी अन्य धारा में ईश्वर को परिभाषित किया जा सकता है ? क्या हम 'ईश्वर' और 'ईश्वरीय शक्ति' के मानवीय जीवन पर स्पष्ट प्रभावों का खुला विश्लेषण कर सकते हैं ? आइये हम सब मिलकर एक प्रयास करें | 'ईश्वर' को नए सिरे से ढूंढने के लिए बेहद आवश्यक हो जाता है कि, हम अब तक मस्तिष्क में जमा अवधारणाओं के चंगुल से कुछ देर के लिए आज़ाद हो जाए | नव-चिंतन सर्वथा शून्य मे ही उतपन्न  होता है |

क्या हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति का प्रभाव है ?

मित्रों, 'ईश्वर' शब्द को वास्तविकता के साथ परिभाषित करने के लिए बेहद आवश्यक है कि, हम वास्तविक मानव जीवन पर नजर डालें | जब हम एक सामान्य मानवीय जीवनशैली में 'ईश्वरीय तत्व' को ढूंढने का प्रयास करते हैं, एक बात स्पष्टतः निकल कर सामने आती हैं कि, ''हमारे जीवन में 'ईश्वर' अर्थात ईश्वरीय शक्ति प्रभावी है'' | लेकिन जैसे ही हम इस तथ्य पर पहुंचते हैं, कई प्रश्न प्रश्न खड़े हो जाते हैं कि, कैसे ? हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण तो धर्म भी नहीं दे सका है, फिर कैसे हम इस तथ्य को प्रमाणित कर सकते हैं ? साथ ही प्रश्न खड़ा होता है कि, यह कौन सी ऊर्जा हैं ? इसकी प्रबलता और स्रोत क्या है ?

ईश्वरीय शक्ति मानव जीवन में प्रभावी है, लेकिन कैसे ?

 इस के लिए हमें अपने सामान्य दिनचर्या के कुछ प्रसंगों पर नजर डालनी होगी | जैसा कि हम देखते हैं - "हमारे आस-पास कुछ लोग मिलकर किसी भारी वस्तु को उठाने का प्रयत्न करते हैं | वे बार-बार प्रयत्न करते हैं लेकिन थोड़ा सा चूक जाते हैं | तभी सभी मिलकर 'हनुमान/शिव जैसे कथा-कथित ईश्वरीय स्वरूपों का जयकार लगाते हैं, और वस्तु उठ जाती है'' | यह परिणाम ऐसे मामलों में ८०-९०% तक होता हैं | मतलब स्पष्ट हैं कि, हमारे जीवन में ईश्वर काल्पनिक नहीं वास्तविक प्रभाव के साथ मौजूद हैं..क्योंकि शाब्दिक उच्चारण से कार्य सफल हो रहे हैं | ऐसा अक्सर देखा गया है कि, कई बार ईश्वर का नाम लेने से हमारा प्रयास सफल हो जाता हैं |

 'ईश्वर' या 'ईश्वरीय शक्ति' कौन सी ऊर्जा है , उसकी स्रोत और प्रबलता क्या है ?


''सर्वप्रथम तो 'ईश्वर' कोई अलौकिक शक्ति नहीं हैं | 'ईश्वर' को हमारे जीवन में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सर्वक्षेष्ठ ढंग से परिभाषित किया जा सकता है| 'ईश्वरीय शक्ति एक प्रकार कि काल्पनिक ऊर्जा है, जो एक आभाषी चरित्र में विश्वास से जन्म लेती है|  एक व्यक्ति जब मुश्किल में होता है, तब वह अपने धर्म (आस्था) से जुड़े ईश्वर को याद करता है | जैसे ही वह ईश्वर कि कल्पना करता है, उसे लगता हैं कि अब मेरे साथ कोई है,... कोई है जो मुझे इस संकट से निकाल ले जायेगा | ...उसका यह महसूस करना ही उसे आत्म प्रेरित कर देता है,..तत्क्षण में संकट से लड़ने के लिए उसके अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हम ईश्वरीय शक्ति के रूप में वर्णित कर सकते हैं '' |

जहाँ तक प्रश्न इस ऊर्जा के स्रोत का है, '' ईश्वर' स्वयं में कोई ऊर्जा स्रोत नहीं हैं, वस्तुतः संकट कि घडी में ईश्वर शब्द के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर में आती है, उसका स्रोत स्वयं हमारा शरीर ही हैं | वास्तव में 'ईश्वर' एक मन्त्र के रूप में कार्य करता हैं, जिसके उच्चारण से निराश और सुस्त पड़ी हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रबल हो जाती हैं और हमारी आंतरिक ऊर्जा संगठित हो जाती हैं | जैसा कि ऊपर उदाहरण में देखा हमने कि, किस प्रकार लोग ईश्वर का नाम लेकर भारी वस्तु को उठा लेते हैं | यहाँ समझने कि आवश्यकता है कि, ईश्वर का नाम लेने से पूर्व जहाँ, आंतरिक ऊर्जा खंडित थी, वही नाम लेते ही सम्पूर्ण शरीर कि ऊर्जा बाजुओं में केंद्रित हो जाती हैं, जिससे कार्य आसानी से संभव हो जाता हैं | इस ऊर्जा कि प्रबलता का कोई तय पैमाना नहीं हैं, ..लेकिन यह इस हद तक प्रबल नहीं होती है, जिसे चमत्कारी कहा जा सके | अगर आप सामान्य अवस्था में २५ कि.ग्रा.  वजन उठा पाने में सक्षम हैं तो, ईश्वर के उच्चारण से और दो-चार कि.ग्रा अधिक उठा सकेंगे | कोई अद्भुत चमत्कार कि सम्भावना शून्य है | ईश्वर कोई अद्वितीय, महापराक्रमी शक्तिस्रोत है, यह सिर्फ एक भ्रम है |

हमारे सामान्य जीवन में ईश्वर के प्रभावों एवं उनका खुला और स्पष्ट विश्लेषण, आपको कैसा लगा ? हमें इन्तजार रहेगा | यह आलेख 'आपका ...धर्म क्या है ?'' ...कि अगली कड़ी है | अगर आपने अब तक उसे नहीं पढ़ा है, तो एक बार अवश्य पढ़े | एक बार पुनः यह याद दिलाते हुए कि, हम किसी भी धर्म के पक्ष-विपक्ष में चिंतन नहीं कर रहे हैं | 'धर्म' हमारे जीवन में वैचारिक अनुशासन के लिए बेहद आवश्यक हैं, लेकिन इसके लिए बेहद जरुरी है कि 'धर्म' सरल, अकाल्पनिक, व्यावहारिक और हमारे जीवन में प्रामाणिक हो, तभी यह हमें संयमित, नियमित और अनुशासित कर सकता है | अगली कड़ी में ...हम चलेंगे मानव इतिहास के पुराने पन्नों पर ...और ढूढेंगे उस ईश्वर को ...जिसे हमारे पूर्वजों ने  पूजा था | धन्यवाद | जय भारत

Tuesday, 11 July 2017

आपका ‘धर्म’ क्या है?



'धर्म' मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में सर्वाधिक चर्चित विषय रहा हैं | 'धर्म' को लेकर विभिन्न महामानवों ने अपने विचार रखें हैं, और उनके अनुयायी आज भी उस वैचारिक यात्रा में गतिशील हैं | मूलतः 'धर्म' शब्द का अभिप्राय एक जैविक इकाई के रूप में हमारे 'कर्तव्यों' से जुड़ा हैं, लेकिन जब भी वैश्विक समाज में धर्म के रूप में स्थापित हो चुकी कुछ सांगठनिक इकाइयों को अपने चिंतन में सम्मिलित करते हैं, स्पष्ट पता चलता हैं की 'धर्म' विचार और धारणाओं का एक मिश्रित स्वरूप हैं | अगर इस्लाम धर्म हजरत मुहम्मद साहब के वैचारिक चितन का प्रतिफल हैं, तो बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के विचारों और मानव जीवन के प्रति उनकी धारणाओं का प्रतिबिम्ब हैं | इसी प्रकार ईसाई धर्म यीशु मशीह, और सिख धर्म गुरुनानक देव जी के चितन और स्थापित धारणाओं का ही परिणाम हैं| इन सभी महापुरुषों ने मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन किया, और चितन से जो विचार उतपन्न हुए, उसे अपने समर्थकों में बाँटने का काम किया | धीरे-धीरे उनकी वैचारिक यात्रा में अनुयायी बढ़ते गए, आगे चलकर अनुयायियों का यही समूह एक धार्मिक समूह के रूप में परिवर्तित हो गया |

ये तो हुई इस वैश्विक समाज में 'धर्म' के रूप में स्थापित हो चुके मानवीय संगठनों कि उत्पत्ति से जुडी मूल-अवधारणा | लेकिन एक जैविक इकाई के रूप में 'धर्म हमारे लिए क्या हैं ? क्या यह सिर्फ एक आस्था और विश्वास का प्रश्न हैं, या हमारी जीवन यात्रा के साथ इसका कोई सीधा और प्रभावी सम्बन्ध भी हैं ? मुख्यतः हम युवाओं के लिए 'धर्म' एक तर्कहीन और तथ्यविहीन कल्पनाओं का स्वरूप मात्र हैं, लेकिन क्या हम इसे अपने वास्तविक जीवन के पहलुओं से जोड़कर 'धर्म' कि एक सरल, परिभाष्य, तार्किक और कल्पनाविहीन व्याख्या कर सकते हैं ? मुझे लगता हैं कि हमें ऐसा जरूर करना चाहिए | मुझे शक हैं कि, इन सभी प्रश्नों के साथ मैं सही न्याय कर पाउँगा...क्योंकि मेरा प्रयास आपके मस्तिष्क में धर्म कि एक और नई व्याख्या का रोपण नहीं हैं, अपितु आपको इस बात के लिए जगाना हैं कि, आपका/हमारा धर्म क्या हैं ? एक इंसान के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक पुरुष या स्त्री के रूप में हमारा धर्म क्या हैं? एक युवा के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? एक छात्र के रूप, एक शिक्षक के रूप में, एक अभिभावक के रूप में हमारा धर्म क्या हैं ? इन प्रश्नों के साथ ही मैं यह याद दिलाना चाहूंगा कि, धर्म 'थोपने' का विषय नहीं हैं | 'धर्म' अंधश्रद्धा और वैचारिक पंगुवाद का विषय भी नहीं है | आपका धर्म सिर्फ आपके लिए चिंतन का विषय हैं, क्योंकि हम सभी इस ब्रम्हांड में एक जैविक इकाई के रूप में अपने धर्म के बारे में चितन करने के लिए स्वतंत्र हैं |मैं एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ, जो कई कड़ियों में आपके समक्ष रखूँगा ...आप अपनी टिपड़्ड़ीयों से हमें जरूर अवगत कराएं :-

जब भी हम 'धर्म' को वास्तविकता के धरातल पर परिभाषित करने का प्रयत्न करते हैं, 'धर्म' अत्यंत ही सरल एवं सहज विषय प्रतीत होने लगता हैं | 'धर्म' का सीधा और सरल अर्थ 'कर्तव्य' से हैं | एक इंसान के रूप में अपने कर्तव्यों के क्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला 'कर्म' ही धर्म हैं |  एक पिता के रूप में आपका धर्म हैं कि, अपने बच्चे का सर्वक्षेष्ठ पालन-पोषण करें, उन्हें उच्च कोटि कि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर दें | वहीँ 'पुत्र धर्म' कहता हैं कि, आप अपने पिता के प्रति सम्मान रखें, उनके बुढ़ापे में किसी प्रकार कि दुख या पीड़ा का कारण बने | इसी प्रकार मां के प्रति, अपने भाई के प्रति, दोस्तों-मित्रों और सगे- सबंधियों के प्रति आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, यही जिम्मेदारियां विभिन्न मानवीय रिश्तों के प्रति हमारा 'धर्म' हैं | एक राजा के लिए प्रजा के प्रति कर्तव्य ही  'राज धर्म' हैं | इस तरह 'धर्म' को समझना और उससे खुद को जोड़ना, सिर्फ धर्म को बेहद सहज बनाता हैं, यह हमारी जीवनयात्रा को आदर्श भी बनाता हैं |

अगर 'भगवद गीता' में कहा गया हैं कि, 'कर्म ही पूजा हैं' | हमें इस वाक्य कि विशुद्ध व्याख्या को समझना होगा | 'कर्म' अर्थात  आपके कार्य | अपने उत्तरदायित्वों, अपनी जिम्मेदारियों के सर्वक्षेष्ठ निर्वाह के लिए किया जाने वाला परिश्रम ही ...'पूजा' हैं | सिर्फ इसी पूजा का फल भी आपको प्राप्त होता हैं | 
अगर आप अपने पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों के सर्वोत्तम निर्वाह के लिए १२ घंटे मेहनत-मजदूरी करते हैं, विश्वास कीजिये ...आप १२ घंटे पूजा (कर्म) कर रहे हैं | मूल सन्देश यह हैं की आप अपनी जिम्मेदारियों का सर्वोत्तम निर्वाह सुनिश्चित करें, आपका धर्म सर्वथा सुरक्षित रहेगा |

इस प्रकार अगर हम अपने जीवन से जोड़कर धर्म और धार्मिक तत्वों की व्याख्या कर सकें ..काफी हद तक धर्म अपनी काल्पनिकता से वास्तविकता की तरफ प्रवेश करेगा | यहाँ एक बात और हमें समझनी होगी कि, धर्म अगर कर्तव्य हैं फिर हम कर्तव्यमूढ़ नहीं हो सकते हैं | सिर्फ इसलिए क्योंकि धर्म कुछ लोगों के लिए धंधा बन चूका हैं, हम धर्म का त्याग नहीं कर सकते हैं | हमें धर्म को नए नजरिये, नई सोच के साथ देखना होगा और उसे अपने जीवन में वास्तविकता के साथ उतारना होगा | हो सकता है सैकड़ों वर्ष पूर्व जो बातें कहीं-लिखी गयी हो, तब के समाज और जैव चिंतन के अनुसार सही भी हो | लेकिन आज भी हम उन्ही वर्षों पुरानी धारणाओं के साथ 'धर्म' को परिभाषित करते गए, विश्वास कीजिये 'धर्म' आने वाली पीढ़ी के लिए अबूझ और अछूत बन के रह जाएगा | अंग्रेजी माध्यम के साथ तैयार हो रही हमारी नई पीढ़ी 'धर्म' को समझ सके, इसके लिए धर्म का परिचय वास्तविकता के साथ कराना बेहद आवश्यक हैं |

हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

                                                                           :-K.KUMAR ABHISHEK (11/02/2016) एक भारतीय होने के नाते, भार...